नारी के सम्मान से ही धर्म-संस्कृति का उत्थान हो सकता है
नारी धर्म का मूल
जीवन से जुड़े
रिश्ते-नातों के समुचित निर्वहन से हमारे भाग्य, दुर्भाग्य, रोग, सुख-दुःख आदि का गहरा सम्बंध है, जो हमारे जीवन को हर स्तर पर प्रभावित करता है।
इसीलिए जीवन में धर्मगत आचरण अपनाने के लिए परिवार में संबंधों का और समाज के बीच
पर्व-त्योहारों का महत्वपूर्ण स्थान है। अक्सर हर पर्व-त्योहार के निर्वहन में
नारी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। दीपावली में लक्ष्मी पूजन में नारी, विजयादशमी पर्व का आधार माता सीता हैं, भैया दूज पर्व में नारी के प्रति पवित्र दृष्टि
जगाने की महत्ता है। नवरात्रों में नारी
का दैवीय स्वरूप, इसी प्रकार
धर्मनिर्वहन के हर सम्भव कार्यों में नारी की भूमिका देखने को मिलती है। इस
उत्सवगत धर्म का आधार भी नारी मानी गयी है।
दूसरे शब्दों में
नारी धर्म का मूल है, नारी को परिवार
निर्माण की धुरी माना गया है। नारी के सम्मान से धर्म-संस्कृति के उत्थान की बात
कही ही जाती है। इस प्रकार हमारी सामाजिक व आध्यात्मिक क्रांति परिवारों के बीच से
होकर गुजरती है।
नारी परिवार निर्माण की धुरी है
नारी के संकल्प,
संस्कार एवं स्वाभिमान के सहारे परिवार में
देवमय संतानें गढ़ी जाती हैं, जिससे समाज में
देवमय वातावरण का निर्माण सम्भव बनता है, ऐसी शास्त्रों की मान्यता है। वैदिक काल से हमारा भारत देश नारी सम्मान,
नारी के प्रति पवित्र दृष्टि, सनातन परम्पराओं से ओतप्रोत नारी चेतना को
पुनः-पुनः प्रतिष्ठापित करता रहा है।
समाज में देवमय
वातावरण जगाने और भारत को वैश्विक गौरव दिलाने के योग्य बनाने हेतु पुनः नारी का
आदर्श गौरव जनमानस में स्थापित करने की आज जरूरत है। केवल लेखनी में ही नहीं,
अपितु जीवन के प्रत्येक आयामों में उसे
गौरवान्वित ढंग से प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है। हर नागरिक को अपने
चरित्र-चिंतन व व्यवहार में नारी शक्ति की दिव्यता-पवित्रता की अनुभूति जगाने की
जरूरत है।
दुर्गा, सीता, पार्वती, लक्ष्मी, काली, जैसी देवियों से लेकर रानी चैनम्मा, अहिल्याबाई होल्कर, रानी लक्ष्मी बाई जैसी राष्ट्रविदुषियों को
अपने घर-आंगन में खेलने का स्वप्न अंदर से जगाने की जरूरत है।
पुरुष वर्ग को
अपने अंतःकरण से अहंभाव को निकालने के लिए भी नारी की संवेदनशीलता, गरिमा, मर्यादा, ममत्व, प्रेम, दया, करुणा, ममता आदि दिव्य गुणों को अपने अंतःकरण के
स्वरूप में, चिंतन व
सम्पूर्ण नारी
समाज के प्रति हो श्रद्धा
भावना में जगाने
की आज बड़ी आवश्यकता है। पर अंतःकरण में सम्पूर्ण नारी समाज के प्रति श्रद्धा उड़ेलने,
नारी को ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप मानने,
उसके जीवन में समाये आध्यात्मिक मूल्यों को
अपने अंदर प्रतिष्ठापित करने, हर पल ‘माँ’ की
संवेदनशीलता, गौरवगरिमा को
धारणा का विषय बनाने से ही यह सब सम्भव हो सकेगा।
दिव्य जीवन के
निर्माण में पवित्र सम्बन्ध होना
अनुभव में आया है
कि जहां दिव्य जीवन के निर्माण में पिता-पुत्र, मां-बेटी, पति-पत्नी,
अन्य कुटुम्बियों के बीच परस्पर पवित्र सम्बन्ध
निर्वहन का अपना विशेष महत्व है, वहीं सम्पूर्ण
समाज की नारियों के प्रति हमारी भावसंवेदनाओं, उनके प्रति सोच आदि का स्वयं के शरीर, मन एवं आचरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।
मान्यता है कि जिस व्यक्ति की भावनायें नारी जाति के प्रति श्रेष्ठ होती हैं,
उनका व्यक्तित्व रोग रहित, सम्माननीय, यशस्वी, समृद्धि, लोक सम्मान आदि दिव्यताओं से सुसज्जित देखने को
मिलता है। इसके विपरीत नारी के प्रति हीनभावनायें रखने वाले का सम्पूर्ण जीवन
दुख-कष्ट-कठिनाइयों, बीमारियों,
कर्जदारी, अपयशी, दुर्भाग्य जैसी
विद्रूपताओं की खान बनता जाता है, वह भले कितना भी
कर्मशीलता क्यों न अपना ले।
परम पूज्य सुधांशु
जी महाराज कहते हैं ‘‘नारी साक्षात देवी-नारायणी है, वह सूक्ष्मरूप से सदैव परमात्मा के आभामंडल के घिरी रहती
है। उसके आस-पास हर पल हर क्षण नारायण की सुगंधि बनी रहती है, यही कारण है कि नारी का सम्मान करने वालों के
ऊपर नारायण की कृपा सहज बरसने लगती है और वह भौतिक लोक में यशस्वी जीवन जीता ही है,
अगला जन्म भी किसी यशस्वी
कुल में ही होता है।’’
धर्मशास्त्र कहता
है कि पिछला जन्म दुराचरण से जुड़ा है, तो बीमारियां, कर्ज, बुराईयां कदम कदम पर मिलती रहती हैं। वहीं
पिछला जन्म नारी शक्ति के प्रति धर्ममय, पवित्रता से ओतप्रोत होने पर स्वयं का आचरण धार्मिक और सेवामय बन जाता है और
उस व्यक्ति के जीवन से संकट दूर रहते हैं। आचरण की प्रमाणिकता नारी के प्रति हमारे
व्यवहार-सोच से भी स्पष्ट होती है।
अनेक संबंधों में
गूथ कर रखा है नारी ने
व्यवहार में नारी
को अनेक संबंधों के साथ गूथ कर रखा ही इसीलिए गया है कि नारी के सानिध्य को पाकर
पुरुष पवित्र जुड़ाव का परस्पर आदान-प्रदान करते हुए ईश्वरत्व की अनुभूति कर सके।
उदाहरणार्थ माता का प्रेम ईश्वर के प्रेम का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है, वैसे ही पत्नी का त्याग एवं समर्पण, बहन की ममता, पुत्री की कोमतला के रूप में नारी की उच्च दैवीय अवस्था का
अंतःकरण में साक्षात् दर्शन किया जाना चाहिए। प्राचीनतम काल से नारी उपासना की
मुख्य भूमिका रही है। नवरात्रि सहित जीवन उत्थान संबंधी विविध धर्म आदि अनुष्ठानों
की पूर्णता में कन्या पूजन, कन्या भोजन,
कन्या सम्मान जैसी परम्परा जोड़ी गयी है।
अतः हम सब मिलकर
नारी की गरिमा को अपने जीवन एवं जन जन के बीच जगाने का घर-परिवार में वातावरण
जगायें, स्वयं के यशस्वी जीवन के
लिए नारी को यशस्वी बनायें और नारी के प्रति गरिमामय भाव से भैयादूज आदि पर्व
मनायें, जिससे समाज को गौरवशाली
मार्ग मिल सके।

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