जीवन और समाज को योगमय बनायें
योग-आयुर्वेद की
ओर मुड़ना
स्वस्थ जीवन,
निरापद चिकित्सा, सौभाग्यमय परिवार व देवमय समाज के लिए हमारा भारत प्राचीन
काल से जाना जाता रहा है, इसका आधार रहा है
योग और आयुर्वेद। जबकि आधुनिक विज्ञान की खोज ने एलोपैथी का प्राकट्य किया और मानव
स्वस्थ जीवन के नव आकर्षण में फसने लगा और मात्रा दो सदियों के अंदर ही
स्वस्थ-समाज की रंगत फीकी पड़ गयी। आज भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व एलोपैथी के साइड
इफेक्ट से चिंतित है, अतः पुनः
विशेषज्ञ भारतीय ऋषियों की आत्म अनुसंधित विधा योग-आयुर्वेद की ओर मुड़ रहे हैं।
यद्यपि गौर करें तो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने दुनियां को बहुत कुछ दिया, रोग और रोगी को लेकर एक नई दृष्टि दी। सर्जरी
के सहारे इसने गंभीर से गंभीर रोगियों को मौत के मुंह से निकालने में मदद की। इस
आधार पर सम्पूर्ण उन्नीसवीं व वीसवीं सदी के स्वास्थ्य का दारोमदार आधुनिक
चिकित्सा पर ही टिक गया।
वैसे ऐलोपैथी
जीवन को बाहर प्रयोग किसे गये तत्वों के सहारे स्वास्थ्य लाभ पहुंचाने में कही तक
कारगर तो हुई, पर जीवन के अंदर
से समाधान न खोज पाने के कारण सम्पूर्ण शरीर को कैमिकल का ढांचा मान कर चलने लगी,
बस यहीं यह फेल हुई। अनुसंधान की दिशा की
दृष्टि से भी यह असफल रही, क्योंकि इस चिकित्सा
में जो युगीन प्रयोग होने चाहिए थे, वे न हो पाये। आज एलोपैथी के सर्जरी पक्ष को छोड़ दें, तो एलोपैथी से लोग कतरा कर योग, आयुर्वेद, प्राणायाम जैसी
प्राचीन परम्परा की ओर मुड़ रहे हैं।
योगमय जीवनचर्या
द्वारा आत्मबल को जगाये
सम्पूर्ण विश्व
के चिकित्सा विशेषज्ञ रोग और रोगी पर जड़ी-बूटी, योग-प्राणायाम के सकारात्मक प्रभाव को लेकर शोध-अनुसंधान
में जुटे हैं।
पूज्य गुरुदेव भी
विश्व जागृति मिशन के जन्मकाल से जन-जन को इस संदर्भ में जागरूक करने एवं योगमय
जीवन चर्या द्वारा आत्मबल को जगाने, स्वास्थ्य लाभ पहुंचाने और शारीरिक-मानसिक-भावनात्मक स्तर पर व्यक्ति को मजबूत
करके उसे अपने निज स्वभाव में स्थिर करने हेतु प्रयत्नशील रहे हैं। इसके लिए मिशन
ने शोध कार्य किये और उन निष्कर्षों से जन-जन को जोड़ने की रूपरेखा तैयार की,
जिससे समाज को स्वस्थ-निरोग व गरिमामय बनाया जा
सके। हम कुछ दशक पूर्व विश्व के विशेषज्ञों के द्वारा योग-प्राणायाम को लेकर
सम्पन्न हुए कुछ प्रयोगों का अवलोकन करें, तो उनको चौकाने वाले संकेत मिलते हैं।
रोग-निरोधक
क्षमता के विकास में सहायक
इस क्रम में
रक्तचाप, मानसिक तनाव, रक्तसीरम में संतुलन को लेकर कुछ योगासनों पर अनुसंधान
हुए जिसमें शीर्षासन को महत्वपूर्ण स्थान मिला है। इस क्रम में ‘पोलैण्ड के थर्ड
क्लीनिक ऑफ मेडीसिन’ के डायरेकटर एलेक्जान्ड्री विच (जूलियन) ने शीर्षासन व शवासन
के द्वारा शरीर के अंग-अवयवों पर पड़ने वाले प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन करते हुए
बताया कि खाली पेट रहकर 30 से 40 मिनट शीर्षासन कराने के बाद विश्राम की अवस्था
लाकर योगाभ्यासी को शवासन कराने से उसके शरीर में रक्त को जमाने वाले पदार्थ
अर्थात सीरम की मात्रा में विशेष सन्तुलन आने लगता है। साथ ही श्वेत रक्त कणों में
वृद्धि होती है, जिससे शरीर की
जीवनी शक्ति मजबूत होती है तथा व्यक्ति में रोग-निरोधक क्षमता अत्यधिक मात्रा में
विकसित होती है।
फर्स्ट
कॉन्फ्रेंस आन दि एप्लीकेशन ऑफ योग इन रिहेविलिटेशन थेरेपी
इसी प्रकार
शीर्षासन करने से फेफड़ों में ऑक्सीजन की खपत में 33 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई, जबकि श्वास गति की दर एवं मात्रा में काफी कमी पाई गई।
श्वास की मात्रा प्रति मिनट 8 के स्थान पर 3 हो गई, साथ ही फेफड़ों में उसको ‘कन्ज्यूम’ करने की क्षमता बढ़ गई।
ऐसे शीर्षासन करने वाले लोगों का वक्षस्थल फैला हुआ एवं हृदय पूरी तरह दबाव रहित
देखा गया। इसी प्रकार भुजंगासन को लेकर चैकोस्लोवाकिया में अस्सी के दशक में
सम्पन्न ‘‘फर्स्ट कॉन्फ्रेंस आन दि एप्लीकेशन ऑफ योग इन रिहेविलिटेशन थेरेपी’’ में
प्रयोगकर्त्ताओं ने पाया कि रक्तचाप और मानसिक तनाव को नियमित करने में इस आसन से
सहायता मिलती है। इसी प्रकार सर्वांगासन, मयूरासन को सामान्य स्वास्थ्य सम्वर्धन और दुर्बलता ग्रसित रोगियों के लिए
तुलनात्मक दृष्टि से अधिक उपयोगी पाया गया।
योग में अनेक
रोगों को दूर करने की शक्ति
इसी क्रम में दशकों
पूर्व हृदय रोग विशेषज्ञ चिकित्सक ‘चिंकॉन्सटेनिटन बुटिको’ ने दमा से पीड़ित
रोगियों को प्रचलित औषधियों की अपेक्षा उन्हें यौगिक श्वसन की क्रिया अर्थात
प्राणायाम का अभ्यास कराया, जिसके उत्साह जनक
परिणाम आये। उन्होंने पाया कि यदि शरीर में प्रवेश करने वाली ऑक्सीजन व कार्बन-डाई
ऑक्साइड के बीच के असंतुलन में संतुलन पैदा किया जा सके, तो दमा जैसे रोग से रोगी को सहज मुक्त किया जा सकता है।
उन्होंने प्राणायाम व आसनों के द्वारा अनेक रोगियों के दमा रोग को पूर्णतः दूर
किया। वे विशेषज्ञ यहीं नहीं रुके अपितु उन्होंने अपनी उक्त अवधारणा पर यौगिक
क्रिया का प्रयोग करते हुए दमा के अतिरिक्त मिर्गी, उच्च रक्तचाप एवं हृदय रोग जैसी भयानक बीमारियों को दूर
करने वाले सफल और उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त किये और संदेश दिया कि योग में ऐसे अनेक
रोगों को दूर करने की शक्ति है।
मांसपेशियों में
लचीलापन एवं स्फूर्ति एवं शक्ति
अब तो भारत के
चिकित्सा अनुसंधान में भी शरीर के शक्ति, स्फूर्ति एवं लचीलेपन के लिए चिकित्सकों द्वारा प्रतिदिन प्रातः-सायं दो बार सर्वांगासन,
हलासन, मयूरासन, पादहस्तासन,
उत्तान पादासन, शीर्षासन, शवासन आदि सरल
आसन एवं कुछ अन्य यौगिक क्रियाएँ करानें के सकारात्मक परिणाम आये। मंत्र-उपासना,
प्रार्थना एवं ध्यान साधना आदि के प्रयोग का भी
उनके भार, मूत्र परीक्षण, रक्त शर्करा, ब्लड ग्लूकोज की जाँच तथा हृदय के ई-सी-जी- परीक्षण पर
सकारात्मक प्रभाव रहा। अनेक योग चिकित्सकों का मत है कि ‘‘हृदय रोगियों की स्थिति
के अनुसार उन्हें शवासन, हलासन, सर्वांगासन और विपरीत करणी मुद्रा आदि के
महीनों नियमित अभ्यास के बाद रोगियों को पहले की अपेक्षा अच्छा लाभ होता है।
मांसपेशियों में लचीलापन एवं स्फूर्ति एवं शक्ति का अनुभव करते हैं।’’
ग्लूकोज की मात्रा
एवं पैन्क्रियाज से स्त्रावित इन्सुलिन की मात्रा के बीच संतुलन
इसके अतिरिक्त
वर्तमान में मधुमेह, जिसे लेकर आधुनिक
‘मेडीकल साइन्स’ के पास कोई सुनिश्चित उपचार नहीं है, पर भारतीय ऋषियों ने इसके उपचार हेतु विशेष योग और आसनों की
खोज कर ली थी। ज्ञातव्य कि 400 ई- पू- में
भारतीय ऋषि सुश्रुत ने मधुमेह और उसके समाधान की खोज कर योग, आसन व प्राणायाम के माध्यम से रक्त में ग्लूकोज
की मात्रा एवं पैन्क्रियाज से स्त्रावित इन्सुलिन की मात्रा के बीच संतुलन को खोज कर
अनेक रोगियों को रोगमुक्त किया था।
उपर्युक्त प्रयोगों
से स्पष्ट है कि जड़ीबूटी, योग, आसन, व्यायाम व प्राणायाम आदि विधाओं को जीवन व्यवहार में नियमित स्थान दे करके
जीवन को स्वस्थ-समुन्नत बनाया जा सकता है। साथ ही आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी को
योग-आसन, प्राणायाम के द्वारा
संतुलित एवं सुव्यवस्थित भी किया जा सकता है।
योग साधना के
सहारे स्वास्थ्य, चिकित्सा,
प्रबंधन, जीवनशैली, समाज संतुलन आदि
पक्षों पर गुरुनिर्देशन में वर्षों किये गये शोधकार्य को जन-जन व समाज के बीच
स्थापित करने का अभियान चलायें, जिससे स्वस्थ
जीवन एवं सुखी भारत का निर्माण किया जा सके।

No comments:
Post a Comment