चिकित्सा जगत में प्रवेश करता ‘ध्यान’
यह युग विज्ञान
का है
चिकित्सा विज्ञान
ने दुनियां में भारी धूम मचाई, सम्पूर्ण
उन्नीसवीं से लेकर सम्पूर्ण बीसवीं सदी तक एलोपैथी का बोलबाला था, रासायनिक औषधियों ने लोगों को चमत्कृत किया और
लाभान्वित भी किया। पर मनुष्य की प्रकृति से उसका पूर्ण तालमेल न हो पाने के कारण
एक सीमा के बाद लोगों में इस तथाकथित चिकित्सकीय चमत्कार को बर्दाश्त करने की सीमा
समाप्त होने लगी, तो व्यक्ति अन्य
तरीकों की ओर लौटे, इन्हीं में एक नई
चिकित्सा परम्परा के रूप में ध्यान भी सामने आया।
अल्फा स्टेट ऑफ
माइन्ड
ध्यान जीवन को
आध्यात्मिक धारा से जोड़ने का महत्वपूर्ण पक्ष होने के साथ साथ जीवन को सहज और सरल
बनाने की प्रक्रिया भी है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ध्यानस्थ साधक के मस्तिष्क में
डेल्टा तरंगें निकलती हैं। ध्यान में लगा साधक जब ‘अल्फा स्टेट ऑफ माइन्ड’ में
जीता है, तो प्रेम और शांति उसका
स्वभाव बन जाता है। मस्तिष्क से निकलने वाली तरंगें अल्फा, बीटा, थीटा की आवृत्ति
के आधार पर ‘ध्यान’ की गहनतम स्थिति बनाती हैं। इस अवस्था में आने के बाद व्यक्ति
की आंतरिक क्षमता में रिपेरिंग प्रारम्भ हो जाती है, ऐसा विशेषज्ञों का मानाना है।
ई-ई-जी-
(इलेक्ट्रोएसीफेलोग्राम) मशीन
मस्तिष्क से
निकलने वाली तरंगों की माप ई-ई-जी- (इलेक्ट्रोएसीफेलोग्राम) मशीन द्वारा की जाती
है। आधुनिक विज्ञान की ई-ई-जी- मशीन के द्वारा बीटा, अल्फा एवं डेल्टा तरंग अति आवृत्ति के आधार पर योगी का स्तर
सत्यापन किया जा सकता है। शोधों के आधार पर स्पष्ट
हुआ कि गहनतम ध्यान की स्थिति में योगियों से उत्सर्जित अल्फा एवं डेल्टा तरंगें
जिनकी आवृत्ति अल्पतम होती है तथा प्रभाव तीव्र
शामक होता है। शरीर से बीमार (रुग्ण) और मन से विक्षिप्त रोगियों में ‘बायोफीड’
प्रक्रिया द्वारा प्रविष्ट कराके उसके रोग का निदान और उपचार किया जा सकता है।
पारलौकिक लाभ के साथ
शारीरिक बीमारियां भी दूर होती ध्यान से
आनंद, आह्लादपूर्ण जीवन ‘ध्यान’ का स्वभाव है।
‘ध्यान’ द्वारा इस अवस्था में पहुंचने पर पारलौकिक लाभ ही नहीं मिलता, बल्कि शारीरिक बीमारियां भी दूर होती हैं।
इसीलिए आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिक अपनी चिकित्सा प्रयोगों में ‘ध्यान’ को भी
चिकित्सा के अनुरूप जोड़ने पर जोर देने लगे हैं, चिकित्सा को लेकर हुए कई अनुसंधानों से इसके सकारात्मक प्रभाव
प्रमाणित भी होते जा रहे हैं।
इसी में ‘ध्यान’
की अवस्था में शारीरिक व मानसिक क्रियाकलापों को अंतर्मुखी होकर देखना महत्वपूर्ण
प्रयोग है। इससे धीरे-धीरे साधक का श्वास शांत और शिथिल होता जाता है। श्वांस के
साथ मन और विचार भी शांत होते जाते हैं। इस प्रकार निर्विचार, संकल्प रहित होकर साधक स्वतः विचार शून्यता की
ओर बढ़ता जाता है। इससे उसके चेतन से लेकर अचेतन मन तक की मलिनता अपने आप धुलती
जाती है। मन निर्मल होता जाता है।
शून्यवत होते जाना
क्रमशः शरीर,
श्वास, विचार और मन धीरे-धीरे शून्यवत होते जाते हैं। यह भाव लगातार बने रहने की स्थिति
उसे समाधि में ले जाती है, जहां जीवन
पूर्णतम अभिव्यक्ति पा रहा होता है। इसके बाद साधक एक तरफ परमात्म भाव में लीन
होता अपने को अनुभव करता है, जीवन में परम
रहस्य का उद्घाटन होता है। तो दूसरी ओर साधक शरीर और मन से जुडे़ रोगों से मुक्त
होने की अवस्था में पहुंचने लगता है, उसका एम्यून सिस्टम प्रखर होता है तो रोग से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।
‘ध्यान’ को करने
के लिए
सर्व प्रथम
सुखासन में बैठें। रीढ़ सीधा रखें। शरीर सहज रखें, शरीर के किसी भी अंग पर खिंचाव न अनुभव हो। शरीर का प्रत्येक
अंग शिथिल रहे। इस अवस्था में आते ही शरीर के बाहरी और आंतरिक क्रिया कलापों में
जागरुकता अनुभव होती है। इस प्रकार मस्तिष्क धीरे-धीरे संवेदनशील होता जाता है। जब
चिड़ियों का संगीत, हवाओं की सरसराहट,
हृदय की धड़कन, नाड़ी गति स्पन्दन, श्वास-प्रश्वास का संचलन, त्वचा पर अजीब सी
अनुभूति होने लगे तो बस सावधान रहें, कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए। इस प्रकार ‘ध्यान’ की स्थिति में श्वास को
सहज ढंग से आते-जाते अनुभव भर करें, अपने हर
प्रकार के
विचारों पर भी किसी प्रकार की भावनात्मक व मानसिक प्रतिक्रिया न दें। इसी स्थिति
में व्यक्ति का रूपान्तरण होता है, जीवन मानवीय
चेतना को पार करते हुए संवेदनाओं से भर उठता है और साधक परमात्म तत्व के निकट
अनुभव करता है, देवत्व उदय की यह
अवस्था ही व्यक्ति का जीवन के दानवी दुर्गुणों से मुक्त करते हैं, जो रोग, तनाव, दबाव आदि विकारों
के कारक हैं। तो आइये ‘ध्यान’ के ऐसे प्रयोग को जीवन व दिनचर्या का अंग बनाकर
दिव्य गुणों को बढ़ायें और शारीरिक-मानसिक विकारों से मुक्ति का ईश्वरीय बरदान भी
पायें।

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