बच्चे को माता-पिता से आशीर्वाद माँगना नहीं पड़ता, अपने आप हृदय से मिल जाता है और माँ-बाप के हृदय से निकले हुए इस आशीष की कोई समानता नहीं है। पर पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के कारण आज के युवा माँ-बाप को नमन-वन्दन करने में लजाते हैं, जब कि कोई बच्चा व युवा जब अपने माता-पिता, दादा-दादी अथवा सद्गुरु के चरणों में शीष झुकाता है, तो उनके दिल में आनन्द की हिलोर उठने लगती है और तेजरूपी प्रकाश की किरणें विनम्र् होते ही चरणों में झुके सुपुत्र, सदशिष्य के अन्दर प्रवेश कर जाती हैं। जिसके प्रतिफलस्वरूप उस युवा को आयु, विद्या, यश और बल की प्राप्ति होती है। ये चारों अनमोल उपहार किसी अन्य कीमत एवं किसी अन्य स्थान से प्राप्त नहीं हो सकते। इनका केन्द्र तो माता-पिता, वृद्धजन एवं गुरुजन ही हैं।
पूज्य सद्गुरुदेव श्री सुधांशु जी महाराज कहते
हैं-‘‘एक पिता अनेक
बच्चों को पाल पोस कर योग्य बना देता है, लेकिन सारे बच्चे एक पिता का ठीक से ख्याल नहीं
रख पाते। महापुरुषों, संत जनों की सेवा करना तो दूर घर में बैठे हुए माता-पिता तक
को पूछने को तैयार नहीं हैं। जरा सोचिए बचपन में जिन्होंने लाड-प्यार से पालकर
आपको बड़ा किया, वे बुढ़ापे में अपना तिरस्कार कैसे स्वीकार करें।’’ वास्तव में आज युवा-पीढ़ी जो कर रही है, उसके लिए सारा दोष
युवावर्ग का भी नहीं, इन पर स्कूल-कालेजों की पढ़ाई और माँ-बाप के संस्कार दोनों
का प्रभाव है।
तब उतरेगा धारती पर
स्वर्गः
परिवार विश्लेषक कहते हैं कि बच्चों को अधिकार
देने में कसर न छोड़े, लेकिन उनको चाबियां देने से पहले अपने लिए इतना जरूर
कर लें कि आप संतान के आगे हाथ फैलाने की
स्थिति में आ जाएं, अन्यथा न जाने कितनी बार खून के आंसू रोना पड़ेगा। सच कहें ‘‘बूढ़े व्यक्ति के पास
स्मृतियां, जवान के पास कल्पनाएं हैं, यदि घर-घर दोनों का मेल बने तो कमाल हो जायेगा। धरती पर
स्वर्ग उतर आयेगा’’
जीवन के अन्तिम भाग तक दूसरों की सेवा, सहायता, सहयोग की कामना तो रखें, मगर ध्यान रहे कि किसी से
माँगने की नौबत कभी न आये। जबकि नई पीढ़ी को चाहिए माता-पिता के उत्तम गुणों के
वारिस बनें, अपने बड़ों को मान दें, क्योंकि वृद्धों का जो वर्तमान है,
वही युवाओं का भविष्य है।
इसलिए यदि नई पीढ़ी अपने बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेंने,
उनका देवताओं की तरह पूजन
करने, मिलकर रहने, सहयोग करने की सोच अपना
ले, तो घरों के अन्दर
प्रेम, सद्भाव जाग जाएगा
और धरती में स्वर्ग उतर आयेगा।
जरूरत है युवा-वर्ग माँ-बाप की अवहेलना न करे।
बड़ों के प्रति सम्मान की भावना रहे। क्योंकि बूढ़ी आंखों में जब आंसू आते हैं, हृदय पर जब व्यंग बाण
लगते हैं, शरीर काम नहीं
करता और नींद आती नहीं तो ऐसे में व्यक्ति का जीना कठिन हो जाता है।
बुजुर्ग अमूल्य भाव सम्पत्तिः
आज संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, युवावर्ग अपने ही स्वार्थ
की पूर्ति में बड़े-बुजुर्गों को बोझ मानता है।
आधुनिक चकाचौंध के प्रभाव
से पारिवारिक विघटन बढ़ रहा है, उससे वृद्धों की स्थिति दयनीय और विचारणीय होती जा रही है।
यही नहीं आज की पीढ़ी बुजुर्गों पर न तो समय लगाना चाहती है और न पैसा। जबकि बुढ़ापे
में आदमी को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की सहायता की जरूरत होती है। अपनों के
सहारे की जरूरत होती है। इसके लिए युवावर्ग को अपनी श्रेष्ठ परम्पराओं का पालन
करना होगा, तभी रास्ता निकलेगा। बड़े-बुजुर्ग भी अपना बड़प्पन रखते हुए अपना फर्ज निभाएं, जिससे छोटे उनका श्रद्धा
से सम्मान करें। वैसे भी बड़े-बुजुर्ग हमारी अमूल्य सम्पत्ति हैं। उनके पास अनुभवों
का खजाना है, अतः उनके अनुभवों का लाभ उठाएं। कभी भूलकर भी उनसे अपशब्द न कहें। साथ ही अपने
बच्चों को बड़ों के पास बैठने का अवसर दिया करें, क्योंकि उनके आशीर्वादों से बच्चे फलते-फूलते
हैं। अन्य लोग स्वयं भी बुजुर्गों के पास दो मिनट बैठकर उनकी बात सुनें, उनका हाल-चाल पूछें।
भगवान श्रीराम माता-पिता को बहुत सम्मान देते
थे, उनकी आज्ञा का
सदा पालन करते थे। यदि पुनः परिवार में सुख-शांति चाहिए तो प्रत्येक पुत्र को
आदर्श मातृ-पितृ भक्ति मर्यादा का पाठ सीखना होगा।
जिस व्यक्ति के सिर पर माँ-बाप का साया है, वह धन्य है। घर में बड़े
बुजुर्गों का होना बहुत सौभाग्य माना जाता है और माँ-बाप की सेवा करने वाली सन्तान
श्रेष्ठ।
बुजुर्गों के सम्मान का
अवसर श्रधा पर्वः
हमारे यहां सभी प्रकार के
सम्बन्धों को मधुरता प्रदान करने के लिए समय-समय पर पर्व और त्यौहार मनाने की
परम्परा है। त्यौहारों की इस अनुपम शृंखला
में पूज्य गुरुदेव ने जीवित माता-पिता के जीवन में उल्लास भरने के लिए एक महान
पुण्यमय त्यौहार ‘श्रद्धापर्व’’ की प्रतिष्ठा सन् 1997 में की थी। हालांकि पुण्यमय भारत देश में मृत
माता-पिताओं की पुनीत स्मृतियों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने की प्रक्रिया श्राद्ध
और तर्पण प्राचीन काल से प्रचलित हैं। तथापि जीवित माता-पिता और पुत्र-पुत्रियों
के मध्य महत्वपूर्ण सम्बन्धों की उपेक्षा कैसे की जा सकती है? श्रद्धापर्व को त्यौहार
के रूप में मनाने के पीछे यही भावना है।
पूज्यवर कहते हैं ‘‘हमने मृत पितरों के सम्मान में श्राद्ध और
तर्पण की परम्परा को हृदय से स्वीकार किया है। किन्तु श्रद्धापर्व को भी मैंने एक
त्यौहार जैसा ही महत्व दिया है। अनेक त्यौहार खुशियों से हम मनाते हैं, ठीक वैसे ही श्रद्धापर्व
के दिन माता-पिता एवं वृद्धजनों को फल-फूल, मान-सम्मान, मिष्ठान और उपहार देकर उनकी सजीव मूर्तियों की
आरती उतारकर, उनके चरण स्पर्श करके, आशीष लेते हैं।’’
आधुनिक युग में भौतिकवाद, उपभोगवाद और उपयोगितावाद
के अंधे अनुकरण से भटके हुए युवावर्ग द्वारा संतप्त माता-पिताओं को इस पर्व से
उनका खोया हुआ सम्मान लौटाने का देश-विदेश के करोड़ों मिशन साधकों को सहज अवसर
मिलता है। इससे दो पीढ़ियों के बीच विशुद्ध मानवीय परम्पराओं को पुनः जागृत करने का
परिवेश मिलता है।
श्रद्धापर्व के माध्यम से मिशन ने उन उपेक्षित
माता-पिताओं को समाज में सम्मान दिलाने का प्रयास किया है,
जो अपने घरों में बेगाने, उदासी और निराशा के
अंधेरे में एकाकी जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर थे, घुटन महसूस कर रहे थे। आज पूरे देश में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व में
श्रद्धापर्व 2 अक्टूबर को हर्षोल्लास से मनाया जाता है। आइये! हम सब भी पर्व को आत्मसात
करें।

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