ध्यान मुद्राओं का महत्व
स्वास्थ्य की
दृष्टि से ध्यान एक ऐसी तकनीक है, जिसका हर
व्यत्तिफ़ आनन्द ले सकता है। इसके लिए ध्यान लगाने के लिए व्यत्तिफ़ को बस इतना
करना है कि वह आरामदायक स्थिति में बैठे, स्थिर रहे, धीरे-धीरे सांस
ले और आराम से मन को ध्यान केंद्रित होने की अनुमति दे। इस स्थिति में बैठने के
लिए हमें ध्यान प्रक्रिया के सभी पक्षों को समझने की आवश्यकता है। जिसमें आसन व
मुद्रायें प्रमुख हैं। इससे ध्यान का समुचित लाभ प्राप्त होता है, वे हैं-
पद्मासन व कमल
मुद्रा-
यह रीढ़ की हड्डी की तंत्रिकाओं को मजबूत बनाता
है और उनके कार्यों का संचालन करता है। रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में भी
रत्तफ़ की आपूर्ति अच्छी करता है। यह आंतरिक भागों को सुडौल बनाने में सहायक है और
मन में शांत और ताजगी लाता है। यह पाचन प्रक्रिया को उत्तेजित करता है। पद्मासन से
जब शरीर स्थिर रहता है तो मस्तिष्क भी शांत होता है। इसके लिए टाँगों को बाहर की
ओर बढ़ा कर बैठें। अपनी दायीं टाँग को घुटनों के पास से मोड़ें और पैर को बायीं जांघ
पर ले आएं। इसी प्रकार बायीं टांग को मोड़ें और बायी एड़ी को जितना हो सके दायीं
जांघ के पास लाने की कोशिश करें ताकि दोनों एड़ियां नाभि को छू पाएं। सिर गर्दन और
रीढ़ एक सीधी रेखा में होने चाहिये। घुटने जमीन को छूने चाहिए। अपने हाथों को ज्ञान
मुद्रा में अपने घुटनों पर रखें।
सुखासन व सहज
मुद्रा-
यह मस्तिष्क को शांत करता है, मानसिक और शारीरिक संतुलन प्रदान करता है।
घुटनों और जोड़ों में लचक लाता है। कमर को मजबूती देता है। इस मुद्रा के लिए जमीन
पर अपनी दोनों टाँग सामने की ओर फैला कर बैठ जायें। एक टाँग को मोड़ें और इसके पैर
को दूसरी टाँग की जांघ के नीचे रखें। दूसरी टाँग को मोड़ें और इसे दूसरी टाँग के
नीचे रख दें। बिना तनाव के गर्दन, सिर और कमर को
सीधा रखें। आँख बंद कर लें। अपने हाथों को ज्ञान मुद्रा में अपने घुटनों पर रखें।
सिद्धासन व सिद्ध
मुद्रा-
यह स्थित रत्तफ़ प्रवाह को उत्तेजित करती है,
जो संयम बढ़ाने में सहायक है। यह यौन विकार,
हृदय सम्बन्धित कार्य और रत्तफ़ चाप को बेेहतर
बनाने में भी मदद करता है। यह बवासीर और बवासीर जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित
लोगों के लिए फायदेमंद है। इसके लिए फर्श पर अपनी टाँगें अपने सामने की ओर फैला कर
बैठें। अपने हाथों को साइड में रखें। बायें घुटने को मोड़ें और अपनी बायीं एड़ी को
श्रोणि तक ले जायें। अपने दायें घुटने को मोड़ें और अपनी दायीं एड़ी को खिसका कर
अपने दायें टखने के सामने की ओर ले जायें। दायां पैर उठायें, दायें टखने को बायें टखने के बिल्कुल ऊपर रखें
और अपनी एड़ी को अपने जननांग तक ले कर आयें। अपने दायें पैर की उंगलियां को जांघ और
पिंडली के बीच में दबाएं। अपनी बाहों को आराम देते हुए अपने हाथों की हथेलियां
नीचे की ओर करके समान दिशा के घुटनों पर रखें। गर्दन और सिर को सीधा रखे सामने की
ओर देखें।
वज्रासन व
वज्रपात मुद्रा-
यह पाचन क्षमता को बेहतर बनाती है। आमतौर पर
इसे भोजन के बाद किया जा सकता है। यह गैस की समस्या को समाप्त करता है। यह घुटनों,
टाँगों, पैरों और जांघों के दर्द को कम करता है। यह ग्रंथियों के
ड्डाव में वृद्धि करता है। यह प्लीघ, गलतुण्डिका, मज्जा और शरीर के
अन्य भागों में बनने वाली श्वेत रत्तफ़ कणिकाओं को बढ़ाता है। यह श्रोणि की
मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। यह बवासीर और अंत्र वृद्धि रोग के लिए अच्छा है।
इसके लिए दोनों टाँगों को सामने की ओर फैलाकर आराम से बैठें। बायीं टाँग को घुटने
के पास से मोड़ें और दायें पैर को दायें कूल्हें के नीचे रखें। इसी प्रकार बायीं
टाँग को मोड़ें और बायें पैर को बायें कूल्हें के नीचे रखें। पैरों को ऐसे समायोजित
करने का प्रयास करें कि पैरों की उंगलियां आपस में छुएं और एड़ियां अलग रहें। दोनों
घुटनों को साथ लायें और दोनों कूल्हों को दोनों एड़ियों के बीच टिकाएं। हथेलियां
नीचे की ओर करके दोनों हाथ घुटनों पर रखें और आँखें बंद करें। रीढ़ और गर्दन को
बिल्कुल सीधा रखें। सामान्य रूप से साँस लें और अपना ध्यान नासिका छिद्रों के अंदर
आने और बाहर जाने वाली हवा पर केन्द्रित करें।
वास्तव में हर व्यक्ति को ऐसे प्रयोगों से
जुड़कर अपने को स्वस्थ रखने का अभ्यास करना चाहिए।

No comments:
Post a Comment