गुरु की महिमा अपरम्पार है। भारतीय शास्त्रों में परमात्मा की प्राप्ति और गूढ़ तत्व निरूपण में सद्गुरु की भूमिका और महिमा का बड़ा वर्णन है। गुरु एक तरफ लौकिक ज्ञान के उद्घाटक, प्रवर्तक और संस्थापक होते हैं, तो दूसरी ओर अलौकिक ज्ञान के निर्देशक है। भगवत अनुग्रह के लिए गुरु अन्तर्दृष्टि प्रदान कर मन रूपी दर्पण पर पड़े आवरण को दूर कर उसे निर्मल बनाते हैं। साथ ही वसुधा के कोलाहल से आक्रांत समाज को आत्मदर्शन की प्रेरणा देते हैं। क्योंकि सद्गुरु के विचारों में अधिकाधिक संयम, विवेक और तेजस्विता के साथ उनकी शक्ति में अलौकिकता होती है। गुरु का एक स्वरूप सूक्ष्म है, जिसके द्वारा ज्ञात-अज्ञात रूप से सान्निध्य में आने वाले शिष्य के मन मस्तिष्क में उठने वाली विभिन्न शंकाओं का सहज समाधान होता है। गुरु का तीसरा स्वरूप आत्मदर्शी वाला है, जिसमें वे शिष्य के हृदय और आत्मा को अपने आध्यात्मिक चेतना से पकड़ते हैं। इसी प्रकार अंतर ध्वनि के रूप में भी हर श्रद्धावान-संवेदनशील व्यक्ति व शिष्य सद्गुरु से दिशा-निर्देश प्राप्त करता रहता है। पर इस गुरु शिष्य मिलन की कुछ शर्ते भी हैं।
प्रथम शर्तः
जब आत्मा मोहित होकर अपने
स्वरूप को भूल जाती है,
तब सद्गुरु की कृपा से
उसे विवेक की दृष्टि मिलती है और वह अपने वास्तविक स्वरूप को जान पाती है। इस
प्रकार सद्गुरु वाह्य जगत एवं आंतरिक जगत में संतुलन बनाना सिखाते हैं। खास बात है
कि कोई भी व्यक्ति अंदर से आनंदित हो, तो बाहर की हर चीज उसे
आनंद से भर देती है। सदगुरु हमें आंतरिक परिवर्तन की वही विधि सिखाकर हमारे जीवन
को आंतरिक आनन्द की धारा में रूपांतरित करते हैं। पर यह रूपांतरण गुरु के प्रति
प्रगाढ़ श्रद्धा जीवन में होने से ही सम्भव हो पाता है और शिष्य का जीवन कीमती बनता
है। सिकंदर के विश्व विजेता बनने में उसके गुरु अरस्तु का महत्वपूर्ण योगदान इसी आधार
पर था। चंद्रगुप्त को चाणक्य का साथ मिला, शिवा जी को समर्थ गुरु रामदास, श्री कृष्ण को गुरु
सांदीपनि, आदि शंकराचार्य को गोविंद पाद आदि इसी परम्परा
के थे। वास्तव में चैतन्य गुरु तत्व साधक के मन-मस्तिष्क को सूक्ष्म विधि से
नियंत्रित करने वाला ऐसी शक्ति है, जो उसे गिरने से बचाती है
और उदास चेहरे पर मुस्कान देती है। संकट के समय बचाती ही नहीं, अपितु ऐसे प्रेरक विचार उत्पन्न करती है कि आगे के संकट से
वह खुद सम्हल सके। पर विनम्रता व श्रद्धा एवं विश्वास के सहारे ही यह शक्ति काम
करती है। जितनी गहरी गुरु के प्रति श्रद्धा, प्रेम शिष्य के मन व जीवन में उतरता है, उतने ही चमत्कार घटित होते हैं।
गुरु तत्वदर्शनः
सद्गुरु चलता फिरता तीर्थ
व मंदिर है। नर-नारायण का संगम है। मानव शरीर होने के कारण मनुष्य है, लेकिन परमात्मा प्रदत्त दिव्यता में जीने के कारण वह नारायण
भी है। पर उसकी गहराई में हिलोर लेने वाला तत्व प्रेम है, वात्सल्य है, करुणा है इसलिए वह शरीर ही नहीं बल्कि एक शक्ति
है।
खासबात कि सद्गुरु
भावपूर्ण होने के कारण हमारे जीवन में खोया हुआ वह सब प्राप्त भी कराता है और परम
को पुकारना भी सिखाता है। वह परमात्मा से इस स्तर तक हमारा सम्बन्ध जोड़ता है कि
जीवन में गुरु तत्व से जुड़कर आंतरिक शक्तियां केंद्रित हों, सद्गुणों के ड्डोत जीवन में विकसित होने लगें। गुरु से ही
जीवन में असीम खुशी फूटती है। इस प्रकार कह सकते हैं कि जो हमारी खुशी से पहचान
करा दे, जो हमें स्वयं से मिला दे, मंजिल की राह दिखा दे, वह तत्व ही गुरु तत्व है।
समर्पणः
तत्व रूप गुरु की कृपा से
ही व्यक्ति भूलोक से शिवलोक की यात्रा, चिंता से चिंतन की यात्रा, व्यथा से व्यवस्था की यात्रा पर अग्रसर होता है। पर ये सब
पाता वही है जिसमें पात्रता होती है। पात्रता के लिए शिष्य को सूरजमुखी, हर सिंगार बनना पड़ता है। सूरजमुखी का फूल जैसे सूरज की ओर
परिक्रमा करता है, हरसिंगार का फूल चंद्रमा के साथ उदित होता है, उसी प्रकार सच्चे शिष्य का मन हर पल अपने गुरु चरण की सेवा, गुरु वाणी का प्रकाश एवं गुरु नाम का जाप करने में लगा
होताा है। इस प्रकार जीभ पर गुरु मंत्र, मन में गुरु का स्वरूप
बसा सके, तो ऐसे शिष्य को सद्गुरु निरंतर सूक्ष्म रूप से
प्रेरित करेगा ही। यह अवस्था आने पर किसी चुम्बक के पास लोहे को रखें, तो चुम्बकीय शक्ति लोहे में भी आ जाती है। उसी प्रकार किसी
संत सद्गुरु के पास बैठने से उनका विचार हृदय में जागृत होने लगता है। इस प्रकार
गुरु जब हृदय में उतरने लगता है, तो जीवन में व्यापक
परिवर्तन दिखता है। फिर वह शिष्य जहां कहीं पहुंचता हैं, तो वह गुरु-परमात्मा का ही प्रेम प्रकट करता है। तब जैसे माँ बच्चे और पिता को
मिलाने का काम करती है,
उसी तरह अपने शिष्य को
परमात्मा से मिलाने का काम सद्गुरु करते हैं।

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