Thursday, 29 December 2022

जीवन का नवीनीकरण ही है नववर्ष का संदेश

 जीवन का नवीनीकरण ही है नववर्ष का संदेश

 


डॉ. अर्चिका दीदी

 

नववर्ष का संदेश

प्रत्येक ऊषाकाल में सूर्य की किरणें धरती पर स्वर्णिम आभा बिखेरती हैं और सभी जीवों का जीवन गतिमान हो उठता है, जो जीवन ठहरा हुआ था वह गति में आ जाता है। गति ही जीवन है, गति अर्थात आगे बढ़ना, उन्नति करना, श्रेष्ठ प्राप्त करना और प्रगति के शिखर का स्पर्श करना, यही नववर्ष का संदेश है। यही श्रेष्ठजनों का उद्देश्य है और यही ईश्वरीय आदेश है।

भूल जाना चाहिये

नया वर्ष प्रारंभ हुआ है, बीते वर्ष में आपके सामने कई निराशाएँ, कुंठाएँ,  परेशानियाँ, आवश्यकताएँ  आई होंगी, उनको भूल जाइए, उनसे सीखिए, भविष्य के उद्देश्यों का चिंतन कीजिए, अपनी सोच को बदलिए, नए वर्ष की नई प्रभात में यह निश्चय कीजिए कि भविष्य मेरी प्रतीक्षा कर रहा है, मुझे नए वर्ष में आगे बढ़ना है, प्रगति करनी है, मुझे सफलता के शिखर छूने हैं, मैं इस योग्य हूं, ईश्वर ने मुझे इस योग्य बनाया है कि मैं परिश्रम करके जीवन की प्रत्येक क्षेत्र में बहुत कुछ प्राप्त कर सकता हूं। वह क्षेत्र भौतिक हो, सांसारिक हो या हो आध्यात्मिक, मुझे प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ना है। नए संकल्प कीजिए।

पीछे मुड़कर मत देखो

ईश्वर हमेशा चाहता है कि आप जीवन में आगे बढ़ें, उन्नति करें, आपका जीवन पीछे मुड़कर देखने के लिए नहीं है, आगे बढ़ने के लिए है, समाज में अनेक प्रकार की प्रतियोगिताएँ  होती हैं, दौड़ प्रतियोगिता में अगर कोई धावक पीछे मुड़कर देखता है तो वह गिर सकता है, दौड़ में पीछे रह जाएगा, उसकी पराजय होगी। उसका उद्देश्य है विजेता बनना, जीवन में रुकने से प्रगति रुक जाती है।

कैसे मनायें नववर्ष

आज समाज में प्रचलन है कि नए वर्ष वाले दिन से पूर्व सारी रात जागो, नाचो, गाओ, संगीत बजाओ और खुशी मनाने के लिए लोग नए-नए तरीके खोजते हैं, शराब पियेंगे, मस्ती करेंगे, यह नए वर्ष का स्वागत नहीं है। यह इंद्रिय जनित क्षणिक सुख है, नए वर्ष की नव प्रभात में आध्यात्मिक उदय का संदेश है, यह वह स्वर्णिम अवसर है जब आप अपनी अंतर्चेतना को जागृत करके जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। ईश्वर की शक्तियों में विश्वास करो, गुरु से मार्गदर्शन लो और उसके उद्देश्यों के अनुकूल जीवन की दिशा बदलकर अपने जीवन की दशा सुधारो, अपनी सुप्त शक्तियों को पहचानो, अपनी सांभव्य ऊर्जा का प्रयोग करें। समय तुम्हारी इंतजार में है। वर्तमान में तुम जिस स्थिति में हो, तुम उससे आगे जा सकते हो।

 

करें नववर्ष में संकल्प

नए वर्ष की सुबह का इस संकल्प के साथ स्वागत करें कि हमने जीवन में नकारात्मक सोच, निराशाओं, असफलताओं का परित्याग करके आत्मचिंतन करते हुए नई जीवन ज्योति को जागृत करना है। जब हम निरंतर प्रगति, परिवर्तन और आत्म विकास का चिंतन करेंगे तो यह विचार हमारे मन पर, चित्त पर अंकित हो जाएगा और आपके अंदर ऐसी नव साहस, भावना, लग्न का उदय होगा जो आपको उन्नति के नए शिखर प्राप्त करने का सामर्थ्य प्रदान करेगा। आपके अंदर एक नए आदर्श का जन्म होगा और आप एक नए इंसान बन जाएंगे, तो नव वर्ष की इस नई आभा के साथ अपने जीवन को नवीन कीजिए और सुख आनन्द का जीवन व्यतीत कीजिए। नव वर्ष में आप सबका जीवन स्वरूप सुखद व मंगलमय हो, यही मेरी कामना है, ईश्वर से प्रार्थना है।

Tuesday, 27 December 2022

TWO PATHWAYS - To wake up or to run away

 TWO PATHWAYS - To wake up or to run away


 

To achieve the set objective

 

There are two ways to live in this society – either to run away from yourself or to live within ourselves. In case one has to run away from oneself then it is better to identify the aim to get out. One has either to become big, or to earn money or to be a prominent politician. You get deeply involved in the process like mad day and night and think about whatever ways and means to achieve the set aim. After that, all your love will extinguish, your inner peace will get destroyed and the compassion inside you will also be lost. Your inner satisfaction and balance will get distorted. You will be totally focused only on one issue, that is, to achieve the set objective. You are thus running away from yourself.

 

Start of religion/duty

 

If you have to be awakened within yourself then there is another way. Whatever external discoveries are there and whatever are the worldly objects, these are fine to live the life but these are not the real aims of life. The principal aim is to know thyself and to understand yourself. The moment from where the efforts to know thyself start, that is the beginning of true spiritualism. You then turn spiritual. That is the start of religion/duty.

 

More valuable in the world

 

The meaning of being spiritual is to move towards soul, knowing God, understanding the world and to make a proper use of physical objects. We have within us a controlling power by realizing which we can control ourselves. The development of that power is called spirituality. Whatever inventions have been made in the world so far are to provide facilities to the man but they are not worthwhile and valuable. If there is anything more valuable in the world, then it is the man.

 

Poison as well as nectar


Among all the living beings in this world, man is the most valuable, and all the discoveries and inventions made by the man are still most valuable. That is why, first of all, man has to discover himself. We have already gone deep under the depths of oceans but have not yet fathomed the depths of human mind because in there is the poison as well as nectar. To take the poison out of man’s heart and to keep the nectar intact and alive it should be our endeavour. We should try to divert science in this direction.

 

 

 

 

 

Tuesday, 20 December 2022

अवहेलना हुई तो अस्तित्वहीन हो जाना सुनिश्चित है

 अवहेलना हुई तो अस्तित्वहीन हो जाना सुनिश्चित है

 


यह युग पदार्थ एवं चेतना दोनों के उच्च रूपांतरण का है

दुनिया तेजी से बदल रही है, विकसित, सभ्य, संस्कारवान व समझदार भी हो रही है, इसे चेतना और पदार्थ दोनों के सह-अस्तित्व जागरण और उच्च रूपांतरण का युग, प्रत्येक के अस्तित्व को स्वीकार करने वाला युग कह सकते हैं।

आज सेटेलाइट युग है

हम सूचना व संदेश को ही लें, तो देखते हैं कुछ दशक पूर्व तक सन्देश पहुचाने में सप्ताह लग जाता था, चिट्ठी-पत्री का जमाना था, जो बहुत ही मंद और निर्धारित प्रोसेस के अधीन था, आज सेटेलाइट युग है, जिसमें एक साथ एक ही समय में अलग-अलग देशों में बैठे लोगों से इस तरह बात कर सकते हैं, जैसे किसी चौराहे पर मिलकर कर रहे हों। केवल बातचीत ही नहीं, अपने जेब में रखी राशि को हम तेज गति से सुदूर भेजने में सफल हैं।

विशेषज्ञ ग्लोबल युग कहते हैं

आज वस्तुएं खरीदनी हैं, तो मार्केट जाने की जरूरत नहीं, घर बैठे शॉपिंग पूरी। पल भर में घर बैठे दुनियां के किसी भी छोर के संसाधन उपलब्ध कराने, मंदिरों-देवालयों से लेकर विश्व प्रसिद्ध धरोहरों के दर्शन कराने, विश्व में कहीं भी घट रही घटना को लाइव देख लेने, शिक्षण कार्य में कठिन विषयों से जुड़ी समस्याओं के समाधान पाने आदि कार्यों को इंटरनेट सेकेंडों में कर देता है। इस प्रकार पदार्थ एवं चेतना दोनों के सह-अस्तित्व वाले असंख्य रूपों में उच्च स्तरीय रूपांतरण से हम सब निकट आ गये हैं। इसी को विशेषज्ञ ग्लोबल युग कहकर संबोधित करते हैं।

जड़ता से मुक्त चेतना का युग

कुछ लोग इस सभ्यता को संस्कार और समझदारी की दृष्टि से नई पीढ़ी व किशोर-युवा वर्ग को भटकाने वाली, उनमें अनुशासनहीनता पैदा करने वाली, परिवार की एक जुटता को खण्डित करने वाली कहते नहीं थकते। पूज्यवर कहते हैं कि अक्सर नई पीढ़ी के वर्तमान व्यवहार देखकर अनेक लोग पूरे कालखण्ड को ही दोषी ठहराने लगते हैं, पर गौर करें तो लोगों द्वारा जिसे अनुशासनहीनता, संस्कारहीनता, नासमझी की संज्ञा दी जा रही है, वह पदार्थ के साथ साथ मानव चेतना का उच्च स्तरीय रूपांतरण है, हर किसी के अस्तित्व जागरण, अस्तित्व स्थापना एवं जीव-मानवमात्र के महत्व को स्वीकार करने वाली प्रक्रिया का अंकुरण है, अर्थात हर व्यक्ति द्वारा अपने और दूसरों के अस्तित्व व महत्व को स्वीकार करने वाला यह युग कह सकते हैं, इसे जड़ता से मुक्त चेतना का युग भी कह सकते हैं।

 

परिवार- समाज में एक प्रधानता का होना ?

कुछ दशक पीछे जाकर देखें तो परिवार के बीच किसी एक ही व्यक्ति का अस्तित्व होता था, उसी का आदेश चलता था, वह सही कहे अथवा गलत। यही स्थिति समाज के बीच थी। खाने-पीने, पहनने, पर्व-त्योहार मनाने की रीतियों से लेकर सोने-जागने-विश्राम करने तक की एक निर्धारित नियम ही सबको स्वीकार करनी पड़ती थी। यह स्वीकार्यता स्वैच्छिक दिखते हुए भी सभी के द्वारा चेतना के गहरे तल तक अपने अस्तित्व को अस्वीकार करने जैसी थी। उल्लंघन करने पर कठोर सजायें थीं। धर्म का डर, परम्पराओं का डर, संस्कारों, देवताओं, मान्यताओं, बड़प्पन से लेकर भूत-प्रेत आदि न जाने कितनी विधियों का डर हर किसी पर हावी रहता था।

अर्थात निर्धारित लकीर का पालन कराने वाले और उस लकीर पर चलने वाले दोनों पक्षों को नहीं मालूम था कि ये सब क्यों किया जा रहा है अथवा इनमें भरी पड़ी इतनी अमानवीयता, सिद्धांतहीनता, अतार्किकता, अस्तित्वहीनता और जड़तायें स्वीकारने को क्यों सब विवश हैं?

परिवार- समाज में एक प्रधानता का होने के दुष्प्रभाव ?

 

वास्तव में संस्कार-समझदारी एवं परम्पराओं के नाम पर सदियों तक जादू-टोना जैसा यही सबकुछ चलता रहा। इसी अस्तित्वहीनता, अस्वीकारोक्ति के चलते भारत जैसा देश एक महाभारत जैसी भयानकता झेल ही चुका है।

धृतराष्ट्र से लेकर गांधारी, दुर्योधन, भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, स्वयं पांचों पाण्डव सभी अपने अपने अस्तित्व को अस्वीकार करके लकीर मात्र पर चलने वाले उदाहरण ही तो हैं, इन्होंने जो वह हैं, उसे न स्वीकार करके मात्र परम्पराओं में बंधकर दुर्भाग्य को आमंत्रित किया और लाखों वीर योद्धा दुखद भेंट चढे़। उदाहरणार्थ धृतराष्ट्र का शरीर व जीवन जिस रूप में था, उन्होंने उसे परम्पराओं के चलते उस रूप में स्वीकार नहीं किया और अपने आप को जीवन भर कोसते रहे, इसी प्रकार गांधारी में जन्म से अंधता नहीं थीं, इसके बावजूद आँखों  पर पट्टी बांध रखी थी, गांधारी आंखे होते हुए भी पति परमेश्वर के नाम पर अपने को जीवन भर आंखों के साथ स्वीकार नहीं कर पायीं। भीष्म समर्थ होकर भी अपनी अतार्किक व थोथी राजभक्ति के चलते गलत का साथ देते रहे।

लगभग सभी पाण्डवगण जुआ जैसी दूषित राज परम्परा के अधीन होकर द्रौपदी सहित अपने आप को दांव पर लगा डाला। वास्तव में जिस समाज में माँ-पिता, अगुआ, राजा, पार्षद, पुरोहित, धर्माधीश से लेकर हर एक व्यक्ति केवल पूठि व रूढ़ियों को ढोता है और अपने स्वाभाविक अस्तित्व को स्वीकार पाने का साहस नहीं दिखाता, उस समाज का जर्जर होकर टूटना स्वाभाविक है। सम्पूर्ण समाज इसी विडम्बना में तो जीता रहा, परिणामतः मध्ययुग व इससे आगे 19वीं सदी तक की पीढ़ियों को इसी दायरे में जीवन गुजारना पड़ा।

क्यों कहा जाता है वर्तमान को जागरण का युग

इन सब दृष्टियों से वर्तमान युग को चेतना के जागरण का युग कह सकते हैं, नई पीढ़ी अपने मां-पिता एवं अन्य पुरानी पीढ़ी से आगे बढ़कर नये विचारों, श्रेष्ठ बुद्धि एवं उच्च संकल्पों, दृष्टिकोण के साथ जन्म ले रही है। संताने विशेष ज्ञान व क्षमता से भरकर जन्म ले रही हैं, उसे कोई बताता नहीं, पर उसको जन्म के साथ आभास हो जाता है कि उसका पिता परम्पराओं-पूठियों में जकड़ा हुआ है, उसे जीवन के अस्तित्व का कोई ज्ञान नहीं है। यह युग चेतना के उच्च दिशा में रूपांतरण का युग है।

धर्मतंत्र में नव जागरण

आज के राजतंत्र, सामाजिक मान्यताओं से लेकर धर्मतंत्र में भी कुछ अंश ही सही पर नव जागरण होता दिख रहा है, गुरु-साधु, संतगण परम्परावादी मान्यताओं से मुक्त होकर सोचते और समाज को सकारात्मक चिंतन देकर परमात्म सत्ता के अस्तित्व को वैज्ञानिक विधि से प्रस्तुत करने का सदपुरुषार्थ करते दिख रहे हैं। धर्मक्षेत्र में होते योग, ध्यान, उपासना, मंत्र साधना, सेवा, गुरुभक्ति, सत्संग आदि आध्यात्मिक नवप्रयोग इसके उदाहरण हैं। इससे स्पष्ट है कि काल्पनिक संस्कारों से नहीं कर्मगत व्यवहारों के सहारे ही अब आने वाली नई पीढ़ी का नेतृत्व दे पाना सम्भव हो सकेगा। अतः ध्यान रहे परिवार-समाज के हर एक व्यक्ति और प्रकृति के कण-कण में महानता को स्वीकार करने का बोध प्रारम्भ हो चुका है, ऐसे में यदि इसे स्वीकार करने में किसी से जरा सी अवहेलना हुई, तो उसका अस्तित्वहीन हो जाना सुनिश्चित है।

डॉ. अर्चिका दीदी 

 

Tuesday, 13 December 2022

चिकित्सा जगत में प्रवेश करता ‘ध्यान’

 चिकित्सा जगत में प्रवेश करता ‘ध्यान’

 


यह युग विज्ञान का है

चिकित्सा विज्ञान ने दुनियां में भारी धूम मचाई, सम्पूर्ण उन्नीसवीं से लेकर सम्पूर्ण बीसवीं सदी तक एलोपैथी का बोलबाला था, रासायनिक औषधियों ने लोगों को चमत्कृत किया और लाभान्वित भी किया। पर मनुष्य की प्रकृति से उसका पूर्ण तालमेल न हो पाने के कारण एक सीमा के बाद लोगों में इस तथाकथित चिकित्सकीय चमत्कार को बर्दाश्त करने की सीमा समाप्त होने लगी, तो व्यक्ति अन्य तरीकों की ओर लौटे, इन्हीं में एक नई चिकित्सा परम्परा के रूप में ध्यान भी सामने आया।

अल्फा स्टेट ऑफ माइन्ड

ध्यान जीवन को आध्यात्मिक धारा से जोड़ने का महत्वपूर्ण पक्ष होने के साथ साथ जीवन को सहज और सरल बनाने की प्रक्रिया भी है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ध्यानस्थ साधक के मस्तिष्क में डेल्टा तरंगें निकलती हैं। ध्यान में लगा साधक जब ‘अल्फा स्टेट ऑफ माइन्ड’ में जीता है, तो प्रेम और शांति उसका स्वभाव बन जाता है। मस्तिष्क से निकलने वाली तरंगें अल्फा, बीटा, थीटा की आवृत्ति के आधार पर ‘ध्यान’ की गहनतम स्थिति बनाती हैं। इस अवस्था में आने के बाद व्यक्ति की आंतरिक क्षमता में रिपेरिंग प्रारम्भ हो जाती है, ऐसा विशेषज्ञों का मानाना है।

ई-ई-जी- (इलेक्ट्रोएसीफेलोग्राम) मशीन

मस्तिष्क से निकलने वाली तरंगों की माप ई-ई-जी- (इलेक्ट्रोएसीफेलोग्राम) मशीन द्वारा की जाती है। आधुनिक विज्ञान की ई-ई-जी- मशीन के द्वारा बीटा, अल्फा एवं डेल्टा तरंग अति आवृत्ति के आधार पर योगी का स्तर सत्यापन किया जा सकता है। शोधों के आधार पर स्पष्ट हुआ कि गहनतम ध्यान की स्थिति में योगियों से उत्सर्जित अल्फा एवं डेल्टा तरंगें जिनकी आवृत्ति अल्पतम होती है तथा प्रभाव तीव्र शामक होता है। शरीर से बीमार (रुग्ण) और मन से विक्षिप्त रोगियों में ‘बायोफीड’ प्रक्रिया द्वारा प्रविष्ट कराके उसके रोग का निदान और उपचार किया जा सकता है।

पारलौकिक लाभ के साथ शारीरिक बीमारियां भी दूर होती ध्यान से

आनंद, आह्लादपूर्ण जीवन ‘ध्यान’ का स्वभाव है। ‘ध्यान’ द्वारा इस अवस्था में पहुंचने पर पारलौकिक लाभ ही नहीं मिलता, बल्कि शारीरिक बीमारियां भी दूर होती हैं। इसीलिए आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिक अपनी चिकित्सा प्रयोगों में ‘ध्यान’ को भी चिकित्सा के अनुरूप जोड़ने पर जोर देने लगे हैं, चिकित्सा को लेकर हुए कई अनुसंधानों से इसके सकारात्मक प्रभाव प्रमाणित भी होते जा रहे हैं।

 

 

इसी में ‘ध्यान’ की अवस्था में शारीरिक व मानसिक क्रियाकलापों को अंतर्मुखी होकर देखना महत्वपूर्ण प्रयोग है। इससे धीरे-धीरे साधक का श्वास शांत और शिथिल होता जाता है। श्वांस के साथ मन और विचार भी शांत होते जाते हैं। इस प्रकार निर्विचार, संकल्प रहित होकर साधक स्वतः विचार शून्यता की ओर बढ़ता जाता है। इससे उसके चेतन से लेकर अचेतन मन तक की मलिनता अपने आप धुलती जाती है। मन निर्मल होता जाता है।

शून्यवत होते जाना

क्रमशः शरीर, श्वास, विचार और मन धीरे-धीरे शून्यवत होते जाते हैं। यह भाव लगातार बने रहने की स्थिति उसे समाधि में ले जाती है, जहां जीवन पूर्णतम अभिव्यक्ति पा रहा होता है। इसके बाद साधक एक तरफ परमात्म भाव में लीन होता अपने को अनुभव करता है, जीवन में परम रहस्य का उद्घाटन होता है। तो दूसरी ओर साधक शरीर और मन से जुडे़ रोगों से मुक्त होने की अवस्था में पहुंचने लगता है, उसका एम्यून सिस्टम प्रखर होता है तो रोग से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। 

‘ध्यान’ को करने के लिए

सर्व प्रथम सुखासन में बैठें। रीढ़ सीधा रखें। शरीर सहज रखें, शरीर के किसी भी अंग पर खिंचाव न अनुभव हो। शरीर का प्रत्येक अंग शिथिल रहे। इस अवस्था में आते ही शरीर के बाहरी और आंतरिक क्रिया कलापों में जागरुकता अनुभव होती है। इस प्रकार मस्तिष्क धीरे-धीरे संवेदनशील होता जाता है। जब चिड़ियों का संगीत, हवाओं की सरसराहट, हृदय की धड़कन, नाड़ी गति स्पन्दन, श्वास-प्रश्वास का संचलन, त्वचा पर अजीब सी अनुभूति होने लगे तो बस सावधान रहें, कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए। इस प्रकार ‘ध्यान’ की स्थिति में श्वास को सहज ढंग से आते-जाते अनुभव भर करें, अपने हर

प्रकार के विचारों पर भी किसी प्रकार की भावनात्मक व मानसिक प्रतिक्रिया न दें। इसी स्थिति में व्यक्ति का रूपान्तरण होता है, जीवन मानवीय चेतना को पार करते हुए संवेदनाओं से भर उठता है और साधक परमात्म तत्व के निकट अनुभव करता है, देवत्व उदय की यह अवस्था ही व्यक्ति का जीवन के दानवी दुर्गुणों से मुक्त करते हैं, जो रोग, तनाव, दबाव आदि विकारों के कारक हैं। तो आइये ‘ध्यान’ के ऐसे प्रयोग को जीवन व दिनचर्या का अंग बनाकर दिव्य गुणों को बढ़ायें और शारीरिक-मानसिक विकारों से मुक्ति का ईश्वरीय बरदान भी पायें। 

Thursday, 8 December 2022

शरीर, वाणी और आत्मा को दिव्य बनायें

 शरीर, वाणी और आत्मा को दिव्य बनायें



शतपथ ब्राहमण कहता है जो व्यक्ति दिव्यता का व्रत धारण करता है, वह देव तुल्य बन जाता हैय् अर्थात जो अपने गुण, कर्म और स्वभाव में श्रेष्ठता का सम्वर्धन एवं अवांछनीयताओं का निष्कासन करता है, वह दिव्य स्वरूप हो जाता है।

अंधकार से प्रकाश की ओर

वैसे भी यदि हम सूरज की ओर मुँह करके चलेंगे, तो प्रकाश से भर उठेंगे, इसके विपरीत चलने पर अंधकार के भागी बनना स्वाभाविक है। ऋषि कहते हैं व्यक्ति को अपने अंदर दिव्यता लाने के लिए हर प्रकार से सावधानी की जरूरत पड़ती है, आवश्यक है कि मन, शरीर, स्वभाव, विचार, वाणी, अन्न, धन से लेकर आत्मा आदि सभी के प्रति सावधान होकर जीवन जियें, सबको शुभ से जोड़कर चलने की आवश्यकता रहती है।

जीवात्मा का मंदिर है यह शरीर

                जीवात्मा का मंदिर है यह शरीर। कहा गया है ‘शरीर माध्यम खलुधर्म साधनम्’ भाव को पूरा करने के लिए मनुष्य को अपने शरीर को स्वस्थ-सामर्थ्यवान, विकसित, चुस्त-फुर्त, ताजगी पूर्ण विकसित शरीर बनाने की आवश्यकता है। क्योंकि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन, मस्तिष्क, आत्मा निवास कर सकती है। चूंकि शरीर आत्मा का उपकरण कहलाता है। अगर शरीर पूर्ण विकसित नहीं है, तो उस शरीर में प्रभावशाली आत्मा नहीं रह सकती। आत्मा को पोषण शरीर से मिलता है, अतः आत्मशक्ति प्रबल तब होगी, जब शरीर पुष्ट होगा। पुष्ट शरीर के लिए आहार-विहार, अच्छी नींद, व्यायाम, प्राणायाम, योगासन आदि अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। जबकि अविकसित शरीर में जीवन सदैव अधूरापन अनुभव करता है।

शरीर की दिव्यता उसके स्वस्थ होने में है

                वास्तव में शरीर की दिव्यता उसके स्वस्थ होने में है और उसी का शरीर स्वस्थ रहता है, जो नियमपूर्वक जीवन जीता है। ‘‘आलस्यं ही मनुष्याणां शरीरस्थो महानरिपुः’’ अर्थात आलस्य-प्रमाद मुक्त हो जो नियमित समय से उठकर, शुद्ध होकर, योगाभ्यास-प्राणायाम करता, प्रतिदिन प्रातः भ्रमण करता है, अपने आहार का पूरा ध्यान रखता है, पूरी नींद लेता है, ट्टतु अनुकूल संतुलित भोजन लेता है, वही स्वस्थ है। विशेषज्ञ कहते हैं सुपाच्य भोजन के लिए हरी सब्जियां, ताजे फल, दालें, प्रोटिंस, विटामिंस, कार्बोहाइड्रेट्स आदि तत्वों वाला संतुलित आहार आवश्यक है। समयानुसार, जितनी भूख लगी हो उससे थोड़ा-सा कम भोजन ग्रहण करें, शरीर को लाभ देने वाला भोजन ग्रहण करें। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार ‘‘युक्ताहारविहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु’’ वाला आहार, उचित व्यायाम, उचित प्राणायाम तथा उचित विश्राम और समुचित आहार ग्रहण करके स्वस्थ शरीर पाया जा सकता है।

मधुर वाणी का प्रयोग करना

इसी प्रकार शालीनता वाली वाणी का प्रयोग भी आवश्यक है। कहते हैं व्यक्ति के वचनों से उसके व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। पूज्यवर कहते हैं कि मधुर भाषी व्यक्ति की तीखी-मिर्च भी बिक जाती है, कटुवचन वाले व्यक्ति का शहद भी कोई नहीं खरीदता। इसलिए मधुर एवं शास्त्रोक्त वचनों के प्रयोग पर बल दिया जाता है।

मधुर, हितकारी, सत्यानुसंधित, सधी हुई, सोच-समझकर आवश्यकता अनुरूप वार्तालाप से वाणी में दिव्यता आती है। इसी के साथ मौन साधना करके, ईश्वर व गुरु वचनों के चिंतन करके, भजन, प्रार्थना, मंगल-कामना के साथ जीवन जीने से भी वाणी में दिव्यता सधती है।

आत्म तत्व को पवित्रता से जोड़कर रखना

इन सबसे भी अधिक महत्वपूर्ण है आत्म तत्व को पवित्रता से जोड़कर रखना। जीवन की गतिशीलता आत्मा से ही संभव हैं। आत्मा सबल होती है पवित्रता से, आत्मा को भी आहार चाहिए, आत्मा का आहार है भजन, प्रार्थना, जप-तप, ईश्वर व गुरु चिंतन, मनन, स्वाध्याय, दान, ध्यान, यज्ञ आदि। इनके नियमित अभ्यास से आत्म तत्व सबल व सशक्त होता है। आत्म विकास एवं आत्मोद्धार के लिए आत्मचिंतन, आत्मनिरीक्षण, आत्मावलोकन, आत्मानुशासन का नियमित अभ्यास आवश्यक है। नित्यप्रति प्रार्थना, जप-तप, यज्ञानुष्ठान में भागीदारी, गुरु और भगवान् के प्रति श्रद्धा-निष्ठावान रहना, सदैव आशा से भरपूर रहना, आत्मतत्व का दर्शन करते हुए शांति का प्रकाश अनुभव करना, प्रेम-करुणा और उल्लास की तरंगों का अहसास करते हुए सदैव चैतन्यता के आभास से आत्मा को सबल बनाया जा सकता है, ऐसा संतों-गुरुओं-शास्त्रें का मत है। ऐसा चिंतन-मनन करते रहने से आत्मा की दिव्य शक्तियां भीतर प्रकाशित होने लगती हैं और व्यक्ति आत्मबल का स्वामी बन जाता है।

धन को दिव्य बनाकर प्रयोग करना

                इन सबके बावजूद सतत सावधानी की भी आवश्यकता है। धन-संसाधन से लेकर शरीर-मन-आत्मा-वाणी, धन के साथ सद् व्यवहार किये बिना जीवन जी पाना असम्भव है। अतः अपने कमाये गये धन को दिव्य बनाकर प्रयोग करने से स्वयं के जीवन से लेकर परिवार-घर में सुख-शांति आती है। इसी के सहारे तन-मन स्वस्थ और आत्मा को बलवान रखा जा सकता है। हमारे ऋषियों ने धन को पवित्र और दिव्य बनाये रखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रयोग बताये हैं, जैसे अपने धन के कुछ अंश को स्वेच्छा से सेवाकार्यों के लिए दान करके, गुरु संकल्पित कार्यों जैसे गौ-गुरुकुल-वृद्धाश्रम, देवालय आदि की सेवा में लगाकर पवित्र बनाया जा सकता है। इसी प्रकार ऐसे आश्रम में धन को लगायें जिसमें

साधना, सत्संग चलता हो, दीन-दुःखियों, जरूरतमंद लोगों की सहायता की जाती हो। इस तरह धन का सदुपयोग करने से धन की भी वृद्धि होती है और परिवार में सुख-शांति-समृद्धि बनी रहती है। इसी के साथ अपने धन को फिजूल खर्ची से बचाकर उसे अच्छा सेवक, अच्छा मित्र बनाये रखें। इस प्रकार जीवन में उपयोग किया गया धन सदबुद्धि जगाता है और जीवन को सौभाग्य से भरता है।

                ये ऐसे सूत्र हैं जिनसे हम अपने शरीर, मन, आत्मा, वाणी, धन आदि को दिव्य बनाकर सुखी-संतोषपूर्ण जीवन जी सकते हैं।

Friday, 2 December 2022

पंच कोष में संतुलन  कैसे होगा ?

 पंच कोष में संतुलन  कैसे होगा ?



आसक्ति एवं अहं का भाव नहीं

पंच कोष में जागरण व संतुलन तभी सधता है जब साधक का कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, स्वर योग, क्रिया योग, प्रार्थना योग आदि के सहारे व्यक्तित्व संतुलन प्रारम्भ होता है। कर्म योग निस्वार्थ भाव से किया गया वह कर्म है, जिसमें कोई आसक्ति एवं अहं का भाव नहीं है। इसमें देवत्व के प्रति स्वयं को समर्पित कर कर्म के नियम अनुरुप श्रमदेव की उपासना की जाती है। कर्म में एक विशेष गुण शुद्धतम व निष्काम भाव का होना आवश्यक है, यही कर्म एक दिन जीवन में वैराग्य की भावना लाता है।

श्रवण, कीर्तन, सुमिरन, पादसेवन, अर्चना, वंदना, दास्य, साख्य और आत्म-निवेदन अर्थात् आत्मा-समर्पण

 

इसीप्रकार शरीर से आगे बढ़कर जब मनुष्य भावनाओं को वश में करता है तो भक्ति योग उदय होता है। यही भक्ति दैवीय प्रेम एवं समर्पण सिखाता है। भक्ति का देवत्व के प्रति समर्पण ‘परम प्रेम’ है। भक्ति की कुल नौ विधियां हैं-

श्रवण, कीर्तन, सुमिरन, पादसेवन, अर्चना, वंदना, दास्य, साख्य और आत्म-निवेदन अर्थात् आत्मा-समर्पण। इस प्रकार साधक भक्ति भाव अवस्था के सहारे ज्ञानयोग की धारा में प्रवेश करता है।

ज्ञान योग अपनी वास्तविक प्रकृति, अहं एवं ब्रह्मांड के विषय में निरंतर परीक्षण के माध्यम से यथार्थ को जानने की विधि है। ज्ञान गहराई में स्थित जीवन संबंधी सत्यों को उजागर करती है। जीवन के सच्चे अर्थ  को समझने का यह एक बेहतर प्रयोग है।

‘‘करिष्ये वचनम तव’’

क्रिया योग वह व्यवस्था है, जिसमें मंत्र, ध्यान द्वारा जीवनी शक्ति को शान्त करने और शरीर एवं मस्तिष्क पर नियंत्रण एकाग्रता की तकनीकें सन्नहित  हैं। शुद्ध ईश्वर के साथ जुड़ जाने की प्रयोग विधि है यह। भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के साथ भी इस प्रयोग को अपनाकर उसे ‘‘करिष्ये वचनम तव’’ के संकल्प  से जोड़ा था।

इसी मार्ग के सहारे भी होता है सारे कोष का जागरण

इसी परम्परा में स्वस्थ एवं समृद्ध जीवन के लिये स्वर योग आता है। मनुष्य में श्वांस चक्र प्रत्येक 60 मिनट से 120 मिनट में एक नथुने से दूसरे की ओर बदलता है। दायां स्वर सूर्य स्वर, बायां पिंगला नाड़ी अर्थात् चंद्र स्वर कहा जाता है और सुषुम्ना स्वर-सरस्वती वायु कही जाती है, जो कि दोनों नथुनों से एक साथ बहती है। इस मार्ग के सहारे भी कोष का जागरण किया जा सकता है।

  1. अन्नमय कोष

पर सबमें अनुभूति कराने वाली पांच इंद्रियों को मन द्वारा एकाग्रचित्त करने की परम्परा है। यही इन्द्रियों और मस्तिष्क का परस्पर योग है। ये सभी प्रयोग शरीर के पंचकोषों को जगाने में सहायक बनते हैं। इन कोषों में प्रथम है अन्नमय कोष। योगाभ्यास से अपने शरीर की मांसपेशियों को सुडौल बनाने के साथ सम्पूर्ण अणुओं में समाई ऊर्जा भी जगाई जा सकती है।

  1. प्राणमय कोष

दूसरा कोष प्राणमय है, जो कि प्राण या जीवनी शक्ति से मिलकर बना है। यह ऊर्जा शरीर है। योगासन और प्राणायाम करते समय साधक प्राणमयकोष को भी संतुलित कर रहा होता है।

  1. मनोमय कोष

मनोमय कोष का अर्थ सभी कोशिकाओं में विद्यमान मन से है। आहार शरीर की तरह मनः शरीर भी होता है। मनुष्य शरीर के बीच की अंतःक्रिया में योग से संतुलन लाते हैं। इससे शांत व्यक्तित्व जगता है।

  1. विज्ञानमय कोष

विज्ञानमयकोष हमारे अस्तित्व का सूक्ष्म स्तर है। यह कोष जगने पर मनुष्य आत्मा के विशाल अस्तित्व की दिशा में चल सकता है। इस अवस्था में जीवन में आनन्द स्थाई बनता है।

वास्तव में यही आनंदमय अवस्था बनी रहने पर व्यक्ति समय और स्थान से परे हो जाता है। योग द्वारा ‘परम मिलन’ यही तो है। आइये! हम सब योगाभ्यास द्वारा स्वयं को शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर ऊंचा उठायें। जीवन कोष की ऊर्जा से जुड़ें और स्वस्थ-सौभाग्यमय कहायें।

Tuesday, 29 November 2022

What is Devotion?

 


My God is with me and I am not alone

THIS universe was created millions and millions of years ago. Since then there has been a tremendous development in the knowledge of man and science. The man has progressed and enormous landmarks of progress have been established. New inventions have been made to achieve happiness, yet the man remains distressed. He calls for the unknown power and tries to establish relationship with it. He prays: “O Lord Supreme, All-Powerful, Omnipotent, on whose doors should we go, to whom should we pray and before whom should we cry and before whom should we beg.” Only Your door is before us and except for You we don’t belong to anyone else.” This human feeling is called the devotion.

The feeling of devotion is the experience of extreme virtue and purity. There is a strange feeling in the mind. A strange type of excitement is felt. New feelings grow from within, and a sense of satisfaction develops, purity emerges and a certain feeling comes up to assure that “my God is with me and I am not alone.”

Man’s life exists due to His kindness. 

Many of our revered sages have defined and explained the meaning of devotion. The great Shandilya Rishi was one of them. He said that the feeling of total love and total dedication to the God who is all-powerful, and all capable, and who is the lord of all, is called devotion. Such a love has no demarcation. Total belief in God is devotion. For us, human beings, life is very important. One who believes in God more than one’s life he has fully devoted to God. That is his true devotion to God. God is the essence of life, and only God gives strength to life. Man’s life exists due to His kindness.

Maharishi Narda has given an unbounded definition of devotion. He said:

 “Begin to accept love towards that sovereign who cannot be explained in words and to His subjects.”

The meaning of this devotion is two-fold – extreme love towards God and extreme love towards His children. Give love to them, be sympathetic towards them, be compassionate, and with full love, towards Him, and sing His praises. Remember Him, and worship His pious name. Devotion is a way of life. This is a way to conduct life. This is a process, which keeps on going on all the time.

Devotion is a beautiful ornament of man’s life

Devotion is a beautiful ornament of man’s life. This is a true decoration. Lord Krishna has sung praises of devotion in the Shri Bhagavad Gita. In the beginning and at the end of the eternal song of Holy Gita the flow of devotion can easily be observed. The feeling of unlimited belief in God is devotion. Lord Krishna says: “I take care of the sustenance of those pious saints myself who worship me with the feeling that all elements are indestructible and with full belief in me.” In reality, with devotion, the God can be easily found. The God accepts only the relationship of devotion.

Lord Krishna said to Arjuna: “The God is satisfied with devotion, not with qualities. He values the feelings. God knows every one, who does what and with what feelings.”

Feel happy and composed under all conditions

 When you tread the path of devotion, ask from God the blessings of His devotion. There is only one thing, i.e., ask for the gift of devotion. From the very day when the feeling of devotion gets ignited in your mind, the changes in your life will begin to take place from that very day.

The greatest satisfaction lies in the fact that the flame of devotion should not extinguish. As the nectar of devotion gets to clarify within you, the blessings of God will begin to grow. You will begin to experience the kindness of God. You will have a sense of satisfaction, and you will begin to feel happy and composed under all conditions.

The first sign of initiation to devotion

The first sign of initiation to devotion will be that man will appear to be self-contended and happy. If his face does not appear happy then it clearly means that a true urge of devotion has not germinated in him. It is true that love for God does not appear so long as there is love for self, importance for worldly comforts, mental affectations and attractions. Outwardly forsaking this is not the real abandoning because inside the mind there is still a little attraction left. This state is the desire-orientation.

With the presence of desire-orientation the orientation towards God does not take place. That is why in attaining true devotion it is necessary to get rid of the desires and feelings of acquisition. Those great people who have been blessed with the feeling of devotion deserve satisfaction as the wish of God if they get something or if something has been snatched from them.

Believe it, the devotion has truly arrived.

Address the God in all humility: “O God You only conduct this world. Whatever You do, and the way You like to it do, it is alright with us. What can be our expectations? We are all wedded to You. God, whatever You give us we will take, and live the way You wish us to live.” In fact, there is satisfaction when there is the true devotion. And when there is satisfaction, believe it, the devotion has truly arrived.

Place yourself at the pious feet of the God just the same way as a child cries impatiently. Get overwhelmed in the glory of God. In the same context Sant Kabir had said: “Cry, if you wish to get your great friend, then love crying.” Crying here means remembering God. Immerse yourself in His name. Let the tears roll from your eyes. Remember God with a deep sense.  Serve the poor and the distressed. Live in the world - don’t get entangled in it. Install God in your heart, not the world. This is true_devotion.

Fulfillment of wishes.

In the Kaliyuga there is special significance of devotion. It is the hidden treasure of man’s mind. It is not for exhibition. The hidden form of devotion is the best and of higher value. Anyone whosoever submits to God, gets the assurance of protection. The submission to Him is limitless. Complete submission results into fulfillment of wishes.

Highly perplexed Vibhishana comes only to Lord Rama for his own security. Lord Rama accepts him instantaneously. In the court of the Kauravas, as soon as Draupadi, totally disappointed with everyone present there, remembers Lord Krishna, the length of the saree becomes endless. When Sabri remembered Lord Rama and called him with great reverence, Lord Rama came to her and even ate the already-tasted fruits. The Saint Dhruva remembered Lord Narayana. He was indeed blessed with the divine Darshana. There are numerous examples of total submission and deep_devotion.

Devotion is a way to achieve salvation

There are very interesting, satisfactory and unlimited symptoms. Total belief, love and unflinching affection towards God; no attraction in anyone, anything and at anytime except for God; not to be conscious of anything except being immersed in the love for God; wherever the mind moves it sees nothing except God; and dedicate yourself to God by forgetting on

eself, are some of the symptoms. These are the indicators of a pure_devotion. One gets salvation through devotion and freedom from the worldly bonds and worries. Devotion is a way to achieve salvation.

To arouse the feelings of devotion in the mind, the role of a guru is significant. The guru is the personification of the knowledge of God. It is the Guru who, by kindling the light of divine knowledge, leads a man from the darkness of the world to light. This is why to be able to go to the feet of God it is necessary to seek and get the blessings of a guru.

The knowledge of these elements helps us to move towards the pious seat of the God. With this knowledge the world appears to be empty and hollow. The first step to get Him is to have faith and confidence in Him. It is necessary to have a continuous devotion towards Him. Through devotion alone one attains salvation.

 

Tuesday, 22 November 2022

दूसरों से तुलना का रोग !

 दूसरों से तुलना का रोग !



अपनी शुभ घड़ी को अशुभ न बनायें

आज का आदमी हर कुछ अपने अधीन कर लेना चाहता है, वह व्यक्ति हो अथवा वस्तुएं। यही कारण है कि हर क्षण दूसरों की ओर उसकी नजरें लगी रहती हैं। दूसरों के साथ तुलना वाली नजरें। दूसरों की वस्तुओं के साथ, दूसरों के फैशन-पहनावे, रहन-सहन के साथ, दूसरों के पद-प्रतिष्ठा  सहित अनेक प्रकार की गतिविधियों के साथ तुलना और खीझ में जिन्दगी गवायें दे रहा है। और तो और जब उसे तुलना के लिए कुछ नहीं मिलता, तो अपनी ही गाढ़ी कमाई से खरीदी गयी वस्तुओं की कमियां निकालने में व्यक्ति जुट जाता है। इसके चलते वह व्यक्ति इस मनोदशा में आ जाता है कि अपनी वस्तुएं, अपने उपलब्ध श्रेष्ठ संसाधन तक को देखकर वह हीनता से भर उठता है। यहीं से उसका जीवन दुख-हताशा, निराशा, खीझ का शिकार होने लगता है। यह चिढ़न-घुटन उसे

अपनों के साथ सही व्यवहार करने तक में रोड़ा बन जाती है। परिणामतः बात-बात में अपनों से उलझने, क्रोध, दुर्व्यहार, उपेक्षा, ताने आदि देने से वह नहीं चूकता और इस प्रकार अपने तुलना करने के रोग को लेकर पैदा हुई खीझ के चक्कर में अपने प्रियजनों तक को खोने लगता है। आज के समाज का यह दौर ऐसे दुर्भाग्यशालियों से भरता जा रहा है।

पूज्य सदगुरुदेव श्री सुधांशु जी महाराज कहते हैं

 ‘‘आज के युग में लोंगों के जीवन में बढ़ते तनाव, सच्ची खुशी के गायब होने, जीवन में रसहीनता आने, ईर्ष्या-द्वेष-कुढ़न आदि दुनिया भर के दुःख एवं संतापों की आग में तपते लोगों का कारण है उनके द्वारा दूसरों के साथ अपनी तुलना करना और अपने जीवन को यथार्थभाव से न देखना। साथ ही जीवन चलाने के लिए परमात्मा द्वारा प्राप्त समुचित संसाधनों के लिए उसके प्रति धन्यवादी भाव न रखना।’’ वास्तव में इन असंख्य दुःख-संतापों की आग में तपते लोगों को इस दुःखद मनोदशा से बाहर निकालने की अत्यंत आवश्यकता है, जिससे समाज को सुखी-संतोष-शांतिप्रियता से भरा जा सके। इसका एक ही रास्ता है लोगों के  अंतःकरण में श्रद्धा-भावना जगाना, उन्हें अपने जीवन के सद्गुणों पर और प्राप्त संसाधनों की पर्याप्तता की अनुभूति कराना। योग, ध्यान, प्रार्थना, उपासना, सेवा, भक्ति आदि से व्यक्ति को जोड़ना। जिससे अपनों के बीच रहते हुए तरह-तरह की काल्पनिक चोट से आदमी के रोते हुए दिल को सहारा मिले और समाज अनावश्यक काल्पनिक पीड़ाओं से बाहर आकर परमात्मा की गोद में बैठकर सुकून अनुभव करना शुरू कर सके।

दूसरों के साथ तुलना करने की स्वाभाविक वृत्ति

मनोविश्लेषक कहते हैं कि ‘व्यक्ति में दूसरों के साथ तुलना करने की स्वाभाविक वृत्ति है, पर अपने समय के सदुपयोग की शक्ति खो चुके लोगों के जीवन में तुलना की दृष्टि नकारात्मक धारा की ओर प्रवाहित होने लगती है, तब वह दूसरों की श्रेष्ठता को देखकर ईर्ष्यालु बन जाता है। दृष्टि के वस्तुओं-संसाधनों पर सिमटने से जीवन में तुलनात्मक कुढ़न पैदा होती है। ऐसी अवस्था में पहुंचे व्यक्ति की सोच में सकारात्मकता लाने की दिशा में लोकव्यवहार सम्बन्धी समुचित प्रशिक्षण की आवश्यक पड़ती है, जिससे उसमें अपने समय एवं प्राप्त साधन के एक-एक अंश के सकारात्मक प्रबंधन करने की आदत जन्म ले सके। यदि व्यक्ति की समझ में लाया जा सका कि उसका समय मूल्यवान संपदा है, उसका सदुपयोग करके सबकुछ पा सकते हैं, तो वह फिर तुलना करके हीनता व दूसरों के ओछेपन में आने से बचने लगेगा।’

समय को गवांते हैं या सदुपयोग करते हैं

गौर करें तो हर व्यक्ति के पास चौबीस घंटे का समय भगवान ने दे रखा है, अमीरी-गरीबी उसी समय के सदुपयोग, दुरुपयोग करने का नतीजा भर है। बस जागरूक होकर समझने की जरूरत है कि अपने दिनभर के समय का किस रूप में सदुपयोग करते हैं और अपनी मनोदशा को कैसे संतुलित रखते हैं। एक दिन में क्या-क्या करते हैं, एक-एक क्षण को किस प्रकार व्यतीत करते हैं, इसीप्रकार हर दिन की सुहावनी सुबह को हम किसके खाते में डालते हैं, अर्थात इसे आलस्य-प्रमाद में गवांते हैं अथवा परमात्मा के चरणों में सौंपकर उपासना, साधना, योग-ध्यान, प्रार्थना-सेवा, स्वाध्याय आदि करते हुए सही योजनापूर्ण कार्यों में लगाते हैं। यह समीक्षा हर किसी के लिए आवश्यक है।

प्रातः उठते ही योजना बनाना

इस दृष्टि से प्रातः से लेकर सायं तक के लिए व्यक्ति को प्रातः उठते ही योजना बना लेनी चाहिए। ध्यान रहे प्रातः बेला में ईश्वर उपासना, मंत्रजप, प्राणायाम, योग एवं आसन का अभ्यास करके दिन भर उत्साह उमंग से व्यक्ति भरा रहता है, यदि दिन ढलते वह थकावट सी महसूस करने लगे तो, इस थकावट आदि से कैसे निपटना है, इसका भी ख्याल अपनी दिनचर्या को बनाते समय स्पष्ट कर लेना चाहिए। कुछ लोग अपने खाली समय को मनोरंजन से जोड़ लेते हैं, लेकिन महापुरुष स्तर के व्यक्तित्व हाथ में प्राप्त हुए कार्यों में परिवर्तन करके, योग निद्रा आदि से अपने मन को उत्साहित बनाने पर जोर देते हैं।

ऊर्जाहीन कर देती है उथली, टूटी हुई नींद

इसी प्रकार रात्रि शयन के लिए होती ही है, लेकिन नींद गहरी आये, इसकी भी कार्य योजना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि उथली, टूटी हुई नींद व्यक्ति को ऊर्जाहीन कर देती है, इसलिए सोने से पूर्व मन और मस्तिष्क को शांत-प्रसन्न, सद्विचारों से भरने का प्रयास करने से गाढ़ी नींद आयेगी और अगली सुबह पुनः ताजगी के साथ उठ सकेंगे।

दूसरे से तुलना का अवसर ही नहीं मिलगा

इस तरह जो व्यक्ति अपने सम्पूर्ण रात-दिन का सही निर्धारण करके जीवन जीने का अभ्यास करता है, उसे किसी दूसरे से तुलना का अवसर ही नहीं मिलता। इस प्रकार क्षण-क्षण के सदुपयोग से मस्तिष्क प्रखर-शांत बनता व पूरी जिंदगी सुखद होती चली जाती है और फिर न किसी दूसरे के साथ तुलना का समय बचता है, न जीवन में कुढ़न-खीझ पैदा होगी। तो क्यों न तुलना मुक्त जीवन के ये सभी प्रयोग अपनायें, जीवन को सुख-शांति-संतोष, कर्तव्यशीलता से भरें।