एक किसान की लड़की
थी। जो प्रकृति से शान्त एवं गृहकार्य में दक्ष थी और सबको बहुत प्रिय थी। बड़ी हुई
तो पिता ने कहा-‘बेटी! तेरे लिए
वर की तलाश में हूँ।’ बेटी ने कहा,‘बापू! मैं शादी नहीं करुंगी, क्योंकि इच्छा नहीं है। पिता ने कहा-‘खैर, जैसा तू चाहेगी वैसा ही होगा’। समय बीता,
लड़की कुछ उदास रहने लगी। पिता को चिंता हुई। एक
दिन पिता ने पूछा बेटी ‘तू उदास क्यों
रहती है? स्वास्थ्य ठीक नहीं है
क्या?’ बेटी ने कहा-‘स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है। उदास जरूर हूँ,
पर क्यों हूँ इसका पता नहीं।’ उस किसान के घर के अहाते में एक वृक्ष था,
हरा-भरा सुहावना। एक दिन लड़की की आँखें उस पर
टिकीं। तो अचानक उदासी मिट गयी और वह वृक्ष उसके लिए आंतरिक अवलम्बन बन गया।
परमसत्ता की तरफ ले जाने का द्वार बन गया और लड़की के ध्यान के बीजों में अंकुर फूट
पड़े। वह प्रसन्न रहने लगी। अब उस लड़की का यह दैनिक कार्यक्रम बन गया कि काम से
अवकाश मिलने पर उस वृक्ष पर ध्यान लगाना और घंटों का समय गुजर जाना। एक दिन पिता
ने पूछा,‘बेटी! रोजाना वृक्ष के
सामने आँखें मूंदे क्यों बैठती हो? क्या करती हो?’
बेटी बोली, ‘बैठती अवश्य हूँ। क्यों बैठती हूँ? कुछ पता नहीं। बस बैठती हूँ, करती कुछ नहीं, सब स्वतः होता जा रहा है।’ पिता मुस्कुराया।
क्रमशः साधना आगे बढ़ी। विचित्र अनुभव हुए, कुण्डलिनी जगी, देहाध्यास छूटा,
समाधि लगी और एक दिन उसमें बुद्धत्व का दीया जल
उठा और वह वृक्ष ही उसका गुरु बन गया।
वह बाला गहरी
प्रगाढ़ता अनुभव करने लगी। आस-पास भीड़ लग गयी, उसे देखने के लिए लोगों में सुगबुगाहट शुरू हुई कि इसने तो
घर नहीं छोड़ा, संन्यास नहीं
लिया, क्रियाकांड में नहीं जुटी,
शास्त्रें में आँख नहीं गड़ाई, फिर भी बुद्ध कैसे बन गयी। तभी उस वृक्ष से
संदेशगूंजा कि इस बालिका में यह सब निश्छलता, निर्मलता, प्रगाढ़ तद्रूपता
भरे ध्यान से ही सब घटित हो गया। आई थी निराशा को दूर करने, पर जुड़ बैठी गहन ध्यान से।
पूज्य सद्गुरुदेव
जी कहते हैं ‘‘ध्यान गहराई में
उतरने पर वह समस्याओं को अपने में समाहित करता है, तब जीवन में निराशा, तनाव एवं दुख के काले बादल साधक के जीवन से हटने लगते हैं।
साधक दुःख के पार पहुँच जाता है, सुख के द्वार
खुलते हैं। जीवन पूर्णतया शांत बनाता है। बस इस तक पहुंचने के लिए अंदर की चाहत को
टटोलना पड़ता है।’’ गुरुतत्व तो सहज
जग पड़ेगा।

No comments:
Post a Comment