Thursday, 20 October 2022

धनतेरस - माँ लक्ष्मी और भगवान धन्वन्तरि का जन्म दिवस

 धनतेरस - माँ लक्ष्मी और भगवान धन्वन्तरि का जन्म दिवस



धनतेरस के पवित्र पर्व पर आप धन की कामना से पूजा-पाठ, यज्ञ जरूर करें, लेकिन इस पावन पर्व पर अष्टलक्ष्मी का आह्नान करना भी न भूलें। अष्टलक्ष्मी में सभी तरह की सिद्धि-सफलता प्राप्त हो जाती है। आप जब लक्ष्मी की कामना करें तो माँ भगवती महालक्ष्मी से विद्या लक्ष्मी, सौभाग्य लक्ष्मी, अमृत लक्ष्मी, काम लक्ष्मी, सत्य लक्ष्मी, भोग लक्ष्मी और योग लक्ष्मी प्राप्ति की प्रार्थना भी अवश्य करें।

 

अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए थे धन्वन्तरि

धनतेरस आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वन्तरि का और माँ लक्ष्मी का जन्म दिवस है। धन्वन्तरि जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरि चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। कहीं कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर लोग धनिया के बीज खरीद कर भी घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।

चाँदी खरीदने की प्रथा के पीछे क्या कारण है ?

धनतेरस के दिन चाँदी खरीदने की भी प्रथा है, जिसके सम्भव न हो पाने पर लोग बर्तन खरीदते हैं। इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि चांदी ‘‘चन्द्रमा’’ का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में सन्तोष रूपी धन का वास होता है। संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह स्वस्थ है, सुखी है, और वही सबसे धनवान है।

स्वास्थ्य और सेहत की कामना करें इस दिन

भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता हैं। उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के के साथ संतुष्टि का धन भी माँगा जाता है। संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी, गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हैं।

 

क्या करें कि अकाल मृत्यु का भय न रहे

धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोककथा है। कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहाँ  किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया।

 

विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे। जब यमदूत राजकुमार के प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा। परन्तु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे, उसी समय उनमें से एक ने यम देवता से विनती की- हे यमराज! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाए।

 

दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यम देवता बोले, हे दूत! अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है, इससे मुक्ति  का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूं, सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीपमाला दक्षिण दिशा की ओर भेंट करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रहते हैं।

 

क्या करें धनतेरस के दिन

धनतेरस के दिन दीप जलाकर भगवान धन्वन्तरि की पूजा करें। भगवान धन्वन्तरि से स्वास्थ और सेहतमंद बनाये रखने हेतु प्रार्थना करें। चाँदी का कोई बर्तन या लक्ष्मी गणेश अंकित चाँदी का सिक्का खरीदें। नया बर्तन खरीदें जिसमें दीपावली की रात भगवान श्री गणेश व देवी लक्ष्मी के लिए भोग चढ़ाएं। कहा जाता है कि समुद्र मन्थन के दौरान भगवान धन्वन्तरि और माँ लक्ष्मी का जन्म हुआ था, यही वजह है कि धनतेरस को भगवान धनवंतरी और माँ लक्ष्मी की पूजा की जाती है।

 

डॉ. अर्चिका दीदी

Tuesday, 18 October 2022

माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय

 


माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय

दीपावली के महापर्व की महीनों पहले ही तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। सभी लोग अपने घर एवं कार्यस्थलों की साफ-सफाई करने लगते हैं रंग-रोगन आदि से उन्हें सजाने-संवारने लगते हैं।

 

 

1.       दीपावली पर माँ लक्ष्मी को पसंद है

पवित्रता, स्वच्छता, शुद्घता । सभी जन अपने-अपने स्तर पर, सुख-समृद्घि की देवी माँ लक्ष्मी का स्वागत करने के लिए मन प्राण से शुभ कार्यों में संलग्न हो जाते हैं और ऐसा होना भी चाहिए। क्योंकि माँ लक्ष्मी को पवित्रता, स्वच्छता, शुद्घता ही सबसे ज्यादा पसंद है। दीपवाली का रूप पवित्रता, प्रेरणा, सामंजस्य रहे तो अच्छा होगा।

 

2.       मर्यादित उल्लास एवं उमंग होना
 हमारा उल्लास मर्यादित हो तथा प्रेम से भरपूर हो। किसी की खुशी छीनने वाला नहीं होना चाहिए।

 

3.       अमर्यादित कृत्यों से बचना
इस अवसर पर जुआ खेलकर
,अत्याधिक  आतिशबाजी करके वातावरण को विषाक्त करना तथा धन का अपव्यय करना, धमाके करके रोगी, वृद्घजनों एवं विद्यार्थियों को कष्ट पहुंचाना धर्मिक कार्य नहीं है।

 

4.       अंदर बाहर की साज-सज्जा
परंतु केवल घर की दीवारों को सजाने से, आंगन को रंगोली आदि सजाने से  से ही माता लक्ष्मी का प्रसन्न होना असंभव है। जब तक हमारा मन पवित्र नहीं होगा, विचारों में शुद्घता नहीं होगी। हृदय में प्रेम नहीं होगा, वाणी में मधुरता नहीं होगी, दृष्टि में प्यार नहीं होगा तब तक माँ लक्ष्मी की कृपा से हम वंचित ही रहेंगे।

 

5.       स्वच्छता और पवित्रता
दीपावली का पावन पर्व मनाना सार्थक तभी होगा जब हम अपने अंतस को भी स्वच्छ बनाएंगे।
बाहर भी स्वच्छता हो और अंदर भी पवित्रता हो। तब माँ लक्ष्मी अपनी अनंत कृपाओं के साथ शुभ लाभ बनकर हमारे घर परिवार में, समाज और मोहल्ले में, नगर और प्रान्त में, देश और संसार में खुशहाली बनकर प्रकट होती है।

 

6.       नकारात्मकता दूर करें
आज सारा जगत् माँ लक्ष्मी की कृपाओं से वंचित नजर आ रहा है। मंदी की मार सब झेल रहे हैं। इसके और भी अनेक कारण हो सकते हैं
, लेकिन सबसे बड़ा कारण हमारे अंदर का अंधेरा है। हमारे अंदर कालिख पुता हुआ है। जब तक अंदर की कालिमा का अंत नहीं होगा, तब तक खुशहाली का आगमन असंभव है।

 

7.       ज्योति से ज्योति को ज्योतित करना
दीपावली ज्योति से ज्योति को ज्योतित करने का महापर्व है। हम ज्ञान की ज्योति से प्रकाशित होकर प्रेम के दीप जलायें  तब अंधेरे का वजूद समाप्त हो जाएगा। चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश फैल जाएगा और खुशियाँ ही खुशियाँ दिखाई देंगी तथा तब माता लक्ष्मी की कृपा पाना भी संभव हो जायेगा।

 

दीपावली के सुअवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ |

Friday, 14 October 2022

दीपावली पर डायरी बनाये, पूंजी में हो जायेगी वृद्धि !

दीपावली पर डायरी बनाये, पूंजी में हो जायेगी वृद्धि !


माँ लक्ष्मी की प्रतिष्ठा का पर्व है दीपावली

दीपावली जीवन एवं परिवार में प्रकाश के सहारे माँ लक्ष्मी की प्रतिष्ठा का पर्व है। इस दिन लोग ज्योति के समक्ष विशेष मंत्र साधना करते हैं। जिससे आत्म ज्योति जागृत हो और वह जीवन दीप बनकर दूसरे जरूरतमंदों  को प्रकाशित कर सके, यही दीपावली का मुख्य संदेश है। इस दिन लोग पर्व पूजन के समय मिष्ठान, मंत्र साधना, दीप जागरण आदि करने के साथ साथ अपने आय-व्यय पुस्तिका का पूजन करते हैं और अगामी वर्ष के लिए आर्थिक योजना बनाते हैं। जिससे पर्व पर माँ लक्ष्मी के समुचित उपार्जन तथा उपयोग का आशीर्वाद प्राप्त हो सके।

                दीपावली समायाति नीत्वा संदेशमुत्तमम्।

                अर्जुनस्योपयोगस्य चोचितस्य श्रियः खलु।।

                पौराणिक मान्यता अनुसार इस दिन श्री गणेश-लक्ष्मी के पूजन की परम्परा है। संदेश है व्यक्ति सम्पत्ति के साथ-साथ विवेक का भी वाहक बने। पर विवेक को जगाने के लिए जिस निवेश की बहुत बड़ी आवश्यकता होती है, वह उसी को नजरंदाज कर देता है, इन्हें व्यक्तित्व गढ़ने वाले मूल्यवान सूत्र कहते हैं। डायरी लेखन हमें इन्हीं सूत्रों से जोड़ती है।

अज्ञात व एकांत गुरु की तरह है डायरी

देश के महापुरुषों ने डायरी को अज्ञात व एकांत गुरु की मान्यता दी है। इस संदर्भ में दीपावली पर्व पर विचार करें तो इस दिन सभी दीपक भी जला लेते हैं, व्यावसायिक बही खाते का पूजन भी कर लेते हैं, पर जिससे हमारे मन, बुद्धि, विवेक में जीवन मूल्यों का प्रवेश हो सके, उस बही खाते को नजरंदाज कर देते हैं।

जीवन समीक्षा का वहिखता है

“दीपावली पर  साधकों को अपने व्यक्तित्व निर्माण की भी समीक्षा करनी चाहिए, इसके लिए जीवन रूपी बहीखाते में वर्षभर के लिए डायरी लेखन को प्रवेश देना चाहिए। हम चाहते हैं कि प्रत्येक जन  जीवन से अज्ञान, अन्याय, अधर्म के अंधेरे को दूर करने के लिए डायरी लेखन प्रारम्भ करे, अपने जीवन को गढ़े और अंतःकरण के दीप को प्रज्ज्वलित करने में समर्थ बने। इससे जीवन में सेवा-पवित्रता-परोपकार जन्म लेगा और सारी धरती से दुख-संताप, अन्याय, अभाव, अज्ञान का अंधेरा मिटेगा, स्वर्णिम जीवन की आभा से चहुँदिश जगमग हो उठेगा। यही होगा असली दीपावली पर्वोत्सव।”

 

हो जाता है मूल्यवान

संतों- गुरुओं-महापुरुषों के जीवन व्यवहार में प्राप्त होने वाले सारगर्भित सूत्रों को अपने व्यक्तित्व निर्माण हेतु नियोजित करने, उन्हें सतत आत्मसात करने के योग्य बनाने का आधार है डायरी लेखन। वास्तव में हर जागरूक व्यक्ति की अपनी एक डायरी होनी चाहिए, उसमें वह जीवन निर्माण से जुडे़ सम्पूर्ण बिन्दु लिखकर रखे और समय- समय पर उसका चिंतन-मनन कर सके, साथ ही नित्य जीवन में होने वाली त्रुटियों की समीक्षा कर सकें, तो जीवन कुछ ही समय में मूल्यवान बनाया जा सकता है।

 

डायरी हर किसी के लिए आत्मनिरीक्षण करने की अनमोल निधि होती है, जिसमें कुछ नियमित स्तंभ, जिंदगी की कुछ अनोखी घटनाएं, रात्रि शयन व जागरण का खाका, निर्विघ्न निद्रा के सूत्र, सोने से पूर्व की प्रार्थना, रात्रि के तीसरे प्रहर सोकर उठने के लाभ, ध्यान-साधना के साधन, चौबीस घंटे की कार्ययोजना जैसे महत्वपूर्ण पक्ष डायरी में समाहित किये जाते हैं।

परम पूज्य सुधांशु जी महाराज कहते हैं

“अपनी डायरी में अपने पूरे जीवन वृत्तान्त के शाश्वत मूल्यों को स्थान देकर उसपर चिंतन-मनन करने वाला साधक जीवन में होने वाली न जाने कितनी भूलों, गलतियों से बचता और जीवन को शानदार रास्ते पर पहुंचा लेता है। इस प्रकार वह एक दिन अन्य के लिए प्रेरक बन जाता है, इसलिए डायरी जीवन का महत्वपूर्ण प्रदर्शक भी कहलाती है।”

डायरी को अपना मूक मार्गदर्शक मानने वाले साधक के जीवन में कितनी भी व्यस्तता होगी, लेकिन वह ध्यान-साधना के लिए कुछ समय जरूर निकालेगा और इसमें वह अपना हित अनुभव करेगा।

स्वाध्याय से जोडती है डायरी

डायरी स्वाध्याय के सुख से भी जोड़ती है। स्वाध्याय से उसे पुरुषार्थ की, परिश्रम की, सद्गुणों की, सहनशीलता की, वीरता की, प्रार्थना की, उपासना की और जीवन को गरिमा मय बनाये रखने की प्रेरणायें मिलती हैं। इसलिए साधक स्वाध्याय के लिए भी अपनी डायरी में एक कालम अवश्य बनाकर रखे। सत्संग संसार की सबसे सुंदर वस्तु है। सत्संग में बिताया हुआ प्रत्येक पल भगवान के चरणों में बीतता माना गया है। डायरी में सत्संग काल की सुखद अनुभूतियों को भी स्थान देना चाहिए।

व्यक्तित्व में मूल्यों का करें निवेश डायरी में

डायरी में इस बात का भी जिक्र करें कि दीन-दुःखी, बीमार-रोगी, असहाय-अनाथ, लाचार और मजबूर की हमने कब, कैसे और क्या सहायता की है? सेवा-सहायता के कार्य को आगे बढ़ाना परोकार के अन्तर्गत ही आता है, सेवा कार्य जीवन को महानता से जोड़ता है।

व्रत-उपवास करना एक तप है, व्रतों से आत्मा शुद्ध होती है, संकल्प शक्ति बढ़ती है। भक्ति, श्रद्धा और एकाग्रता का संचार होता है। इस नियम पालना को डायरी में स्थान दें। वाणी संयम को महत्व दें तथा व्यंग्यात्मक शब्दों के प्रयोग से बचाव कराती है डायरी। सबके प्रति दया सहानुभूति की कामना रखने का भाव अंदर से जगाने का प्रयास करें। प्राणायाम-योग से जुड़े सूत्रों को भी डायरी का अंग बनायें। इसी प्रकार कुछ अवसर प्रायश्चित और पश्चाताप के भी समाहित होने चाहिए।

                तो आइये! जीवन निर्माण संबंधी ऐसे ही अनेक बिन्दुओं वाली डायरी बनायें, उनमें जीवन मूल्यों को स्थान दें, उन्हें आत्मसात करते हुए व्यक्तित्व में निवेश करें और दीपावली पर्व मनायें। 


Tuesday, 11 October 2022

नारी के सम्मान से ही धर्म-संस्कृति का उत्थान हो सकता है

 नारी के सम्मान से ही धर्म-संस्कृति का उत्थान हो सकता है



नारी धर्म का मूल

जीवन से जुड़े रिश्ते-नातों के समुचित निर्वहन से हमारे भाग्य, दुर्भाग्य, रोग, सुख-दुःख आदि का गहरा सम्बंध है, जो हमारे जीवन को हर स्तर पर प्रभावित करता है। इसीलिए जीवन में धर्मगत आचरण अपनाने के लिए परिवार में संबंधों का और समाज के बीच पर्व-त्योहारों का महत्वपूर्ण स्थान है। अक्सर हर पर्व-त्योहार के निर्वहन में नारी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। दीपावली में लक्ष्मी पूजन में नारी, विजयादशमी पर्व का आधार माता सीता हैं, भैया दूज पर्व में नारी के प्रति पवित्र दृष्टि जगाने की महत्ता है। नवरात्रों  में नारी का दैवीय स्वरूप, इसी प्रकार धर्मनिर्वहन के हर सम्भव कार्यों में नारी की भूमिका देखने को मिलती है। इस उत्सवगत धर्म का आधार भी नारी मानी गयी है।

दूसरे शब्दों में नारी धर्म का मूल है, नारी को परिवार निर्माण की धुरी माना गया है। नारी के सम्मान से धर्म-संस्कृति के उत्थान की बात कही ही जाती है। इस प्रकार हमारी सामाजिक व आध्यात्मिक क्रांति परिवारों के बीच से होकर गुजरती है।

 नारी परिवार निर्माण की धुरी है

नारी के संकल्प, संस्कार एवं स्वाभिमान के सहारे परिवार में देवमय संतानें गढ़ी जाती हैं, जिससे समाज में देवमय वातावरण का निर्माण सम्भव बनता है, ऐसी शास्त्रों की मान्यता है। वैदिक काल से हमारा भारत देश नारी सम्मान, नारी के प्रति पवित्र दृष्टि, सनातन परम्पराओं से ओतप्रोत नारी चेतना को पुनः-पुनः प्रतिष्ठापित करता रहा है।

समाज में देवमय वातावरण जगाने और भारत को वैश्विक गौरव दिलाने के योग्य बनाने हेतु पुनः नारी का आदर्श गौरव जनमानस में स्थापित करने की आज जरूरत है। केवल लेखनी में ही नहीं, अपितु जीवन के प्रत्येक आयामों में उसे गौरवान्वित ढंग से प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है। हर नागरिक को अपने चरित्र-चिंतन व व्यवहार में नारी शक्ति की दिव्यता-पवित्रता की अनुभूति जगाने की जरूरत है।

दुर्गा, सीता, पार्वती, लक्ष्मी, काली, जैसी देवियों से लेकर रानी चैनम्मा, अहिल्याबाई होल्कर, रानी लक्ष्मी बाई जैसी राष्ट्रविदुषियों को अपने घर-आंगन में खेलने का स्वप्न अंदर से जगाने की जरूरत है।

 

पुरुष वर्ग को अपने अंतःकरण से अहंभाव को निकालने के लिए भी नारी की संवेदनशीलता, गरिमा, मर्यादा, ममत्व, प्रेम, दया, करुणा, ममता आदि दिव्य गुणों को अपने अंतःकरण के स्वरूप में, चिंतन व

सम्पूर्ण नारी समाज के प्रति हो श्रद्धा

भावना में जगाने की आज बड़ी आवश्यकता है। पर अंतःकरण में सम्पूर्ण नारी समाज के प्रति श्रद्धा उड़ेलने, नारी को ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप मानने, उसके जीवन में समाये आध्यात्मिक मूल्यों को अपने अंदर प्रतिष्ठापित करने, हर पल ‘माँ’ की संवेदनशीलता, गौरवगरिमा को धारणा का विषय बनाने से ही यह सब सम्भव हो सकेगा।

दिव्य जीवन के निर्माण में पवित्र सम्बन्ध होना

अनुभव में आया है कि जहां दिव्य जीवन के निर्माण में पिता-पुत्र, मां-बेटी, पति-पत्नी, अन्य कुटुम्बियों के बीच परस्पर पवित्र सम्बन्ध निर्वहन का अपना विशेष महत्व है, वहीं सम्पूर्ण समाज की नारियों के प्रति हमारी भावसंवेदनाओं, उनके प्रति सोच आदि का स्वयं के शरीर, मन एवं आचरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। मान्यता है कि जिस व्यक्ति की भावनायें नारी जाति के प्रति श्रेष्ठ होती हैं, उनका व्यक्तित्व रोग रहित, सम्माननीय, यशस्वी, समृद्धि, लोक सम्मान आदि दिव्यताओं से सुसज्जित देखने को मिलता है। इसके विपरीत नारी के प्रति हीनभावनायें रखने वाले का सम्पूर्ण जीवन दुख-कष्ट-कठिनाइयों, बीमारियों, कर्जदारी, अपयशी, दुर्भाग्य जैसी विद्रूपताओं की खान बनता जाता है, वह भले कितना भी कर्मशीलता क्यों न अपना ले।

परम पूज्य सुधांशु जी महाराज कहते हैं ‘‘नारी साक्षात देवी-नारायणी है, वह सूक्ष्मरूप से सदैव परमात्मा के आभामंडल के घिरी रहती है। उसके आस-पास हर पल हर क्षण नारायण की सुगंधि बनी रहती है, यही कारण है कि नारी का सम्मान करने वालों के ऊपर नारायण की कृपा सहज बरसने लगती है और वह भौतिक लोक में यशस्वी जीवन जीता ही है, अगला जन्म भी किसी यशस्वी कुल में ही होता है।’’

धर्मशास्त्र कहता है कि पिछला जन्म दुराचरण से जुड़ा है, तो बीमारियां, कर्ज, बुराईयां कदम कदम पर मिलती रहती हैं। वहीं पिछला जन्म नारी शक्ति के प्रति धर्ममय, पवित्रता से ओतप्रोत होने पर स्वयं का आचरण धार्मिक और सेवामय बन जाता है और उस व्यक्ति के जीवन से संकट दूर रहते हैं। आचरण की प्रमाणिकता नारी के प्रति हमारे व्यवहार-सोच से भी स्पष्ट होती है।

अनेक संबंधों में गूथ कर रखा है नारी ने

व्यवहार में नारी को अनेक संबंधों के साथ गूथ कर रखा ही इसीलिए गया है कि नारी के सानिध्य को पाकर पुरुष पवित्र जुड़ाव का परस्पर आदान-प्रदान करते हुए ईश्वरत्व की अनुभूति कर सके। उदाहरणार्थ माता का प्रेम ईश्वर के प्रेम का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है, वैसे ही पत्नी का त्याग एवं समर्पण, बहन की ममता, पुत्री की कोमतला के रूप में नारी की उच्च दैवीय अवस्था का अंतःकरण में साक्षात् दर्शन किया जाना चाहिए। प्राचीनतम काल से नारी उपासना की मुख्य भूमिका रही है। नवरात्रि सहित जीवन उत्थान संबंधी विविध धर्म आदि अनुष्ठानों की पूर्णता में कन्या पूजन, कन्या भोजन, कन्या सम्मान जैसी परम्परा जोड़ी गयी है।

अतः हम सब मिलकर नारी की गरिमा को अपने जीवन एवं जन जन के बीच जगाने का घर-परिवार में वातावरण जगायें, स्वयं के यशस्वी जीवन के लिए नारी को यशस्वी बनायें और नारी के प्रति गरिमामय भाव से भैयादूज आदि पर्व मनायें, जिससे समाज को गौरवशाली मार्ग मिल सके। 

Tuesday, 4 October 2022

पूर्णाहुति महोत्सव है विजयादशमी

 पूर्णाहुति महोत्सव है विजयादशमी

 


अक्सर लोग मनोकामना पूरी करने के लिए साधनाओं का रास्ता अपनाते हैं, पर पैसे-धन-सम्पत्ति से अधिक जरूरत रहती है जीवन जीने की सही शैली अपनाने की। साधनाओं का सुफल वास्तव में जीवन जीने के सही रास्ते के रूप में ही मिलता है।

झोपड़ी में रहकर भी राजा

धर्म-अध्यात्म के सभी पहलू जैसे ध्यान, जप, तप, यज्ञ, सभी सेवा-साधनायें जीवन को सही ढंग पर ले चलने की प्रेरणायें देते हैं, तब व्यक्ति झोपड़ी में रहकर भी राजा अनुभव कर सकता है। इस संदर्भ में नौ दिन चलने वाली नवरात्रि साधना का अत्यधिक महत्व है, नवरात्रि साधना में माँ आदि शक्ति जगदम्बा के नौ रूपों की साधना का

विधान है, जिससे दुनिया के लोगों को सदा हंसता- मुस्कुराता जीवन जीने का आशीष मिलता है। पूज्य महाराजश्री कहते हैं “नवरात्रि साधना से साधकों को धरती पर रहकर स्वर्ग जैसी अनुभूति करने की कृपा आशीर्वाद माँ आदि शक्ति से सहज मिलता है। माँ की कृपा से साधक सदैव खुश रहते हैं, संतुष्ट रहते हैं, उनके चेहरे सतत माँ जगदम्बा के प्रति आभार प्रदर्शित करते दिखते हैं, उनके अंतःकरण में धन्यवाद भाव की अनुभूति भरती है। जीवन के हर क्षण असीम कृपायें बरसती रहती हैं। इसीलिए नवरात्रि साधना भारतीय संस्कृति में शक्ति-साधना के विशेष महत्व के साथ मनाया जाता है।”

विजयादशमी है क्या ?

 साधक नौ दिन तक माँ जगदम्बा की उपासना करते और दसवें दिन अपने अपने ढंग से विजयादशमी का महोत्सव मनाते हैं।

वास्तव में दशहरा पर्व भगवती ‘विजया’ के नाम पर ही विजयादशमी कहलाया। माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को विजय नामक मुहूर्त होता है। यह मुहूर्त सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है, इसलिये भी इसे विजयादशमी कहते हैं। आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये। स कालो विजये ज्ञेयः सर्वकार्यार्थसिद्धये।। कुल मिलाकर विजयादशमी का संबंध शक्ति से है। शक्ति के लिये दुर्गा की उपासना की जाती है। कहीं-कहीं तो यह त्योहार दस दिनों तक चलता रहता है। अर्थात माँ जगदम्बा की साधना के साथ आश्विन मास शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होकर दशमी के दिन इस दशहरा पर्व की पूर्णाहुति होती है। प्रतिपदा के दिन रामलीला के साथ देवी भगवती की स्थापना की जाती है। आठ दिनों तक नियमपूर्वक देवी की पूजा, कीर्तन और दुर्गा पाठ, रामलीलायें होती हैं और दशमी को पूर्णाहुति की जाती है।

इस दौरान प्रायः लोग माता दुर्गा की शक्ति की पूजा, उपासना, आराधना, व्रत, नियम, जप-तप, यज्ञ-अनुष्ठान में लीन होते देखें जाते हैं। इन नौ दिनों माँ भगवती के सामने दुर्गा सप्तशती, देवी भागवत, पूजा ध्यान-

आराधना से साधक आत्म शक्ति का अर्जन करते हैं। सनातन परम्परा में नौ दिन तक माँ भगवती के एक-एक स्वरूप का ध्यान करते हुए व्रत-उपवास, पूजन, अर्चन करना विशेष फलदायी माना जाता है। इन नौ रूपों की साधना में

1.       प्रथम दिन ‘शैलपुत्री’ अर्थात् माँ नवदुर्गा के बालरूप शैलपुत्री का पूजन होता है। प्रथम दिन हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में एक वर्ष की कन्या के पूजन से नवरात्रि का शुभारम्भ होता है।

2.       नवरात्र के दूसरे दिन ‘द्वितीयं ब्रह्मचारिणी’ का ध्यान करते हुए सच्चिदानन्द स्वरूप की अनुभूति का विधान है।

3.        ‘तृतीयं चन्द्रघण्टेति’ तीसरे दिन तीन वर्ष की कन्या में आनन्ददायी चन्द्र का ध्यान करते हुये व्रत-उपवास पूजन-अर्चन का विधान है।

4.        ‘कूष्माण्डेति चतुर्थकम्’ नवरात्रें के चतुर्थ दिवस माँ कूष्माण्डा का ध्यान व्रत-उपवास-पूजन-अर्चन करते हैं।

5.        ‘पंचमं स्कन्दमातेति’ नवरात्र के पांचवे दिन स्कन्दमाता अर्थात् कार्तिकेय की माँ का ध्यान करते हुए पूजन करते हैं।

6.       षष्ठं कात्यायनीति’ नवरात्र के छठे दिन माँ दुर्गा कात्यायनी के स्वरूप का ध्यान करते हुये नवदुर्गा की पूजा-आराधना अत्यधिक लाभप्रद होती है।

7.       सातवें दिवस ‘सप्तमं कालरात्रीति’ माँ के कालरात्रि स्वरूप का दर्शन करते हुए श्रद्धाभाव से माँ कालरात्रि के पूजन का विधान है।

8.        ‘महागौरीति अष्टमम्’ नवरात्र के आठवें दिन भगवती के महागौरी स्वरूप का पूजन करने का विधान है।

9.       नवरात्र के नवें दिन ‘नवमं सिद्धिदात्री’ नौ वर्ष की बालिका में सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली मोक्षस्वरूपा माँ भगवती का ध्यान करते हुए व्रत-उपवास, अनुष्ठान की पूर्णाहुति की जाती है।

दशहरा पर्व को नौदुर्गा साधना का पूर्णाहुति महोत्सव भी कह सकते हैं। नौ रूपों में माँ आदिशक्ति के पूजन- अर्चन से साधक के व्यक्तित्व को पूर्णता मिलती है।

जीवन को निष्कंटक बनायें

शास्त्र में वर्णन है कि नवरात्रि साधना-अनुष्ठान यज्ञ और दान के बाद ही पूर्ण होते। अनुष्ठान का दशांश यज्ञ और ब्रह्मचारी, वृद्ध, गाय, गुरुकुल के विद्यार्थियों-आचार्यों व ब्राह्मणों को भोजन खिलाने से देवता व माता की कृपा से सर्वमंगल का मार्ग प्रशस्त होता है। यज्ञ के शेष भाग रूप में गाय, कुत्ता, चींटी, पक्षियों को भोजन खिलाने की भी परम्परा है। मान्यता है कि जैसे जैसे पवित्र कमाई के अंशदान से प्राणियों की भूख व प्यास रूपी व्याधि दूर होती है, उसी स्तर पर साधक के जीवन में विद्या, धर्म, तप, ज्ञान, मोक्ष आदि सभी नियम सधते हैं और उसका लोकमंगल जगता है। संकट कटते हैं और श्री, समृद्धि, यश, प्रतिष्ठा की बृद्धि होती है।

आइये! माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की साधना के साथ विजयादशमी पर्व मनायें और जीवन को निष्कंटक बनायें।