बहुशाखा बुद्धि अर्थात् विज्ञाापनवृत्ति
जब लोगों में भीड़
को महत्व देने की आदत पड़ जाय, तो समझ लें कि
विज्ञापन का युग शुरू हो गया है। इंग्लैंड के किसी व्यत्तिफ़ ने अपने संस्मरण में
लिखा था कि विज्ञापन का युग शुरू तो हो
गया, लेकिन आगे चलकर लोग इससे
बहुत दुखी हो जाएंगे, अनेक प्रकार के एक्सीडेंट विज्ञापनों के कारण
होंगे, प्रदर्शनों-विज्ञापनों से
जीवनदर्शन-व्यवहार दर्शन, संबंध निर्वहन,
शुद्धता-स्पष्टता आदि के पालन असम्भव हो
जायेंगेे। विज्ञापन के प्रभाव में लोग असली-नकली समझ नहीं सकेंगे, ऐसे में जीवन जीना अधिक कठिन हो जायेगा,
आज वही सब दिखाई दे रहा है।
दिखावे-प्रदर्शन-विज्ञापन
आज व्यवसाय ही
नहीं, धर्म, अध्यात्म, जीवन, प्रकृति, औषधि, चिकित्सा, शिक्षा, परिवार परस्पर के संबंधों तक में लोग
दिखावे-प्रदर्शन-विज्ञापन पर उतर आये हैं। यहां तक कि ग्लैमर के चक्कर में अपने
उचित आहार-विहार-पहनावे तक को नजरंदाज कर रहे हैं। इस विज्ञापन व प्रदर्शन में
उलझने से समाज का जीवन दर्शन-जीवन व्यवहार काल्पनिक होता जा रहा है। वस्तुओं की
शुद्धता-प्रामाणिकता ही नहीं, परस्पर के संबंध
एवं लोक व्यवहार तक पर संकट के बादल
मंडराने लगे हैं।
परम्परागत
संस्कार-रिवाजें आधुनिकता के नाम पर तिलांजलि
गौर करें तो वृद्धों
की सेवा के लिए दान देने वालों की कतार खड़ी दिखती है, पर अपने बुजुर्ग माता-पिता व अन्य वरिष्ठों की उपेक्षा की
जा रही है। घर-परिवार से शुद्ध-पौष्टिक आहार नदारत है, ‘‘शुद्धता स्वास्थ्य के लिए हितकर’’ का संदेश विज्ञापन तक
सिमट गया। एक छत के नीचे रहने वालों तक में अपनत्व भरा व्यवहार एवं विश्वासगत
स्पष्टता, पवित्रता दूर की ढोल होती
जा रही, जबकि सोशल मीडिया पर
मिलियन्स व्यू भरे पड़े हैं। वास्तव में विज्ञापन ने जीवन को विखण्डित कर दिया है।
आज सबकुछ प्रोडक्ट के रूप में देखा जाने लगा है। परिवारों के रिश्तों, अनेक प्रकार के परम्परागत संस्कार-रिवाजें
आधुनिकता के नाम पर तिलांजलि पाने के कगार पर हैं।
दुनिया प्रोडक्ट बन
गयी है
गौर करें तो कभी माता-पुत्री, पिता-पुत्र, भाई-बहिन, भाई-भाई, दुकानदार-ग्राहक, मालिक-नौकर से लेकर जितने प्रकार के संबंधों में लोग एक
दूसरे के साथ प्रेमभाव से बंधे थे, वे भी अब
प्रोडक्ट बन चुके हैं। इसके अतिरिक्त सीधे व्यक्ति के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े
पदार्थ तक जैसे साग-सब्जी से लेकर अनाज-दालें-दूध-शहद-अचार-फल आदि की चमक बस बाजार
और विक्रय, पैसे के मोलभाव तक सिमट
कर रह गयी है। तरह तरह के कैमिकल का प्रयोग करके इन्हें इसलिए मात्र उगाया,
सम्हाला जाता है कि अच्छे दामों में बेचा जा
सके। इसे किसी का आहार भी बनना है, यह चित्त से
लोगों के गायब हो रहा है, शुद्धता
-पौष्टकता का तो मतलब ही नहीं है।
धर्म की दुकानें
कपड़े तन ढकने के
लिए होते हैं, लेकिन अब उनका
लक्ष्य रह गया कि शरीर आकर्षक दिखे। आकर्षक लगने के फेर में शरीर की
सौम्यता-सरंक्षण का भाव अब बहुत कम लोगों में ही बचा है। इसीप्रकार धर्म भी अन्य
प्रोडक्टों की तरह हो रहा है, बस धर्म की आज
दुकानें दिखतीं है, किसी के जीवन में
बदलाव लाने वाली बात कल्पना से परे है। तथाकथित धर्माधीश तक धर्म-नीति को वाणी का
विलास मानकर बेचने में मग्न हैं। ऐसे में आम जनता की कौन कहे?
धर्मतंत्र व् फैशन-प्रदर्शन
सहज देखा जाता है
कि धर्मतंत्र से जुड़ा जो संस्थान जितना, फैशन-प्रदर्शन से भरा है, उसी मात्र में
वहां उतनी ही भीड़ दिखती है। वर्तमान में अधिकांश लोग धर्म संस्थाओं से जुड़ते ही
इसलिए हैं, जिससे वे लोगों के बीच
प्रचलन वाले ट्रेंड से पीछे न समझ लिये जांय। इस प्रकार इस दोहरे चरित्र के काल
में प्रकृति-जीवन-प्राकृतिक पदार्थ, प्र्राकृतिक जीवन शैली, स्व में स्थित
होने की संकल्पना असम्भव नहीं तो कठिन जरूर लगती है।
भगवान श्रीकृष्ण
ने महाभारत काल में श्रीमद्भगवदगीता में विज्ञापनों के कारण सत्य पर पड़ने वाले प्रभाव,
मानव व मानवता पर छाने वाले संकट को भांपते हुए
फैशन-प्रदर्शन को व्यवसायात्मिका बुद्धि की संज्ञा दी और सावधान किया था।
व्यवसायात्मिका
बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा
ह्यनन्ताश्च बुद्धयो{व्यवसायिनाम्।।
अर्थात् दृढ़
संकल्प वाली निश्चयात्मक बुद्धि व्यक्ति में एक ही है। परन्तु बहु शाखा, विविध कामनाओं वाली बुद्धि, बिखरी हुई, अनेक स्थानों व कार्यों में बटी हुई बुद्धि विज्ञापनों,
प्रदर्शनों का सहारा लेती है। अंत में अपना और
समाज दोनों का अस्तित्व खो देती है। इससे बचने के लिए स्वस्थ- समुन्नत-श्रेष्ठ
दिव्य जीवन के भाव जरूरी है। जीवन रूपी खेत में हर क्षण अंतःकरण में भक्तिमय
सद्विचारों, सद्भावों,
सद्कर्मों के बीज बोना चाहिए।
परम पूज्य सुधांशु
जी महाराज कहते हैं-
‘‘बीज बोने का आशय
है अनवरत चलने वाला अंतर्सम्वाद दिव्य हो। इस बीजारोपण की फसल सुनिश्चित उगती और
कटती है, इसीलिए सही फसल बोयें।
अंतर्सम्वाद द्वारा छल-कपट के बीज बोने वाले व्यक्ति से दुनिया का भरोसा हटता जाता
है। यहां तक कि खुद के प्रति भी भरोसा डिग जाता है। भारतीय ऋषि परम्परा में स्थित
कर्मफल व्यवस्था का यही मूल है। वास्तव में कर्म, भाव, विचार बीज जो
जन्मों पूर्व बोये जा चुके हैं अथवा वर्तमान में बोये जा रहे हैं, वे सभी फल बनने से पहले नष्ट नहीं होते।’’
इस प्रकार सरल-सहज जीवन जीने वाले, सद् बीज बोने वाले के जीवन के लिए न प्रदर्शन
की जरूरत होती है, न विज्ञापन की,
बस उन्हें तो पंच महाभूत-पृथ्वी-जल+
अग्नि+हवा+आकाश आधारित जो
जीवन मिला, उन्हीं तत्वों को शुद्धता
से आत्मसात भर करते चलना होता है। तब इंद्रिया निज स्वरूप में स्थित होती है,
जीवन में संतुष्टि आती है।
सूर्य चक्षुः
दक्ष
ऐसा जीवन जीने वालों की मृत्यु के बाद ‘‘सूर्य
चक्षुः दक्ष’’ अर्थात् आंखें सूर्य को, रुधिर जल को, प्राण वायु तत्व
को, हड्डियां पृथ्वी में और
आत्मा परमात्मा से मिल जाती है। जीवन सद् अनुभूति स्तर तक उतरने में सफल होता है
और मिथ्याभाव से पार होता जाता है। यही व्यक्तित्व धर्म का साक्षात स्वरूप कहलाता
है, जिनसे आम जनमानस की
आशायें पूरी होती है।

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