एकाग्रता-उल्लास जगायें, ध्यान का मूल स्रोत पायें
ध्यान का मूल
मंत्र
एकाग्रता और
उल्लास जीवन की गहराई में समाहित ऐसी अद्भुत शक्ति धारायें हैं, जो व्यक्ति को नये ऊर्जा से भरकर रखती हैं। जिन
मनुष्यों में ये शक्ति धारायें अधिक प्रवाहमान होतीं हैं, उनका जीवन व्यवहार अधिक संतुलित होता है। जिनमें कम होती
हैं वे अपने जीवन क्रम के किसी भी पक्ष को अधिक देर तक संतुलित नहीं रख पाते।
क्योंकि ऐसे व्यक्त्तियों का चित्त स्थिर नहीं होता, चित्त स्थिर न हो पाने से सफलता की गहराई सिमटने लगती है।
जबकि एकाग्रचित्त व्यक्ति अपनी आंतरिक चेतना की उन किरणों को जो बिखरी हुई हैं,
उन्हें एकजुट करने में अधिक सफल होते हैं। साथ
ही उसका आंतरिक उल्लास जीवन की ऊर्जा को सकारात्मक धारा से जोड़कर निज स्त्रोत्र से जोड़ने में मदद करता है, यही ध्यान का मूल मंत्र है।
एकाग्रता एवं
उल्लास
ध्यान में आत्म
चेतना की किरणों को आज्ञाचक्र पर एकजुट करना होता है। ध्यान अवस्था में जब साधक की
सम्पूर्ण शक्तियां आज्ञाचक्र पर आकर मिलती हैं, तो अंदर एक प्रकार से उल्लास की धारा बहने लगती है, जिससे आत्म विश्वास जगता है और साधक में ऊर्जा
के वे स्त्रोत्र फूटने लगते हैं, जो अभी तक खुल
नहीं पाये थे। इस प्रकार शरीर, जीवन, मन, विचार एवं संकल्प आदि में नवीनता आती है और लोक जीवन में नये नये आइडिया आने
लगते हैं। लोक जीवन एवं लोक व्यवहार में संतुलन सधता है। इसीलिए एकाग्रता एवं
उल्लास इन दोनों शक्तियों का योगियों ने सतत जगाने पर जोर दिया है।
प्रार्थना करें
अब हम उस विधि पर
चिंतन करते हैं जिससे एकाग्रता एवं उल्लास को ध्यान के सहारे जगाया जा सके। इसके
लिए सर्व प्रथम मन ही मन अपने सद्गुरु के प्रति श्रद्धा जगायें और उनसे प्राप्त
आशीर्वाद को भावना के साथ हृदय में धारण करें। इससे ध्यान घटित होने में सहायता
मिलती है, जिस प्रकार जमीन में बीज
बोने से पूर्व उसको उर्वर बनाना आवश्यक है, वैसे ही अपने हृदय की जमीन को गुरुकृपा से अभिसिंचित करके
उसे उर्वर बनाते हैं। इससे ध्यान भूमि तैयार होती है और अंतःकरण से सदभावों के
अंकुर, आनन्द के अंकुर उगने संभव
होते हैं। इसके बाद सद्गुरु को हृदय से पुकारते हुए गुरु की ऊर्जा में स्वयं का
सुयोग महसूस करें, मन ही मन व्याकुल
होकर गुरुदेव से प्रार्थना करें कि हे गुरुवर मुझे उस ओर ले चल जहां प्रभु का
प्रेम बसता है, मुझे तेरी कृपा
के बिना इस अमृत की प्राप्ति नहीं हो सकती। मेरे ऊपर कृपा कीजिए, मैं शरणागत हूं मेरी पुकार सुनिए।
अंतःकरण में भी फूटता
हैआनन्द
ध्यान के लिए
अपने आसन का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए, अपने आसन को बिछाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके आराम से बैठें। मन में कोई तनाव,
दबाव, चिन्ता, भय और भ्रम आदि
बिल्कुल न लायें, अपितु अपने चारों
ओर शांति मन ही मन स्थापित करके आसन पर बैठें। रीढ़ सीधी रहे, पर सहज होकर बैठने की कोशिश करें। इस प्रकार
भाव प्रार्थना के साथ प्रकृति से अपना तादात्म्य स्थापित करें। प्रकृति व परमात्मा
के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कीजिए। क्योंकि जब हम धन्यवादी होते हैं, तब ही प्रकृति वरदान देती है। घास, पेड़-पौधे, वनस्पति-औषधियां सब कल्याण के लिए कार्य करने लगते हैं,
इस प्रकार अंतःकरण में भी आनन्द फूटता है।
मिलेगी नई ऊर्जा
धीरे धीरे
अंतःकरण में एकाग्रता की शक्ति बढ़ने लगेगी, अंदर से उल्लास भाव भी बढे़ता है, उसमें पूरी तरह से डूबते जायें। उस समय न कोई कल्पना करें,
न कोई तनाव मन में आने दें, बस डूबे रहें, रस लें, इसी को धारणा
कहते हैं। इस प्रकार भावना सहित शक्तियों को एकाग्र करते हुए उसी में खो जाने से
ध्यान घटित होता है। जितनी देर तक मन टिक पाता है, उसे टिकायें, यही साधक का धर्म है। यह प्रयोग नित्य कर सकें तो कुछ ही दिन में जीवन में
रूपांतरण प्रारम्भ होगा और जीवन को नई ऊर्जा मिलेगी।

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