सर्वदात्री हमारी
गौ माता (गोपाष्टमी विशेष)
गाय में प्रेम और
त्याग ये सभी तत्व सूक्ष्म रूप में सहज समाये हैं। इसीलिए कहते हैं स्नेह, वात्सल्य, आदर, सम्मान आरोग्य,
धन-सम्पत्ति आदि न माँगने से मिलता है, न खरीदने से खरीदा जाता है। यह गुरु, गंगा, गीता, गायत्री और गाय के सान्निध्य
में रहकर स्वतः विकसित होता रहता है।
गुरु, गंगा, गीता, गायत्री और गाय भारत देश
की सांस्कृतिक पहचान हैं। जैसे सारे संसार में गंगा एक ही है, ऐसे ही संसार में गीता भी एक ही है। गुरु में
भी वही तत्व है। वस्तुतः गुरु जीवन चैतन्यता की एक अवस्था है, उस अवस्था पर पहुँच कर व्यक्तित्व करुणाकर बनकर
अपनी अलग पहचान स्थापित करता है। उस अवस्था में पहुंचे व्यक्ति के मुख से निकले
आशीर्वाद-वरदान फलित होते हैं। गुरु संकल्प से शिष्यों के दुख-कष्ठ मिटते हैं।
गुरु के आभा मण्डल में बैठकर की गयी साधना सिद्धि के
द्वार खोलती है।
पर साधक को इस स्तर की गुरु कृपा व भगवान की शक्ति पाने के लिए गाय व गंगा की
सेवा-साधना गहराई से करनी चाहिए। क्योंकि इसका विशेष विज्ञान है।
विद्वान कहते हैं-
गंगा और गाय की सेवा
साधना से अंतः
में भक्ति जन्म लेती है। अंतः की भक्ति से जीवन
में त्याग-परोपकार, पवित्रता,
निश्छलता, करुणा व प्रेम, प्रायश्चित जन्म लेता है। गुरु, गंगा, गाय व गायत्री इसे मजबूती देती है। जीवन को यज्ञीय
बनाती है। अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः। वास्तव में यज्ञ की भावना, त्याग की भावना ही संसार का केन्द्र बिन्दु है।
वास्तव में यज्ञीय जीवन में सम्पूर्ण रूप से गाय, गंगा, गीता, गुरु, गायत्री का अंश समाहित होता है। यह यज्ञपुरुष ही राष्ट्र का निर्माता है,
भाग्य का विधाता है एवं विश्व का प्रकाशक है।
हर शिष्य में यह दिव्य भाव जगे, गुरुदेव इसी
तमन्ना से उसे इन साधनाओं से गुजारते हैं। फिर परमात्मा की कृपा बरसती है। संसार
इसी पर टिका हुआ है। कहते भी हैंµ
गीता गंगा च गायत्री गोविन्देति।
हृदयस्थिति पुनर्जन्म न विद्यते।
अर्थात् अगर
व्यक्ति में अपना कल्याण करने की कामना है तो गीता, गंगा, गायत्री और
गोविन्द इन चार तत्वों को अवश्य धारण करें।
पूज्य महाराजश्री
की प्रेरणा रहती है कि हर भक्त देशी गाय की सेवा से जुड़े, जिससे उसके कठोर प्रारब्ध कटें। साधक आरोग्य रक्षा के लिए स्वयं परिवार के सदस्य रूप में
गायों का पालन करे, उनको अपने घरों
में रखें। यदि कारणवश गाय घर पर पालना सम्भव नहीं है, तो आनन्दधाम आश्रम परिसर में अपने नाम की गाय देकर व आश्रम
की गाय की सेवा करके लाभ पा सकते हैं। आश्रम परिसर में गायों की रक्षा के उद्देश्य
से ही गौशाला बनायी गयी है। साधक स्वजन यहां गौ सेवा के निमित्त सहयोग देकर गौ
सेवा का पुण्य लाभ प्राप्त करते रहते हैं। गाय तो हमारी सर्वदात्री माँ जो है।

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