माँ को केंद्र
में लाने का अभियान चलायें
माँ एवं
मातृशक्ति को सम्मान देना आवश्यक है
माँ शब्द में
करुणा, प्रेम, संवेदनशीलता और न्याय की सहज अनुभूति होती है।
इसीलिए भारतीय संस्कृति में सम्पूर्ण जीवन का केंद्र बिन्दु माँ मानी गयी है। इसके
विपरीत मातृचेतना के प्रति जब-जब सदाशयता कम हुई, व्यक्ति अपनी करुणा, प्रेम, संवेदनशीलता,
न्यायशीलता आदि निज स्वभाव को खोकर कट्टरता का
शिकार हुआ, परिणाम स्वरूप समाज भी
कट्टरता की आग का शिकार होने को विवश हुआ। आज व्यक्ति के साथ-साथ सम्पूर्ण वैश्विक
जगत कट्टरता का शिकार है और अज्ञानता वश इससे राहत पाने का मार्ग वह भौतिक
संसाधनों में खोज रहा है। शास्त्र व संत कहते हैं जीवन-समाज में संवेदनशीलता लाने
के लिए माँ एवं मातृशक्ति को सम्मान देना आवश्यक है।
मातृदिवस तो मनाया
जाता है पर
आज का मानव मातृदिवस मनाता है, लेकिन माँ के प्रति अहसास खो बैठा है। वह भूल
बैठा कि माँ हर पीड़ा को सहकर अपने बच्चे को सुरक्षित संरक्षित करती है, वह अपनी निद्रा, भूख, प्यास, सुख, शांति, चैन सबकुछ अपने बच्चे पर
कुर्बान करके उसका पालन पोषण कर बड़ा करती है। माँ में पालक, पोषक, संरक्षक, निवारक आदि सभी गुण होने के साथ-साथ उसके हर
कदम में करुणा, प्रेम, संवेदनशीलता, न्यायशीलता भरी होती है। आज मनुष्य बड़ा तो हुआ पर
मातृचेतनात्मक मूल्यों के अभाव में वह जिस भी तंत्र का भागीदार बनता है, उसे कट्टरता का शिकार बना देता है। कट्टरता
जहां भी होगी औचित्य-संवेदना-प्रेमभावना-करुणा एवं न्याय वहां से दूर रहेगा।
कट्टरता ने
सुलझाया नहीं, अपितु सब कुछ
उलझाया है
यह कट्टरता स्वयं
के जीवन शैली से जुड़ी हो, आहार सम्बन्धी
कट्टरता हो, व्यक्ति के आदतों
की हो अथवा उसके रीति-रिवाजों, परम्पराओं,
रूढ़ियों, संकल्पों, मान्यताओं एवं
पहनावा, क्षेत्रीयता, भाषावाद अथवा उपासना सम्बन्धी कट्टरता क्यों न
हो। कट्टरता ने सुलझाया नहीं, अपितु सब कुछ
उलझाया ही है। यहां तक कि कट्टरता के चलते संवेदनाओं का ड्डोत धर्मतंत्र तक में
औचित्यहीनता और असंवेदनशीलता प्रवेश करती जा रही है। इस इक्कीसवीं सदी में जड़ता,
कट्टरता के और भी अनेक पक्ष सामने आये हैं।
जैसे आर्थिक तंत्र पर पूंजीपतियों का कब्जा होना, विश्व की राजनीतिक शक्ति पर कट्टरपंथियों का हॉवी होना आदि,
जिसके कारण वे औचित्य व सरोकार से दूर होते जा
रहे हैं।
भारतीय संस्कृति
अनन्तकाल से मातृचेतना से ओतप्रोत थी
भारतीय संस्कृति
अनन्तकाल से संतो, गुरुओं, ऋषियों की संस्कृति रही है, जो मातृचेतना के सम्मान से ओतप्रोत थी। दूसरे
शब्दों में कहें तो सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्थायें मातृ चेतना पर केंद्रित थी,
परिवार की मुखिया की भूमिका से लेकर सभाओं,
सेनाओं, राजनीतिक दायित्वों तक के निर्वहन में नारी अपने मातृत्व
सोच के साथ बराबर की भूमिका निभाती आयी है। यहां तक कि धार्मिक कर्मकाण्ड से लेकर
आर्षग्रंथों, वेदों की रचना तक
में इस माँ व मातृशक्ति ने अपने उत्तरदायित्व को सम्हालते हुए समाज में करुणा,
प्रेम, न्याय, संवेदनशीलता, औचित्य को कायम रखा। पर पिछली कुछ शताब्दियों
में इस संस्कृति पर हुए राजनीतिक, सैन्य, सांस्कृतिक हमलों ने देश की संस्कृति, जीवन मूल्य, संस्कार, जीवन शैली,
माँ एवं मातृजगत के प्रति व्यवहार आदि सबको छिन्न- भिन्न कर दिया है।
परिणामतः सामाजिक मूल्यों के साथ-साथ हमारी माँ ही उपेक्षित हो गयी। 20वीं शताब्दी आते आते उपभोगवादी विचारधारा ने
संयुक्त परिवारों के विघटन को जन्म दिया और भारत के बड़े-बूढ़ों के साथ हमें
जीवन-पोषण-संरक्षण देने वाली हमारी माँ स्वयं उपेक्षा, अकेलेपन व असुरक्षा की शिकार हो बैठी। आज की नई पीढ़ी भी माँ
को उपेक्षित होते देख भर रही है। इस प्रकार करुणा, प्रेम, संवेदना, न्याय प्रियता से जोड़ने वाली माँ से कटकर हम सब
की मनोदशा सिमट व जकड़कर कट्टर बन गयी।
मातृ देवो भव,
पितृ देवो भव
आज की नई पीढ़ी
अपने सामने खडे़ आर्थिकी जैसे भयावह प्रश्न में अपनी सिमटती, जकड़ती, तनावग्रस्थ मनोदशा के लिए समाधान खोजने के असफल प्रयास में जुटी है और दूसरी
ओर संवेदना-करुणा-प्रेम-न्यायशीलता को अपनी कोख में समेटे माँ लाचार खड़ी आंसू बहा
रही है। इस प्रकार आज जिस माँ ने जीवन दिया उसकी अपनी ही संताने आमने-सामने
प्रतिद्वन्द्वी बनकर खड़ी हैं। पूज्य सद्गुरु श्री सुधांशु जी महाराज कहते हैं फ्हर
सम्बंध का मूल माँ है, माँ के प्रति
उपेक्षा भाव आने पर सामाजिक सम्बन्धों का महत्व भी क्षीण होता है और लोग शारीरिक,
मानसिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं के शिकार होते हैं।
युवावर्ग पर उपयोगितावाद व महात्वाकांक्षा प्रभावी होती है और बुजुर्ग पीढ़ी
युवावर्ग पर स्वार्थी, संस्कार हीन होने
का आरोप लगाती है। ऐसे में जरुरत है हमें बिखरते समाज को एक धुरी पर लाने के लिए
पुनः माँ व मातृचेतना को गरिमामय स्थान देने और माँ के मूल्यों को आत्मसात करने
की। चिन्तन शैली में मातृ देवो भव, पितृ देवो भव को
स्थापित करने की।
समाज निर्माण माँ
द्वारा सिखाये मूल्यों की छाया में करना होगा
इसके लिए हमारे
गुरुओं, संतों, योगियों को उदार, सात्विक, सृजनशील, शाश्वत, संवेदनशील व्यक्ति गढ़ने होंगे जो पहनावे, देवालयों, परम्पराओं व किन्हीं विशेष किताबों से नहीं, अपितु जीवन शैली, संवेदना, सद्चरित्रता,
सद्विचारों, सद्भावनाओं, श्रद्धा-भक्ति से
संचालित हों। जो मनुष्यता के गुणों से अपने मनुष्य होने का आंकलन करें और दैवीय
गुण शांति, प्रेम, आनन्द से ओतप्रोत मानव बनकर मानवता के पक्ष में
खड़े हों। तब बौद्धिक स्वार्थपूर्ण कट्टरता भरे बाजारवादी कुचक्र से सबको गुलाम बना
डालने की प्रवृत्ति रुकेगी। घर के भीतर हर नारी को दहेज, हत्या, भ्रूण हत्या,
घरेलू
प्रताणना,
पर्दा प्रथा, लिंगभेद, धार्मिक बंधनों,
अशिक्षा, गरीबी से लेकर अनेक प्रकार की हिंसा की शिकार होने से
मुक्ति मिलेगी। वाणी, विचारों, चरित्र आदि सभी प्रकार की जड़तायें-कट्टरतायें
मिटेंगी।
यद्यपि संवेदनशील समाज गढ़ना एक दिन में सम्भव
नहीं है। इसके लिए व्यक्तियों का निर्माण माँ द्वारा सिखाये मूल्यों की छाया में
करना होगा। यह कार्य न कोई सरकार कर सकती है, न संविधान, कानून, न्यायालय अथवा कोई प्रशासन। यह कार्य समाज के
सदपुरुष, संत, सद्गुरु अपने सात्विक चिंतन-चरित्र, सेवाभावी मानकों, परमात्मा की कृपाओं में मातृ चेतना की जनमानस में अनुभूति
करा करके, विश्वास जगाकर करना सम्भव
होगा। सदियों से चले आ रहे असंतुलन को संतुलित करने के लिए स्वयं प्रकृतिस्थ,
सात्विक, उदार, क्षमाशील,
तृप्त, आनन्दपूर्ण, धन्यवादी व
संवेदनशील होना होगा।
गुरु सन्देश
पूज्य सद्गुरु श्री सुधांशु जी महाराज इस दिशा
के युगीन प्रयोगकर्ता हैं। लाखों लोग इनके प्रयोग से पुनः माँ द्वारा प्रदत्त
मूल्यों की ओर लौट रहे हैं। धन्यवादी, क्षमाशील बन रहे हैं। यज्ञीय संस्कृति के पोषक बनकर परमात्मा के विधान में
खुशी-खुशी जीवन निर्वहन का संकल्प ले रहे हैं। कट्टरता भरी भावनात्मक विकृतियों की
गांठों को गलाकर परोपकारी, उदारवादी मनुष्य
बन रहे हैं। निश्चित पूज्यवर के इन प्रयोगों से जन-जन के जीवन में माँ को सर्वोच्च
स्थान मिलेगा और चहुँदिश छाई हुई सम्पूर्ण कट्टरतायें टूटेंगी।

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