Thursday, 30 June 2022

प्रकाश की साधना करें, जीवन को नव ऊर्जा से भरें

 


सबसे शुभतम ऊर्जा है प्रकाश

भारतीय संस्कृति प्रकाश की संस्कृति है, संसार के जो भी पदार्थ हैं वे भी प्रकाश के ही कण से भरे हैं। प्रकाश इस संसार में सबसे शुभतम ऊर्जा है, हर पदार्थ प्रकाश के ही रूप है। जितनी गहराई में हम जाते हैं, वहां पदार्थ नहीं केवल ऊर्जा मात्र मिलती है। जो कुछ पदार्थ हमें दिखते हैं, यदि उसके माल्यीक्यूलर, अणु, ऐटम व इलेक्टान, प्रोटान, न्यूटान जो दिखते हैं वे विद्युत कण प्रकाश ही है। ऊर्जा ही पदार्थ रूप में अभिव्यक्त होती है। संसार भी प्रकाश रूप है, वही चेतन तत्व है। प्रकाश वह शक्ति है, कि जीवन प्रकाश के बिना जी ही नहीं सकता। प्रकाश न हो, तो वृक्ष नहीं रहेंगे, फूल नही होंगे, बच्चा पैदा होता है, तो बच्चे के लंग्स व हार्ड में कनेक्शन प्रकाश की पहली किरण पड़ने पर होता है। सुबह उठने की बात प्रकाश से जुड़ने, सूर्य उपासना के लिए कही गयी है, जहां प्रकाश व सूरज नहीं है वहां के लोग डिप्प्रेशन होने लगता है। जो देर देर तक उठते हैं, वे अधिक डिप्प्रेशन के शिकार होते हैं। भोजन को ऊर्जा में परिवर्तित भी प्रकाश ही करता है। गायत्री से भी उसी तेज की उपासना करते हैं।

आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी में भी प्रकाश के तत्व विद्यमान हैं

प्रकाश के अभाव में शरीर के अणुओं पर अनेक प्रकार के दुःख पड़ते हैं। योग, ध्यान और प्राणायामो द्वारा प्रकाश की ही साधना हम करते हैं। प्रकाश से जुड़ने की बहुत ही सरल विधियां हैं, प्राणायाम को ही लें जिसे कोई भी व्यक्ति आसानी से कर सकता है। प्राण की साधना अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाश की ही साधना है, प्रकाश ही साक्षात ब्रह्म (ईश्वर) है, उसी के प्रकाश से प्रकृति उत्त्पन्न हुई है। जब श्वास द्वारा शरीर में वायु को प्रेरित किया जाता है, तो वह प्राण प्रकाश रूप में ही बनकर हमें ऊर्जा देता है। आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी में भी प्रकाश के तत्व विद्यमान हैं, वे सभी मिलकर हमारे शरीर को शक्ति देकर जीवित रखते हैं।

                हम बात प्राणायाम की करें, तो योग दर्शन का मंत्र  संदेश देता है-

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वास योर्गतिर्विच्छेदः प्राणायामः।

अर्थात् आसन की सिद्धि होने पर श्वास-प्रश्वासों की गति को नियंत्रित करना ‘प्राणायाम’ है। तो प्राण के प्रकाश को ही धारण करता है। इस प्राणतत्व के संदर्भ में विज्ञान कहता है कि प्राण ही शरीर के कण-कण में व्याप्त है, जब शरीर में कर्मेंद्रियादि सो जाती हैं, तब भी यह प्राण नहीं सोता, न विश्राम करता है। रात-दिन वह अनवरत रूप से कार्य करता रहता है, चलता ही रहता है, क्योंकि वह अंदर प्रकाश रूप में ऊर्जा देने लगता है और प्रकाश का कार्य है- चरैवेति चरैवेति’

 

 

प्राणायाम बनाम प्रकाश

श्वास लेने पर वाह्य वातावरण से जब वायु शरीर के अंदर फेफड़ों में पहुंचती है और बाहर छोड़ने पर जो वायु बाहर निकलती है, इसमें श्वास ही शरीर में नहीं आता, प्राण वायु या आक्सीजन ही नहीं आती, अपितु प्रकाश रूप में दिव्य ऊर्जा अंदर आती है, जो शरीर में जीवनी-शक्ति का कार्य करती है। प्रकाश की ऊर्जा होने के कारण ही प्राणायाम से इंद्रियों  में व मन में प्रखरता आती है, उसके दोष दूर होते हैं। वास्तव में मानव के दोनों फेफड़े श्वांस के रूप में अप्रत्यक्ष रूप में प्रकाश को भीतर भरने वाले वे यंत्र हैं, जिनके प्रवेश से समस्त शरीर के अणु-अणु में प्रकाश ऊर्जा भरती है और अणु अणु तथा अंग-अवयवों की कालिमा-मलिनता कार्बन डाइआक्साइड के रूप में बाहर निकालती है। इसप्रकार जिंदगी की थकान-निराशा-हताशा-तनाव आदि दूर करने के लिए प्राणायाम कारगर साबित होता है।

प्रकाश ऊर्जा से ही जीवन के स्ट्रैस कैसे मिटते हैं?

प्रकाश ऊर्जा से ही जीवन के स्ट्रैस मिटते हैं, नकारात्मक हारमोंस कमजोर पड़ते तथा सकारात्मक हार्मोंस का ड्डाव अत्यधिक मात्र में होने लगता है। इन हार्मोंस के ड्डावित होने से रोग प्रतिरोधक क्षमता तेजी से विकसित होती है। असाध्य रोग दूर करने में मदद मिलती है। यही नहीं प्राणायाम के पूर्ण अभ्यास से व्यक्ति का जीवन प्रकाशमय हो उठता है तथा जीवन सकारात्मक विचार, चिंतन व उत्साह से भरता है और उसके वात, पित्त, कफ त्रिदोषों का शमन होता है। पाचन-तंत्र पूर्ण स्वस्थ होने लगते हैं, हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क तथा शारीरिक सम्बन्धी समस्त रोग दूर होते हैं। शरीर में प्राणायाम के सहारे प्रकाश प्रवेश करने से मोटापा, मधुमेह, कोलेस्ट्राल, कब्ज, गैस, अम्लपित्त, श्वास रोग, एलर्जी, माइग्रेन, रक्तचाप, किडनी के रोग, पुरुष व स्त्रियों के समस्त साध्य-असाध्य रोग दूर होते हैं। चेहरे पर झुर्रियां पड़ना, नेत्र ज्योति के विकार, स्मृति दौर्बल्य आदि दूर होते हैं तथा मुखमंडल पर ओज, तेज व शांति आती है। मन स्थिर, शांत व प्रसन्न तथा उत्साहित होता हैं तथा यही प्रकाश उच्च स्तर पर प्रवेश करने पर चक्रों के शोधन, भेदन व जागरण प्रारम्भ होते हैं तथा आध्यात्मिक शक्ति प्राप्ति होती है। आइये हम सभी गुरु मार्गदर्शन में नित्य प्रकाश की

साधना करें, जीवन को नव ऊर्जा से भरें।

Friday, 24 June 2022

Unblock all 7 Chakras: Guided Meditation for Aura cleansing and Healing

 Unblock all 7 Chakras: Guided Meditation for Aura cleansing and Healing



Take some time for yourself and meditate to relieve stress and rejuvenate your mind and body. This is a very powerful meditation technique, created by Dr Archika Didi, which helps you feel emotionally balanced and secure and establish a strong connection between mind and body.

 

00:00 1. 128 Hz (Root Chakra Muladhara) Chant “Lam.” Element: earth. Energy: safe, grounded. Action: I am.

00:49 2. 144 Hz (Sacral Chakra Svadhishthana) Chant “Vam”. Element: water. Energy: in the flow. Action: I feel.

01:31 3. 192 Hz (Solar Plexus Chakra Manipura) Chant “Ram”. Element: fire. Energy: self-mastery. Action: I do.

02:07 4. 216 Hz (Heart Chakra Anahata) Chant “Yam”. Element: air. Energy: love, the drum that needs no drummer. Action: I love.

02:58 5. 228 Hz (Throat Chakra Vishudda)  Chant “Ham”. Element: ether. Energy: creativity, expression, purification. Action: I speak.

03:34 6. 364 Hz (Third Chakra Eye Ajna) Chant “Aum”. Element: transcendent. Energy: mind. Action: I see.

04:24 7. 606 Hz (Crown Chakra Sahasrara)  Chant: instead of chanting, we just listen. Element: nothing, everything, and all that is between and beyond that. Action: I know.

Thursday, 23 June 2022

गुरु पूर्णिमा -आध्यात्मिक पूर्णता का महापर्व

 गुरु पूर्णिमा -आध्यात्मिक पूर्णता का महापर्व


ईश्वर की कृपा से हर इंसान का जन्म मां की कोख से होता है, लेकिन उसे जीवन की आध्यात्मिक सफलता गुरु की चरण-शरण से प्राप्त होती है। शास्त्र गुरुभक्ति के प्रताप की महिमा बताते हुए कहते हैं कि क्षण मात्र गुरु सान्निध्य और गुरु गौरव गान से जीवात्मा के सद्गति का योग सहज बन जाता है। स्वयं भगवान शिव देवी पार्वती से कहते हैं गुरु सम्पूर्ण जप, पूजा, उपासना, ध्यान आदि का मूल है-

‘‘ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोःपदम्। मंत्रमूलं गेरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोःकृपा।।’’

अर्थात् गुरुमूर्ति ध्यान का मूल है, गुरु चरण पूजा का मूल है, गुरु वाक्य कल्याणकारक मूलमंत्र है और गुरुदेव की कृपा साक्षात् मोक्ष का मूल है। अर्थात् हर शिष्य के लिए गुरु ही उसके जीवन, ज्ञान, तप, संकल्प, सेवा के मूल आधार होते हैं, उसी से मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने की ऊर्जा शक्ति मिलती है। इस दृष्टि से गुरु और शिष्य का सम्बन्ध चेतना के उच्च धरातल का सम्बंध माना गया है। इस दृष्टि से प्रति वर्ष आने वाली गुरु पूर्णिमा गुरु-शिष्य की आध्यात्मिक पूर्णता की अनुभूति का महोत्सव कह सकते हैं।

गुरु-शिष्य का सम्बंध जन्म-जन्मांतर का है

गुरु-शिष्य का सम्बंध इसी जन्म का नहीं होता, अपितु अनेक जन्मों का, जन्म-जन्मांतर का होता है। शिष्य व गुरु के जन्म अवश्य बदल सकते हैं, पर दोनों के बीच जुड़ी प्रगाढ़ डोर अनन्तकाल तक के लिए जुड़ी रहती है ऐसी शास्त्रीय मान्यता है। गुरु-शिष्य के बीच यह तारतम्यता सभी धर्मों में समान है। गुरु द्वारा शिष्य के साथ जन्मों तक साथ निभाना, गुरु द्वारा भावी शिष्य की वर्षों तक प्र्रतीक्षा करने के अनेक उदाहरण हमारे गुरु-शिष्य परम्परा में भरे पडे़ हैं।

इसे हम ‘सूफी फकीर बायजीद’ के उदाहरण से समझ सकते हैं, बायजीद ने स्वयं जिक्र किया है कि वे अपने गुरु के तलाश में थे। उनकी तड़प अत्यंत तीव्र होती जा रही थी। वे खोजते-खोजते एक जलाशय के पास पहुचे, तभी वहां एक फकीर पहुंचा और कहने लगा आप चाहें तो मैं बता दूं आप क्यों परेशान हैं? जिसके लिये परेशान हैं? और वह किस स्थिति, किन लक्षणों के साथ मिलेगा? आप चाहें तो अपने गुरु को निश्चित पा सकते हैं। बायजीद उत्साहित हुए, पर उस फकीर के बताये अनुसार खोजते-खोजते बारह साल से अधिक का समय गुजर गया। अब बायजीद को निराशा घेरने लगी, पर उनका अंतःकरण उस फकीर की बातों पर आज भी गहरा विश्वास जगा रहा था। एक शाम बायजीद हताश होकर एक सुनसान जगह पर बैठे थे, तभी उन्हें दूर झाड़ियों में एक अलौकिक रोशनी दिखी। वे कौतूहल के साथ उस रोशनी की ओर बढ़ चले।

               

बायजीद ने झुरमुट के पास पहुंच कर देखा तो वहां फटे-पुराने कपडे़ में एक बूढ़ा आदमी बैठा था और उसमें फकीर के बताये अनुसार वे सभी लक्षण नजर नजर आ रहे थे, जिसकी वह खोज में था। बायजीद खुशी से झूम उठा और श्रद्धा भरे मन से उसने उस फकीर के पांव पकड़ लिए। फकीर ने भी बायजीद के सिर पर स्नेह भरा हाथ फेरते हुए बोला-‘‘उठो मेरे बच्चे! मैं तुम्हारा कब से इंतजार कर रहा था।’’

बायजीद को उस फकीर की आवाज जानी-पहचानी लगी, उसने सिर उठाकर उस बूढ़े चेहरे को देखा, तो आश्चर्य में चीख पड़ा और भावुक स्वर में बायजीद ने फकीर से पूछा- कि आप तो वही फकीर हो न, जिसने आज से बारह साल पहले हमारे गुरु के लक्षण बताए थे।

‘‘मेरे गुरुदेव! आपने मुझे क्यों भटकने को छोड़ दिया, उसी समय क्यों नहीं अपना शिष्य बना लिया?’’ तब फकीर ने कहा ‘‘मेरे बच्चे! उस समय तुममें शिष्य लायक परिपक्वता नहीं थी, इसलिए हमारे बताये लक्षणों को तुम हमारे अंदर देख नहीं पाये। इतने वर्षों में तुम्हारी तड़पन और तपःपूर्ण जिन्दगी ने मुझे गुरु रूप में वरण करने के योग्य बना दिया है। अब तुम्हारी दृष्टि खुल गयी है, तुम गुरु मंत्र धारण करने के योग्य बन चुके हो और मैं तुम्हारा गुरु बनने के लिए तैयार हूं।’’ कहने का आशय है शिष्य में अपने गुरु को पहचानने की क्षमता और गुरु द्वारा किसी को शिष्य रूप में वरण करने की स्थिति के बीच कुछ निश्चित आध्यात्मिक मापदण्ड होते हैं, अन्यथा परस्पर सामने बैठे गुरु-शिष्य भी जन्मों तक एक दूसरे को अपना नहीं पाते।

गुरु पूर्णिमा -  योग्य दुर्लभ दृष्टि जगाने का अवसर

                गुरु पूर्णिमा प्रतिवर्ष हम सबके जीवन में गुरु को पहचानने और शिष्य भाव को परिपक्व करके गुरु धारण करने योग्य दुर्लभ दृष्टि जगाने का अवसर लेकर आती है, जो परिपक्व हो चुके हैं, उनको गुरु वरण करने और शिष्य बनने का सौभाग्य मिलता है, उन्हें गुरु पूर्णिमा पूर्णता का वरदान देती है। जिन साधकों में गुरु धारण करने की परिपक्वता जग जाती है, उन्हें सद्गुरु अपना लेते हैं। शिष्य भाव जागते ही गुरु की समस्त विद्याएं और क्षमताएं शिष्य की हो जाती हैं और शिष्य गुरु भाव से भर उठता है। इस प्रकार इस विशेष अवसर पर प्राप्त गुरुमंत्र सद्गुरु का शिष्य के लिए दिव्य आशीष बन जाता है, गुरुपर्व उस आशीष की अभिव्यक्ति भी है। कहते हैं शिष्यों को हर पूर्णिमा तिथि पर गुरुदर्शन करने से सोलह कलाओं से युक्त पूर्ण चन्द्र का आशीर्वाद मिलता है। जबकि गुरुपूर्णिमा पर शिष्य द्वारा गुरु दर्शन-पादपूजन से उसके जीवन पर सूक्ष्म जगत के संतों-ऋषियों एवं भगवान सभी की कृपा बरसती है। शिष्य के सौभाग्य का उदय होता है। इसे आध्यात्मिक सम्पूर्णता का महापर्व भी कहा जाता है।

क्या विशेष करें गुरु पूर्णिमा के दिन

                इसीलिए इस खास दिवस गुरु पूर्णिमा पर हर शिष्य को अपने गुरुधाम पहुंचकर गुरु के दर्शन-पादपूजन, गुरुदक्षिणा देने, गुरु-चरणों में बैठने का लाभ अवश्य लेना चाहिए, भले उसका गुरु सात समंदर पार ही क्यों न बसता हो। इससे शिष्य के जीवन में पूर्व जन्म के संस्कारों का पुण्य फलित होता है, पविार में सुख, शांति, समृद्धि की वर्षा होती है। वास्तव मेंं विविध अवसरों पर सद्गुरुओं, सच्चे संतों का आदर सम्मान, गुरु पूजा करना, गुरुदक्षिणा देना किसी व्यक्ति के आदर तक ही सीमित नहीं रहता, अपितु वह साक्षात् सच्चिदानन्द परमेश्वर का आदर बन जाता है। इस पर्व पर गुरु के दर पर किया गया दान-पुण्य, गुरुकार्यों में किसी भी तरह का सहयोग अनंत फलदायी होता है। गुरु कृपा से उसकी झोली सुख-समृद्धि से आजीवन भरी रहती है। आइये हम सब अपने एक-एक पल का सदुपयोग करते हुए आनन्द, शक्ति, शांति के साथ गुरुधाम पधारने, गुरु संगत-सानिध्य में रहने का अवसर तलाशें, सम्भव है हमारा शिष्य भाव परिपक्व होकर हमारे भी जीवन में गुरु घटित हो पडे़ और गुरु-शिष्य के अनुपम योग का सौभाग्य मिल जाये।




Friday, 17 June 2022

REMAIN ALERT AND BE STRONG



 REMAIN ALERT AND BE STRONG

Balance yourself

In the same way when there are disappointments keep the flowers of smile blooming. You should smile more when you feel sadder because at that time you need happiness. When the body becomes weak there is a need for some tonic. You have to balance yourself when you are not able to balance yourself.

 

Have more patience

When you begin to lose confidence then you need to have more patience. You will have to console yourself more than ever before. You will have to wipe your own tears yourself. Nobody will come forward to give you encouragement. You will stay in the crowded world but you will have to stay there all alone. Whenever you need something the most that too will go away from you. Conditions and time will stand against you.

Have full confidence

However, when you are in a good and positive frame, many people will force themselves on you and give you advice and pretend to be your well-wishers. Hence do not become weak, remain alert, be strong and have full confidence in yourself.

Encouraging and inspiring for a good cause

Behave like a commander: If you become weak many forces will come around you to weaken you further. In fact, no one becomes weak by himself but the circumstances make one weak. But remember this – do not let the weaknesses surround you to an extent that you become helpless to fight them away. A good commander is the one who does not let his forces become weak, keeps on encouraging the soldiers and raising their moral and spirits. You should become the source of inspiration for the members of your family. Keep on encouraging them and inspiring them for a good cause. Lead them to reach their goal.

Don’t shed tears in front of the world

You should be a source of strength to them all. If there are tears in your eyes for some reason or the other, do not shed them in front of the world – rather cry, if you must, discreetly. Never cry before the world otherwise people will feel disheartened seeing the commander crying. Tears in the eyes of the commander are the signs of weakness. The commander has to be brave and put up a brave face. Remember this – you are like a commander in the midst of the members of your family whether they are big or small. It is a good thing to have a consultation with them but the consultation should not be the sign of any weakness. Do not surrender before anyone. Hold fast to your views, but do not impose your views on others. Try to build a consensus. This is the quality of a good leader.

To be the reason for happiness

Never make people cry: Take it from me – anyone who has come to this world had wept some time whether it was Lord Rama or Lord Krishna. All of them had to cry some time for some cause or the other. Anyone who had taken birth had cried because without crying they would not be able to breathe. A child must cry to live and that becomes the reason for happiness for the family.

It is far more interesting to know that many people in the world express their joy when people cry. People often feel joyous by making people cry for life, but outwardly they express their sympathies with them and say that these people are facing what they had done in their previous life. This is the view of this world.

Thursday, 16 June 2022

जीवन और समाज को योगमय बनायें

 जीवन और समाज को योगमय बनायें



योग-आयुर्वेद की ओर मुड़ना

स्वस्थ जीवन, निरापद चिकित्सा, सौभाग्यमय परिवार व देवमय समाज के लिए हमारा भारत प्राचीन काल से जाना जाता रहा है, इसका आधार रहा है योग और आयुर्वेद। जबकि आधुनिक विज्ञान की खोज ने एलोपैथी का प्राकट्य किया और मानव स्वस्थ जीवन के नव आकर्षण में फसने लगा और मात्रा दो सदियों के अंदर ही स्वस्थ-समाज की रंगत फीकी पड़ गयी। आज भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व एलोपैथी के साइड इफेक्ट से चिंतित है, अतः पुनः विशेषज्ञ भारतीय ऋषियों की आत्म अनुसंधित विधा योग-आयुर्वेद की ओर मुड़ रहे हैं। यद्यपि गौर करें तो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने दुनियां को बहुत कुछ दिया, रोग और रोगी को लेकर एक नई दृष्टि दी। सर्जरी के सहारे इसने गंभीर से गंभीर रोगियों को मौत के मुंह से निकालने में मदद की। इस आधार पर सम्पूर्ण उन्नीसवीं व वीसवीं सदी के स्वास्थ्य का दारोमदार आधुनिक चिकित्सा पर ही टिक गया।

 

वैसे ऐलोपैथी जीवन को बाहर प्रयोग किसे गये तत्वों के सहारे स्वास्थ्य लाभ पहुंचाने में कही तक कारगर तो हुई, पर जीवन के अंदर से समाधान न खोज पाने के कारण सम्पूर्ण शरीर को कैमिकल का ढांचा मान कर चलने लगी, बस यहीं यह फेल हुई। अनुसंधान की दिशा की दृष्टि से भी यह असफल रही, क्योंकि इस चिकित्सा में जो युगीन प्रयोग होने चाहिए थे, वे न हो पाये। आज एलोपैथी के सर्जरी पक्ष को छोड़ दें, तो एलोपैथी से लोग कतरा कर योग, आयुर्वेद, प्राणायाम जैसी प्राचीन परम्परा की ओर मुड़ रहे हैं।

योगमय जीवनचर्या द्वारा आत्मबल को जगाये

सम्पूर्ण विश्व के चिकित्सा विशेषज्ञ रोग और रोगी पर जड़ी-बूटी, योग-प्राणायाम के सकारात्मक प्रभाव को लेकर शोध-अनुसंधान में जुटे हैं।

पूज्य गुरुदेव भी विश्व जागृति मिशन के जन्मकाल से जन-जन को इस संदर्भ में जागरूक करने एवं योगमय जीवन चर्या द्वारा आत्मबल को जगाने, स्वास्थ्य लाभ पहुंचाने और शारीरिक-मानसिक-भावनात्मक स्तर पर व्यक्ति को मजबूत करके उसे अपने निज स्वभाव में स्थिर करने हेतु प्रयत्नशील रहे हैं। इसके लिए मिशन ने शोध कार्य किये और उन निष्कर्षों से जन-जन को जोड़ने की रूपरेखा तैयार की, जिससे समाज को स्वस्थ-निरोग व गरिमामय बनाया जा सके। हम कुछ दशक पूर्व विश्व के विशेषज्ञों के द्वारा योग-प्राणायाम को लेकर सम्पन्न हुए कुछ प्रयोगों का अवलोकन करें, तो उनको चौकाने वाले संकेत मिलते हैं।

रोग-निरोधक क्षमता के विकास में सहायक

इस क्रम में रक्तचाप, मानसिक तनाव, रक्तसीरम में संतुलन को लेकर कुछ योगासनों पर अनुसंधान हुए जिसमें शीर्षासन को महत्वपूर्ण स्थान मिला है। इस क्रम में ‘पोलैण्ड के थर्ड क्लीनिक ऑफ मेडीसिन’ के डायरेकटर एलेक्जान्ड्री विच (जूलियन) ने शीर्षासन व शवासन के द्वारा शरीर के अंग-अवयवों पर पड़ने वाले प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन करते हुए बताया कि खाली पेट रहकर 30 से 40 मिनट शीर्षासन कराने के बाद विश्राम की अवस्था लाकर योगाभ्यासी को शवासन कराने से उसके शरीर में रक्त को जमाने वाले पदार्थ अर्थात सीरम की मात्रा में विशेष सन्तुलन आने लगता है। साथ ही श्वेत रक्त कणों में वृद्धि होती है, जिससे शरीर की जीवनी शक्ति मजबूत होती है तथा व्यक्ति में रोग-निरोधक क्षमता अत्यधिक मात्रा में विकसित होती है।

फर्स्ट कॉन्फ्रेंस आन दि एप्लीकेशन ऑफ योग इन रिहेविलिटेशन थेरेपी

इसी प्रकार शीर्षासन करने से फेफड़ों में ऑक्सीजन की खपत में 33 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई, जबकि श्वास गति की दर एवं मात्रा में काफी कमी पाई गई। श्वास की मात्रा प्रति मिनट 8 के स्थान पर 3 हो गई, साथ ही फेफड़ों में उसको ‘कन्ज्यूम’ करने की क्षमता बढ़ गई। ऐसे शीर्षासन करने वाले लोगों का वक्षस्थल फैला हुआ एवं हृदय पूरी तरह दबाव रहित देखा गया। इसी प्रकार भुजंगासन को लेकर चैकोस्लोवाकिया में अस्सी के दशक में सम्पन्न ‘‘फर्स्ट कॉन्फ्रेंस आन दि एप्लीकेशन ऑफ योग इन रिहेविलिटेशन थेरेपी’’ में प्रयोगकर्त्ताओं ने पाया कि रक्तचाप और मानसिक तनाव को नियमित करने में इस आसन से सहायता मिलती है। इसी प्रकार सर्वांगासन, मयूरासन को सामान्य स्वास्थ्य सम्वर्धन और दुर्बलता ग्रसित रोगियों के लिए तुलनात्मक दृष्टि से अधिक उपयोगी पाया गया।

योग में अनेक रोगों को दूर करने की शक्ति

इसी क्रम में दशकों पूर्व हृदय रोग विशेषज्ञ चिकित्सक ‘चिंकॉन्सटेनिटन बुटिको’ ने दमा से पीड़ित रोगियों को प्रचलित औषधियों की अपेक्षा उन्हें यौगिक श्वसन की क्रिया अर्थात प्राणायाम का अभ्यास कराया, जिसके उत्साह जनक परिणाम आये। उन्होंने पाया कि यदि शरीर में प्रवेश करने वाली ऑक्सीजन व कार्बन-डाई ऑक्साइड के बीच के असंतुलन में संतुलन पैदा किया जा सके, तो दमा जैसे रोग से रोगी को सहज मुक्त किया जा सकता है। उन्होंने प्राणायाम व आसनों के द्वारा अनेक रोगियों के दमा रोग को पूर्णतः दूर किया। वे विशेषज्ञ यहीं नहीं रुके अपितु उन्होंने अपनी उक्त अवधारणा पर यौगिक क्रिया का प्रयोग करते हुए दमा के अतिरिक्त मिर्गी, उच्च रक्तचाप एवं हृदय रोग जैसी भयानक बीमारियों को दूर करने वाले सफल और उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त किये और संदेश दिया कि योग में ऐसे अनेक रोगों को दूर करने की शक्ति है।

मांसपेशियों में लचीलापन एवं स्फूर्ति एवं शक्ति

अब तो भारत के चिकित्सा अनुसंधान में भी शरीर के शक्ति, स्फूर्ति एवं लचीलेपन के लिए चिकित्सकों द्वारा प्रतिदिन प्रातः-सायं दो बार सर्वांगासन, हलासन, मयूरासन, पादहस्तासन, उत्तान पादासन, शीर्षासन, शवासन आदि सरल आसन एवं कुछ अन्य यौगिक क्रियाएँ करानें के सकारात्मक परिणाम आये। मंत्र-उपासना, प्रार्थना एवं ध्यान साधना आदि के प्रयोग का भी उनके भार, मूत्र परीक्षण, रक्त शर्करा, ब्लड ग्लूकोज की जाँच तथा हृदय के ई-सी-जी- परीक्षण पर सकारात्मक प्रभाव रहा। अनेक योग चिकित्सकों का मत है कि ‘‘हृदय रोगियों की स्थिति के अनुसार उन्हें शवासन, हलासन, सर्वांगासन और विपरीत करणी मुद्रा आदि के महीनों नियमित अभ्यास के बाद रोगियों को पहले की अपेक्षा अच्छा लाभ होता है। मांसपेशियों में लचीलापन एवं स्फूर्ति एवं शक्ति का अनुभव करते हैं।’’

ग्लूकोज की मात्रा एवं पैन्क्रियाज से स्त्रावित इन्सुलिन की मात्रा के बीच संतुलन

इसके अतिरिक्त वर्तमान में मधुमेह, जिसे लेकर आधुनिक ‘मेडीकल साइन्स’ के पास कोई सुनिश्चित उपचार नहीं है, पर भारतीय ऋषियों ने इसके उपचार हेतु विशेष योग और आसनों की खोज कर ली थी। ज्ञातव्य कि 400 ई- पू- में भारतीय ऋषि सुश्रुत ने मधुमेह और उसके समाधान की खोज कर योग, आसन व प्राणायाम के माध्यम से रक्त में ग्लूकोज की मात्रा एवं पैन्क्रियाज से स्त्रावित  इन्सुलिन की मात्रा के बीच संतुलन को खोज कर अनेक रोगियों को रोगमुक्त किया था।

उपर्युक्त प्रयोगों से स्पष्ट है कि जड़ीबूटी, योग, आसन, व्यायाम व प्राणायाम आदि विधाओं को जीवन व्यवहार में नियमित स्थान दे करके जीवन को स्वस्थ-समुन्नत बनाया जा सकता है। साथ ही आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी को योग-आसन, प्राणायाम के द्वारा संतुलित एवं सुव्यवस्थित भी किया जा सकता है।

योग साधना के सहारे स्वास्थ्य, चिकित्सा, प्रबंधन, जीवनशैली, समाज संतुलन आदि पक्षों पर गुरुनिर्देशन में वर्षों किये गये शोधकार्य को जन-जन व समाज के बीच स्थापित करने का अभियान चलायें, जिससे स्वस्थ जीवन एवं सुखी भारत का निर्माण किया जा सके।

Friday, 10 June 2022

POWER OF KNOWLEDGE MAKES SOUL STRONG



 POWER OF KNOWLEDGE MAKES SOUL STRONG

About Ashtavakra

Ashtavakra had a disjointed and clumsy physique. There were eight broken joints in the body and a badly distorted weak personality. Rolling on the ground he reached the royal court of King Janak. Everyone in the court looking at him started laughing at him. They mocked at him. They wondered whether he was a human being or an animal or some other strange creature. He looked as a black disfigured and distorted figure not accepted generally by his looks by the people. However, what kind of power did he [possess to enter and be present in the royal court of King Janak and in a short time became the guru of the king. Instantly he became a worshipable celebrity in the same court in which he was joked about and mocked at. What was that power to bring him to such a high position in a short while.

Knowledge and intelligence cannot be distorted.

Ashtavakra puts a question in the court to everyone’s dismay and surprise – “The river is curved but the water which flows in the river is not curved. It flows straight; The sugarcane can be twisted and distorted but the juice inside the cane is not curved;

The world may look to be distorted but the maker of the world cannot be twisted or distorted. The body of the person can be distorted or twisted but his knowledge and intelligence cannot be distorted. The soul is not twisted. Now I want to know from you all whether you are the evaluators of the bones and skin or of the knowledge! Are you the people to acknowledge and welcome the knowledge or of the twisted body?”

King Janak accepted Ashtavakra to be his respected Guru.

Upon hearing such a well-structured question the people who had made fun of him stood up in reverence with folded hands and heads bowed down and said, “We all extend our greetings to this honourable and knowledgeable person. You are an extraordinary person in an ordinary body.”

By being associated with God there begin rising divine waves in the ocean of happiness. A new form begins to grow which makes realise the force of God and the power of knowledge. All the courtiers including the king were impressed with the knowledge of Ashtavakra. King Janak instantly accepted him to be his respected guru.

The mind should be stable and soul strong

While meditating on God and being in close proximity with God, such a situation arises. Though many people look simple and weak yet their spiritual power is strong and stronger still in their souls. Though not educated yet they possess strong divine power. Their mind is stable and soul strong.

 

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Thursday, 9 June 2022

ज्ञान ज्योति जलाने, पवित्रता जगाने का पर्व गंगा दशहरा और गायत्री जयंती



 प्राणशक्ति का होता है अपार अभिर्वधन

गुरु मार्गदर्शन में की गयी गायत्री साधना से साधक के पाप कटते हैं, कुसंस्कार जलते और जीवन कष्ट कठिनाइयों से मुक्त होकर सौभाग्य से भरता है। जो साधक माँ गायत्री और माँ गंगा की अविरलता का योग बनाकर जप साधना करते हैं, उनमें प्राणशक्ति का अपार अभिर्वधन होता है। आइये! गंगा दशहरा पर शक्ति स्वरूप पवित्रता की पर्याय माँ गंगा एवं विश्वमाता गायत्री की चेतना को आत्मसात करें, समुचित दान, व्रत, सेवा, सहयोग, सदभाव का संकल्प लें, जीवन व परिवार को सुख, शांति, सौभाग्य से भर लें।

माँ गंगा और वेदमाता गायत्री का लोक कल्याण के लिए धरा पर अवतरण

स्वर्गीय परिस्थितियां जब धरा पर बनने लगती हैं, तो जन जीवन में उत्सव आता है, चहुंदिशि सुख-सौभाग्य की वर्षा होती है। गंगा दशहरा एवं गायत्री जयंती का दिन स्वर्ग में निवास करने वाली माँ गंगा और वेदमाता गायत्री का लोक कल्याण के लिए धरा पर अवतरित होने का दिन है। इसलिए प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी को गंगा दशहरा और गायत्री जयंती मनायी जाती है। जीवन दायिनी माँ गंगा एवं ज्ञान की गंगा माता गायत्री दोनों के धरा पर प्राकट्य दिवस के कारण इसे क्रांतिकारी दिवस के रूप में मान्यता मिली। पौराणिक वर्णन है कि अपने शापित पूर्वजों की आत्मा के कल्याण हेतु राजा भागीरथ ने इस धरा पर माँ गंगा को अवतरित करने के लिए कठोर तपस्या किया, पृथ्वी पर गंगा का अवतरण हुआ।

स्वर्ग से माँ गंगा के आगमन का अर्थ

                स्वर्ग से माँ गंगा के आगमन का अर्थ है धरती को स्वर्गीय परिस्थितियों से हरा-भरा करना। इस प्रकार प्रेम, सेवा, सदभाव, पवित्रता भरे जीवन की स्थापना का दिवस भी है यह दिवस। जहां इस दिन पवित्र नदी में स्नान और दान करने से महायज्ञों के समान पुण्य की प्राप्त होने की मान्यता है, वहीं इस अवधि में गायत्री मंत्र का जप, साधना एवं चाण्द्रायण तप का विधान भी शास्त्रें में वर्णित है। माँ गंगा के साथ ऋषियों द्वारा स्थापित सदज्ञान परम्परा के प्रति समर्पण का संकल्प भी इसी दिन साधक लेते हैं। इस निमित्त देश, धर्म, संस्कृति, साधु, संत, परोपकारी जन, गरीब व जरूरत मंद की सेवा हेतु यथाशत्तिफ़ दान देने से पूर्वजों की प्रसन्नता व ईश्वर की कृपा मिलने की मान्यता है। स्कन्दपुराण की मान्यता है कि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी को माँ गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए इस दिन श्रद्धालुओं द्वारा स्नान, दान-पुण्य से मुक्ति व मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस वर्ष 09 जून 2022, गुरुवार को गंगा दशहरा एवं गायत्री जयंती मनाई जा रही है।

पवित्रता, प्रकाश, तेज और शक्ति रूप है गंगा-गायत्री

                यद्यपि ज्ञान की गंगा गायत्री व माँ गंगा जी दोनों ही पवित्रता, प्रकाश, तेज और शक्ति रूप है और तीनों काल में इनकी गतिशीलता है। मंत्रें में गायत्री मंत्र सर्वाधिक सशक्त है, जिससे आध्यात्मिक एवं भौतिक दोनों प्रकार के लाभ मिलने लगते हैं। वास्तव में आत्म शक्ति प्राप्त करने वाली दिव्य दृष्टि जिस शुद्ध बुद्धि से प्राप्त होती है, उसकी प्रेरणा गायत्री द्वारा ही मिलती है। गायत्री सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की धात्री है। गायत्री ही विश्व माता है। ‘‘मनौ वै सविता। प्राण धियः। प्राण एव सविता, विद्युदेव सविता।’’ अर्थात गायत्री मंत्र जप साधना से मानव के अतःकरण में सूर्य जैसी तेजस्विता विकसित होती है। ब्रह्मपुराण में महर्षि व्यास जी कहते हैं कि ‘‘मातृ शक्ति से बड़ी दुनिया में कोई शक्ति नहीं है। माँ ही सबको सम्हालती व सबको धारण करती, सबकी सहती और सबको धन-धान्य से भरती है। जिसके सम्हालने से व्यक्ति सम्भल जाय, जिसके बसाने से उसकी दुनिया बस जाय, वह मातृ शक्ति ही है। गायत्री इसी लिए विश्वमाता है, इसकी साधना से जीवन में सम्पूर्ण शक्तियां सहज जागृत होने लगती है।


दान, व्रत, सेवा, सहयोग, सदभाव का लें संकल्प

                इस प्रकार माँ गायत्री व्यक्ति को चेतना स्तर पर समृद्धि देती है, वहीं माँ गंगा भौतिक शक्ति की दात्री हैं। इनकी कृपा से धरा हरा भरा बनती है और व्यक्ति के अंतःकरण में पवित्रता का विकास होता है। माँ गंगा स्वयं में मंत्र है, गायत्री प्राणों को जगाती है, गंगा प्राणों को पवित्र करती हैं। सभी जानते हैं कि विश्वव्यापी प्राणशक्ति जहां व जिस व्यक्ति में जितनी अधिक मात्र में एकत्रित होती है, उसमें उतनी ही सजीवता दिखने लगती है। इस प्रकार माँ गंगा जी के तट पर गायत्री मंत्र जप से प्राणों का अद्भुत परिष्कार होता है, बुद्धि नीर-क्षीर विवेकी बनती है। साधक में दिव्य तेज भरता है, सफलता व सिद्धियों के द्वार खुलते हैं, स्वास्थ्य संवर्धन होता है। गुरु मार्गदर्शन में

विधिविधान के साथ किया गया 21 दिवसीय यह जप-अनुष्ठान साधक को अनेक सुख-सौभाग्यों से भर देते हैं। माँ गंगातट व पवित्र नदी, झील, सरोवर पर नियमित ठीक विधि से, ठीक समय पर, गुरु मार्गदर्शन में की गयी गायत्री साधना से साधक के पाप कटते हैं, कुसंस्कार जलते और जीवन कष्ट कठिनाइयों से मुक्त होकर सौभाग्य से भरता है। जो साधक गायत्री और माँ गंगा की अविरलता का योग बनाकर जप साधना करते हैं, उनमें प्राणशक्ति का अपार अभिर्वधन होता है।

आइये! गंगा दशहरा पर शक्ति स्वरूप पवित्रता की पर्याय माँ गंगा एवं विश्वमाता गायत्री की चेतना को आत्मसात करें, समुचित दान, व्रत, सेवा, सहयोग, सदभाव का संकल्प लें, जीवन व परिवार को सुख, शांति, सौभाग्य से भर लें।