Thursday, 10 August 2023

वे अभ्यास जो मन की रुचियां बदल दें

 वे अभ्यास जो मन की रुचियां बदल दें



इस मानव मन को अपने अस्तित्व से जुड़ने के बाद ही शांति मिलती है अन्यथा मन रस की खोज में मारा-मारा फिरता है, यह मन की आदत है। इसलिए मनोविश्लेषक सर्वप्रथम मन की वृत्ति को समझने, फिर उसे सही दिशा देने पर जोर देते हैं। वे बताते है मन अनन्त शक्तियों और विभूतियों से भरा है, यह जिस काम में लगता है, उसे जादू की तरह पूरा करता है।

मन को साधना इतना आसान नहीं

मन को अनुकूल दिशा में साधने के कारण ही असंख्य लोग कलाकार, वैज्ञानिक, सिद्धपुरुष, महामानव बनने में सफल हुए हैं, पर मन को साधना इतना आसान नहीं। इन व्यक्तियों ने मन को साधने के लिए अपने अंदर विशेष रुचियां जगाई। भागते मन की धारा को विपरीत रुचि से जोड़ा, तत्पश्चात् एकाग्रता-तन्मयता द्वारा अपने को उपलब्धियों तक पहुंचाया। कहते हैं पानी की तरह मन की गति भी अधोगामी है। वह आमतौर से जिह्ना, स्वाद, सैर-सपाटे, विलास वैभव, यश, सम्मान पाने, काम वासना में भटकने की इच्छा से भरा होता है। सामान्यतः मन इन्हीं की कल्पनाएं करता रहता है।

खाली न छोड़ें  मन को

मनोविज्ञानी कहते हैं कि मन खाली रहता है, तो अधिकतर बहुत दिशाओं की ओर जाता है। अतः इसको कभी खाली न छोड़ें, अपितु कोई ऐसे स्थान, वातावरण या ऐसे काम से जोड़कर रखें, जो उसकी रुचि का हो। मन को वैसे भी टिकाने के लिए कोई स्वस्थ दिशा सुझाते ही रहना चाहिए।

 

पूज्य गुरुदेव श्री सुधांशु जी महाराज कहते हैं

 मन की उड़ाने, वासना, तृष्णा की ओर जाने के लिए जन्म-जन्मांतरों से अभ्यस्त रही हैं, इसलिए वह पुराना मार्ग ही पकड़ने लगता है। स्वेच्छाचार तक के लिए भी वह आतुर होता है। यह मनुष्य का मन है, इसलिए पशुओं की तरह कुछ भी कर गुजरने के लिए स्वतंत्र छोड़ा भी नहीं जा सकता। ऐसे में मन को साधने के लिए मर्यादाएं, वर्जनाएं और जिम्मेदारियां डालकर, महापुरुषों के आदर्श जीवन बोध, जप, उपासना, सिमरन, सेवा, सद्विचार, सद्कार्य के माध्यम से इधर-उधर आवारा पशु की तरह दौड़ने से रोकना चाहिए। खास बात कि यदि मन का रुचि केन्द्र बदला जा सके, तो इसी मन के सहारे सम्पूर्ण संसार को अपना बनाया जा सकता है।’’ इस तरह सिखाने, साधने पर मन सर्कस के जानवरों की तरह उठ खड़ा होता है और एक दिन ऐसे उच्च स्तरीय लक्ष्य को बेधने में सफल होता है, जो उसे उसकी जन्मजात प्रकृति के विपरीत अनुभव होता है।

ऊर्जा को जगाने में पूर्ण सफल होते देखे गये हैं ये लोग

मन प्रयासपूर्वक जब अनुकूल बन जाता है, तो मालिक की इच्छानुसार अपनी गतिविधियों का करतब दिखाता है। वास्तव में संत, वैज्ञानिक, विशेषज्ञ तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरणों के सहारे मन का रुचि केन्द्र बदलकर उसे कार्य में लगाते आये हैं। वास्तव में सम्पूर्ण अध्यात्म में मनःस्थल की साधना का ही तो विज्ञान छिपा पड़ा है। इसे जगाने में मन को अंतःकरण के भावावस्था से जोड़कर की गयी प्रार्थनायें परिवर्तनकारी साबित होती हैं। इसलिए मन को मजबूत करने के लिए प्रार्थना के सहारे उसे संदेश भेजने का प्रयास अवश्य करते रहें।

‘‘साधक सर्वप्रथम कमर सीधी करके शांत-चित्त से ध्यान में बैठकर क्रमशः प्रार्थना अनुरूप भाव दशा में उतरने का प्रयास करे, तो कुछ दिन के अभ्यास से साधक का मन सहज सधने लगेगा।’’ वैसे गुरुकृपा प्राप्त साधक मन की ऊर्जा को जगाने में पूर्ण सफल होते देखे गये हैं।

ध्यान अवस्था में जाकर कुछ इस तरह से मन को संदेश दें

ध्यान अवस्था में जाकर कुछ इस तरह से मन को संदेश दें-‘‘मैं शांत हो रहा हूं, शांत, शांत, शांत, शांत।’ इस प्रकार अपने को ढीला करते जाएं। भावना रहे कि मस्तिष्क में शांति की लहरें उतर रही हैं, मैं शांत होता जा रहा हूं। चंद्रमा की चांदनी शांति बनकर संसार में उतर रही है। ऐसे शांति की लोरी गाते-गाते मन को एक जगह टिकाकर पलकों को इतनी कोमलता से बंद करें, जैसे फूलों की पंखुड़िया बंद हो रही हैं। इस प्रकार क्रमशः अंदर असीम शांति और गहन मौन का वातावरण बन जाएगा। बीच-बीच में इधर-उधर मन जाए भी तो फिर शांति-शांति कहते हुए पुनः शांत हो जायें।’’

मन का महत्व

                इस प्रकार दिन में कई बार ऐसा प्रयोग करने से मनःतंत्र में परिपक्वता आती है और जीवन को मन का महत्व समझ में आता है। यही मन हमारे आत्म स्व भाव से जुड़कर उपलब्धियों का मार्ग प्रशस्त करता है। ध्यान द्वारा भी अपने मन को खाली करने का अभ्यास किया जा सकता है। तब गहरी नींद भी आती है, ध्यान भी लगता है, आपस में व्यवहार भी सही होता है। वास्तव में मन का शांत होते जाना, विचार शून्य होते जाना, मन के दबाव से हटते जाना एवं ईश्वर में लगने की दिशा पा लेना ही मन का अपने स्वभाव को पाना है।

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