Friday, 28 April 2023

Adopt the Virtues of Goddess Sita-Sita Navami Special

 Adopt the Virtues of Goddess Sita -

Sita Navami Special



Each year the appearance day of Goddess Sita, the divine consort of Lord Rama, is celebrated as Sita Navami or Sita Jayanti across the country. In Bihar’s Sitamarhi District the festival is celebrated with full zeal because of the Devi’s association with the place. The Ramayana states that Goddess Sita is the daughter of Mother Earth (Bhoomi Maa) and the legend behind her appearance is truly Divine. Sita is depicted as an ideal married woman.

On this day, Hindu women fast and offer prayers to the Goddess for their husbands’ longevity and well-being just as Devi Sita used to do for Lord Rama.

Goddess Sita - An Epitome of Perfection

When we try to understand the life of Goddess Sita, we learn about the various virtues she always adhered to throughout her life in all situations. Let’s take a look at them.

The Virtue of Sacrifice - Despite being a princess, Sita sacrificed her luxurious royal life to follow the dharma (duty) of a Jeevan Sangini (life partner). She listened to her inner voice. With full conscience, she chose to accompany her husband Rama on the 14-year long exile.

The Virtue of Humility - During her stay in the jungle, Mata Sita followed all the austerities her husband Rama was practicing, without any complaints. She accepted everything that came her way as a path chosen for them by The Divine.

The Virtue of Balance - Goddess Sita was a devoted wife who remained composed in adverse situations thus, always exhibited her balanced nature. Even being in the captivity of Ravana, she maintained her dignity despite all kinds of enticements and tortures by Ravana. She was a woman of character who courageously underwent all sufferings but sternly refused to bow down before Ravana.

What to Learn from Sita’s Life

The character of Sita gives us a glimpse of virtues like courage, loyalty, purity, dedication, sacrifice and of course devotion. She is the perfect example of an empowered woman.

Sita Navami - A Celebration of Woman Power

Sita Navami is not just an auspicious occasion marking the appearance day of the Goddess but in fact it is a celebration of Nari shakti (woman power) and of a married woman’s intense commitment towards all her relationships.

Wishing everyone a glorious Sita Navami. May the life of Goddess Sita inspire us to imbibe her extraordinary virtues.

Thursday, 27 April 2023

अनैतिक रूप से अर्जित धन का परिणाम

 अनीतिपूर्वक कमाया गया धन मनुष्य का पतन  कैसे कर देता है ?



अनीतिपूर्वक कमाया हुआ धन मन को अशांत और बेचैन रखता है, घर परिवार में अनीति से कमाया धन गलत संस्कार लेकर आता है, ऐसे परिवार के लोग अनीति का रास्ता पकड़ने से नहीं बचते और बुरे कार्यों में फंसकर अपने को बरबाद कर लेते हैं। अनीतिपूर्वक कमाया गया धन मनुष्य का नैतिक पतन कर देता है।

धर्ममार्ग से कमायें और धर्मकार्य में दान करें।

इसीलिए हमारे वेद, उपनिषद, आर्षग्रंथ एवं संत आदि मनुष्य को धर्मानुसार आचरण करते हुए पूर्ण सदपुरुषार्थ के साथ अधिक से अधिक धन कमाने की प्रेरणा देते हैं।

ऋग्वेद भी ‘‘अग्निना रयिमश्नवत पोषमेव दिवेदिवे। यशसं वीरवत्तमम्।।’’

सूत्र के माध्यम से हमें यही संदेश तो देता है कि हम ईश्वर के बनाए नियमों से ही धन कमाएं, अनुचित रीति से कमाया धन हम से दूर रहे अर्थात् धर्ममार्ग से कमायें और धर्मकार्य में दान करें। कहते हैं धन के लिए अनीति का मार्ग अपनाने वाले व्यक्ति को धनवान होने का आभास मात्र होता है, इसके बदले उसे अपना सम्पूर्ण गवाना पड़ता है।

बेइमानी वाले तरीके से हमारी आत्मा पतित होती है

अनीति मार्गी सबसे पहले अपने भाव व मन को विकृत करके उसमें लोभ को स्थापित करता है, तत्पश्चात संबंध टूटते हैं, इसके बाद अपने स्वास्थ्य का नाश कर बैठता है। फिर परिवार व बच्चों की उपेक्षा प्रारम्भ हो जाती है, इस प्रकार जिसने एक बार गलत मार्ग पकड़ लिया, उसे किसी को धोखा देना, चोरी, घूसखोरी, करचोरी, बहुविधि भ्रष्टाचार आदि पर चलना सहज हो जाता है। बेइमानी वाले तरीके से हमारी आत्मा पतित होती है। अंततः मनुष्य लोभ-लालच में पड़कर सर्वत्र निंदनीय बनता है।

पैसा कमाये लेकिन येन केन प्रकारेण से नहीं

यह सच है कि जीवन संचालन से जुड़े प्रत्येक कार्य के लिए धन आवश्यक है। छोटा काम हो या बड़ा, धर्म हो या राजनीति, साधना हो या अनुष्ठान सभी के लिए पैसा की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए हमारे वेदों में धन संग्रह को एक आवश्यक कर्तव्य बताया गया है, पर येन केन प्रकारेण नहीं, अपितु नीति के मार्ग पर चलते हुए सद्पुरुषार्थ के साथ + कमाने की साधना पर जोर दिया गया है। अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को स्वीकार करने पर हमारे आर्षग्रंथों ने जोर दिया है। नीति एवं पवित्रता का मार्ग अपनाने से ऐश्वर्य और श्रीवृद्धि का वरदान मिलता है। ज्ञान, अनुभवजन्य कुशलता और दक्षता जैसे आवश्यक गुण सहज विकसित होते हैं, जो समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

 

बहुत बड़ा विकार है धन से अतृप्त रहना

वास्तव में धन से अतृप्त रहना बहुत बड़ा विकार है। क्योंकि यह मनुष्य को अमानवीय कर्म करने के लिए विवश कर देता है और इस प्रकार वह एक न एक दिन अपना सम्पूर्ण हानि कर बैठता है। इस प्रकार धन, धर्म और सुख तीनों से वंचित हो जाता है। इसके विपरीत जब घर में धन पवित्र होकर आता है, तो वह सुख, शांति व संतोष प्रदान करता है। ऐसा धन जहां भी उपयोग होता है, व्यक्ति आनंदित होता है। दान से लोककल्याण के कार्य सधते हैं, लोगों में सात्विकता का विकास होता है तथा उपयोग करने वाला सत्याचरण में प्रेरित होता है। अतः नीति की कमाई करें, जिससे जीवन सर्वविध कल्याणकारी साबित हो।

Tuesday, 25 April 2023

गौ सेवा से खुलता है यश-कीर्ति-सौभाग्य का  द्वार

 गौ सेवा से खुलता है यश-कीर्ति-सौभाग्य का  द्वार



शास्त्रों में गौ माता की साक्षात यज्ञरूप मान्यता है। भगवान श्रीकृष्ण से लेकर अनेक भारतीय ऋषि गौ सेवा को यज्ञ समान पुण्य प्राप्त होने का संदेश दिया है।

गौ में मां जैसी ममता, करुणा और वात्सल्य है, वह मानव मात्र का हित करने वाली है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने गौ सेवा, गौ माता की पूजा, रक्षा को दिनचर्या का अंग बनाया था। कहते हैं देशी गायों की सेवा के निमित्त किया गया एक ग्रास का दान भी सुख-समृद्धि-सौभाग्य जगाता है। महाभारत में गौ सेवा की महिमा को लेकर वर्णन है कि जो व्यक्ति स्त्री-पुरुष सहित सम्पूर्ण कुटुम्ब गौ माता की सेवा करता है, उनकी पवित्र सान्निध्य का उपयोग करता है, गौ माता को सन्तुष्ट रखता है, उसे गौ माता अत्यन्त दुर्लभ आशीर्वाद प्रदान करती है, सौभाग्य जगते हैं।

                गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः।

                तस्मै तुष्टाः प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान्।।

                द्रुहोत्र मनसा वापि गोषु नित्यं सुखप्रदः।

                दान्तः प्रीतमना नित्यं गवां व्युषि्ंट तथाश्नुते।

वैज्ञानिक अनुसंधानों से ज्ञात होता है कि आज गाय से दूर होकर मानवता दुख-अशांति, उपेक्षा, उपहास का शिकार हो रही है। विद्वानों ने इससे निजात के लिए भारतीय नस्ल की गायों को महत्वपूर्ण बताया। ग्लोबल वार्मिंग जैसे भयानक संकट को भी टालने और सम्पूर्ण जीवन संरक्षण के लिए गौ संरक्षण जरूरी कहा है।

गाय का सम्बंध हमारे जन्म, जीवन और मरण सभी से है

गुरु सेवा के बाद गौ सेवा को ही यश कीर्ति देने वाला माना गया है। पूज्यवर मानते हैं कि ‘‘गाय का सम्बंध हमारे जन्म, जीवन और मरण सभी से है। स्वास्थ्य और समृद्धि का आधार है गौ माता। गौ संरक्षण से ही यह देश समृद्ध था, सुसंस्कृत था, दैवीय एवं भौतिक समृद्धि से भरा था। अतः आज पुनः देशवासियों को अपनी ऋषि प्रणीत परम्पराओं, गौ संरक्षण संवर्धन की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है। क्योंकि गौ को सुरक्षित, पोषित करके ही हम लोक जनमानस को सुरक्षित, पोषित एवं पुष्ट कर सकते हैं।’’

सात विशाल गौशालायें पूज्य महाराजश्री द्वारा स्थापित

गौसेवा करके भक्तों के जीवन को यश कीर्ति सौभाग्यशाली बनाने जैसी प्राचीन काल से चली आई मान्यता एवं देशी गाय की सेवा-संरक्षण से जुडे़ वैज्ञानिक शोध परिणामों को देखते हुए आनन्दधाम आश्रम, नई दिल्ली सहित देश के विविध मिशन आश्रमों में छः अन्य विशाल गौशालायें पूज्य महाराजश्री ने स्थापित कराईं। जिसमें पानीपत, लालसोट, बैंगलोर, कानपुर, मुरादाबाद और हैदराबाद की गौशालाएं प्रमुख हैं। आनन्दधाम की गौशाला के ऊर्जावान क्षेत्र के बीच आश्रम पधारे साधक श्रद्धा भाव से बैठकर पवित्र ऊर्जा तरंगे अनुभव करतेे हैं। गुरुभक्त कामधेनु गौशाला में गीर जैसी दिव्य प्रजातियों की गायों की सेवा करते हैं, कई साधक अपने जन्मदिन पर न्यूनतम एक गौ माता के लिए चारा दान करते हैं, कई कई साधक एक गाय की वर्ष भर की जिम्मेदारी लेकर अपना एवं अपने परिवार का पुण्य-सौभाग्य बढ़ाते हैं। गौसेवा का पुण्यलाभ प्राप्त करते हैं। आनन्दधाम की कामधेनु गौशाला में स्वयं पूज्यवर भी नित्य गौसेवा अपने हाथों से करते हैं।

लोक परम्पराओं में है सुरक्षित गौ भविष्य

इसी के साथ गुरुदेव ने देशभर में फैले अपने करोड़ों भक्तों में प्रेरणा जगाई कि वे गौ सेवा अभियान में भागीदार बनें। गौसेवा अभियान के तहत घर-घर गौ ग्रास निकाला जाये, जिससे लोक परम्परायें सुरक्षित हो सकें। गायों को बचाने के लिए पर्व त्योहारों-मांगलिक अवसरों पर गोबर से बने दीपकों का प्रयोग हो। ऋषि परम्परा से गौर आधारित कृषि कार्य हों, औषधीय जड़ी-बूटियों को मिलाकर गौकाष्ट के निर्माण किये जायं, औषधीय जड़ी-बुटियों से युक्त गौ उत्पाद के दीपक बने, लोगों द्वारा गौदुग्ध से लेकर सम्पूर्ण गौ उत्पादों के प्रयोग पर बल दिया जाये। इससे गौ सेवा, गौ संरक्षण, गौपोषण का युग लौटेगा, जिसकी बड़ी आवश्यकता है।

गौशालाओं की गऊओं को गोद लेना

जो भक्त अपने घरों में गौ नहीं पाल सकते, गौशालाओं की गऊओं को गोद लेकर, उनके भरण पोषण की जिम्मेदारी निभाकर गौपालन का पुण्यफल प्राप्त कर सकते हैं। गुरुदेव द्वारा प्रदान किये जा रहे इस गौ सेवा के अवसर को भक्त अपना सौभाग्य माने, गौमाता, गुरु, परमात्मा के साथ साथ अपने पितरों के आशीर्वाद का सुयोग पायें। वातावरण को दिव्य ऊर्जा से भरें।

Friday, 21 April 2023

Earth Day Special - Sustainable Living for a Sustainable Environment

 Earth Day Special - Sustainable Living for a Sustainable Environment

 


An article published in January 2023 reported per decade increase of 0.08° C in earth’s temperature since 1880 which rose to 0.18° C per decade since 1981. Another data published by the Intergovernmental Panel on Climate Change has estimated that this will rise up to 1.5°C between the period of 2030 and 2035. These facts are alarming.

 

There have been many factors that have led to the degradation of our planet. Unrestrained human activities have immensely damaged the environment at a whooping rate. Water, soil & air pollution, deforestation, overpopulation; these are some of the major factors responsible for the massive climate change.

 

Considering the imminent threat of global warming, environmental organisations throughout the world have suggested many ways to fight this menace. From promoting general awareness towards environmental protection to making people sensitive enough to live in a responsible manner, they are leaving no stone unturned to meet the goal of saving the earth.

 

Earth Day is a part of these initiatives that started in the year 1970. Since then, it is being celebrated each year on April 22 across the world. The objective of the event is to make people aware and sensitive towards the conservation and preservation of our planet.

 

We can contribute in this mission by adopting these simple sustainable habits and also encouraging others to do so. 

 

1.     Planting More Trees - Deforestation is a major challenge. Planting more and more trees is one of the most important steps towards environmental protection when nearly 15 billion trees are cut down every year.

2.     Use Renewable Energy - Instead of using traditional form of energy, opt for wind or solar energy. This will not only be a safer and wiser option but will also reduce your electricity bills.

3.     Wise Use of Resources - We should be mindful of using water, soil, electricity or any other natural and man-made resources to stop their wastage.

4.     Switch to Fuel-Efficient Vehicles – Fully electric or hybrid vehicles are the answers to continuously growing air pollution. Apart from saving money, it will also lessen our dependency on fuel.

5.     Go for Energy-Efficient Appliances - Buying energy star rating electrical appliances is another smart way to minimise greenhouse gas emission.

6.     Turn vegetarian - A 2021 study reported that global meat industry was responsible for emitting about 60% of greenhouse gases from food production. In such scenario, it is better to go vegetarian to help the planet survive global warming.

Thursday, 20 April 2023

Empathy towards Others



We live in a materialistic world where everyone is busy in his own life. With the passage of time, we all have progressed but somewhere this growth has made us self-centered. Our lives are limited to achieving the targets of professional and personal goals. We are engrossed so much in this rat race that we have detached ourselves from other important things of life. Our self-centered mindset hardly allows us to care about what is happening around us. The kind of problems or pains a person is going through does not bother us.

What We Learn from the holy Bhagavad Gita?

The holy Gita teaches us to be sensitive towards others’ emotions. Verse 6.32 says:

"ātmaupamyena sarvatra samaṁ paśhyati yo ’rjuna
sukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ sa yogī paramo mataḥ"

Meaning: A person who sees the true equality of all living beings and considers their joys and sorrows as his own is actually an exceptional yogi.

Empathy is the Answer

A person having the capability of feeling the pains and griefs of others is a person of strength. It could be difficult but not impossible to condition the mind to be empathetic towards others. When you understand the futility of materialistic things, your attention naturally diverts towards finding the purpose of your life in this world. There are many great personalities who are the finest examples of empathy. Oskar Schindler is one such example. A well-off German industrialist of his time, who despite being the member of Hitler’s Nazi party, risked everything, including his life, in a bid to save Jews. It was his empathy towards them that could save more than 1,000 jews from deportation to Auschwitz during World War II.

What Does Empathy Do to a Person?

Humanity always survives on empathy. When you develop empathy, you start feeling people’s emotional and mental situations and thus, help them accordingly. Being sensitive or empathetic towards others is not a weakness but a strength that defines your personality.

Dr. Archika Didi 

Tuesday, 18 April 2023

जीवन के प्रमुख कोच

 जीवन के प्रमुख कोच



सर्वव्यापी-न्यायकारी ईश्वर की अपनी संतानाें से एक ही अपेक्षा रहती है कि जो सामर्थ्य देकर हमने इसे धरा पर भेजा है, जितनी शक्ति देकर मैंने इसे दुनिया में भेजा है, उस पर स्थिर हो करके जड़ तो नहीं बना जा रहा, सदुपयोग तो कर रहा, अथवा अपनी शक्ति सामर्थ्य घटाकर रोता कलपता जीवन तो नहीं गुजार रहा है।

कोच, जो ऊँचाईयां दिलाते हैं

यदि ईश्वर को किसी के जीवन में स्थिरता-जड़ता नजर आती है, तो वह क्षमता तराशने के लिए सबसे पहले उस व्यक्ति को उसकी क्षमता अनुसार संघर्षों से जोड़ देता है। जो व्यक्ति अपनी सूझबूझ से इन परिस्थितियों-कठिनाईंयों से बाहर निकलने में कुशल होता है, उसमें अपनी भक्ति के आसन पर बैठने की प्रेरणा भरता है, जिससे फिर कभी वह न तो जड़ता का शिकार हो, न ही पुनः कठिनाइयों में घिरे। इसीलिए कहते हैं कि जिन्दगी में जब-जब समस्यायें आयें, तो उसी ईश्वर को याद करना-पुकारना चाहिए, जिसने हमें इस धरा पर भेजा है। साथ ही अंदर से यह भाव जगाना चाहिए कि परमात्मा अवश्य हमारे लिए इससे बेहतर करने वाला है। इस प्रकार धैर्य-हिम्मत रखकर, शान्त भाव से आयी हुई चुनौती का सामना करना चाहिए।

समस्या है तो समाधान जरूर होगा, समस्या से जूझेंगे तो शक्ति जागृत होगी

कहावत है कि “समस्या है तो समाधान जरूर होगा, समस्या से जूझेंगे तो शक्ति जागृत होगी।“ वास्तव में कोई भी व्यक्ति मैदान में उतरते ही चैम्पियन नहीं बनता, उसे जूझना पड़ता है, नित्य अभ्यास करना पड़ता है, कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। अपने कोच से दाव-पेंच सीखने पड़ते हैं। कई हारें मिलती हैं, कई बार मुंह के बल गिरना पड़ता है, चोटें लगती हैं। इस प्रकार हार खाकर चिंतन करने पर उसे अपने गुरु के निर्देशन याद आते हैं, फिर उसे अपनी गलतियों पर ध्यान जाता है। जैसे ही चूंकें समझ में आती हैं, आंखें चमक उठती हैं, होठों पर मुस्कान खिल आती है, अंतःकरण आ“लाद से भर उठता है। इस प्रकार सूझबूझ के साथ पुनः प्रयास करते ही उसे सफलता मिलती है। आत्मबल जागते ही ईश्वर का जीवन में हर पल साथ होने का अहसास होने लगता है। इस प्रकार नये रास्ते खुल पड़ते हैं, जीवन स्तर ऊंचाई छूने लगता है, भाग्य करवटें लेने लगता है।

ईश्वर और सद्गुरु जीवन के प्रमुख कोच

इसीलिए कहते हैं प्रत्येक परेशानी व्यक्ति को बलवान बनाने के लिए आती हैं। यही जीवन व्यवहार का तप है। कठिनाइयां स्वयं को निखारने का अवसर हैं, जिससे सफलता के फूल खिलते हैं, जीवन रूपी सोना कुन्दन बनने का अवसर पाता है। कुछ बनकर दिखाने-कुछ कर गुजरने की तमन्नायें जीवन में उठती हैं। इसी लिए कहा जाता है ईश्वर और सद्गुरु को जीवन संग्राम का कोच मानें और उसके निर्देशन में सतत अभ्यास की कोशिश करते रहना जीवन है। ऐसा व्यक्ति कर्मठता से कर्त्तव्यों का पालन करता है, जड़ता मुक्त रहकर ऊंचाईयां छूता है। आइये! जीवन में ईश्वर विश्वास जगायें, गुरुकृपा से समस्या रूपी परीक्षा में सफलता पायें।

Friday, 14 April 2023

मातृत्व की गरिमा

 मातृत्व की गरिमा



प्यारा शब्द है माँ, जिसे पुकारते ही याद आती है वह गोद जिस में विश्राम, आराम, शांति-प्रेम-करुणा सभी मिलते है। माँ जीवित हो या अपनी जीवन यात्र पूरी करके परलोक सिधार चुकी हो, माँ का भोला चेहरा, उनके साथ बिताये बचपन के दिन जीवन जीने की प्रेरणा शक्ति देते हैं।

ऐसी होती है माँ

 याद आता है कि बचपन में जब कभी हम गिरे, तो माँ अपना सारा काम छोड़ कर दौड़ती और अपनी बाहों में थाम लेती। बदले में माँ न कभी हमारे मुंह से धन्यवाद शब्द सुनना चाहती और न ही कभी वह अहसान जताती कि मैंने तुम्हारे लिए बहुत किया। एक सांसारिक माँ में हमें विश्वमाता की ही अनुभूति तो होती है। विश्व माँ तो पूरे विश्व की है।

ऐसे दिखती है माँ की महिमा

वह ब्रह्मा की कलम माँ सरस्वती, विष्णु की समृद्धि माँ लक्ष्मी, शिव की शक्ति माँ पार्वती रूप में विश्व भर में फैले अपने बच्चों को सम्हालती है। पर घर-परिवार में माताओं ने ही तो बचपन से संस्कार देकर महानता के आदर्श स्थापित किए हैं। माँ सुमित्र, मदालसा, माँ सुनीति आदि इसी नारी चेतना का आदर्श रूप हैं, जो धन्य मानी गयी।

 प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी, माता विद्यते यस्य स मातृमान।।

अर्थात् माँ धन्य है क्योंकि वह गर्भ से लेकर जब तक बालक की विद्या पूरी न हो, तब तक अपनी सुशीलता-शालीनता व धर्मशीलता का आशीर्वाद देती है। सदियों से ऋषि प्रेरित परम्पराओं को वह आज भी छोटे-छोटे प्रयोगों से जीवित रखती आई है, इसीलिए भारत अनन्तकाल से मातृ सत्तात्मक समाज के लिए जाना जाता रहा है।

सच कहें तो नारी भले आज आधुनिक स्थितियों में घर के छोटे से पिजड़े से वह बाहर की दुनियां में पैर पसारने में सफल हुई है, पर मानसिक स्तर पर वह आज भी कैद है। जिससे उसकी बौद्धिक क्षमता, भावनात्मक सम्वेदनशीलता, जीवन की आंतरिक सृजनशीलता तक चौपट हो रही है। वह खुली हवा, धूप, हाथ-पांव हिलाने की स्थिति में तो दिखती है, पर वह अपनी गौरव-गरिमा खोने से नहीं बच पा रही। आज के आधुनिक समाज ने उसे फैशन-प्रदर्शन की पुतली बना दी है।

मातृत्व की तड़प फूटनी चाहिए

इस प्रकार वह कभी लोहे की बेड़ियों में जकड़ी थी, तो आज उसे इसी समाज ने सोने की बेड़ियों में जकड़ रखा है। युग बदला पर सीमित दायरे से वह निकल ही नहीं पा रही।  सोने-चांदी से उसे लादना, उसे शौक-श्रृंगार से जोड़ना, अपने उत्पादों के विज्ञापन में उसका उपयोग करना आदि उसे सीमित करना ही तो है। इससे कोई ठीक-ठीक विकास कैसे कर सकता है, जिस समाज की नारी बंधी है, उस परिवार और समाज की उन्नति कैसे सम्भव है? अतः हमें समाज को सम्पूर्ण उन्नत बनाना है तो भारतीय आर्ष साहित्य, वेद आदि से लेकर अनेक लोक साहित्य में भी बताई गई नारी शक्ति की मातृभाव वाली गरिमा व महिमा की ओर मुड़ना आवश्यक है। वास्तव में हर नारी के अंतःकरण से यह मातृत्व की तड़प फूटनी चाहिए, तभी कुछ सम्भव है।

Wednesday, 12 April 2023

गोविन्द ध्यानम - जुड़िये अपने कृष्ण-तत्व से | रोहतक | 23 अप्रैल 2023 | डॉ. अर्चिका दीदी

 



कृष्ण-तत्व से जुड़ने का अर्थ है खुद के भीतर आतंरिक शांति, शीतलता, मधुरता एवं आनंद को महसूस करना।
मन को वश में करना कठिन है इसलिए कभी कभी हमारा मन ही हमारा शत्रु बन जाता है।
गीता के ध्यान योग में भगवान श्री कृष्ण ने बताया भी है कि प्रशिक्षित मन हमारा परम मित्र है अन्यथा परम शत्रु, और मनुष्य ध्यान और अभ्यास के द्वारा अपने मन को अपने वश में करके अपना मित्र बना सकता है।
इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने कार्य-कलापों, खान-पान, निद्रा और आमोद-प्रमोद में संतुलन लाना सीखे ताकि वो अपने आनंद से जुड़ सकें।
आइये परम पूज्य सुधांशु जी महाराज के आशीर्वाद से एवं पूज्या डॉ अर्चिका दीदी के सन्निध्य में 'गोविन्द ध्यानम' के माध्यम से अपने कृष्ण-तत्व से जुड़ें जिस से जीवन स्वतः सुन्दर, सरल और आनंदमय हो जाएगा।


Friday, 7 April 2023

ध्यान मुद्राओं का महत्व

 ध्यान मुद्राओं का महत्व



स्वास्थ्य की दृष्टि से ध्यान एक ऐसी तकनीक है, जिसका हर व्यत्तिफ़ आनन्द ले सकता है। इसके लिए ध्यान लगाने के लिए व्यत्तिफ़ को बस इतना करना है कि वह आरामदायक स्थिति में बैठे, स्थिर रहे, धीरे-धीरे सांस ले और आराम से मन को ध्यान केंद्रित होने की अनुमति दे। इस स्थिति में बैठने के लिए हमें ध्यान प्रक्रिया के सभी पक्षों को समझने की आवश्यकता है। जिसमें आसन व मुद्रायें प्रमुख हैं। इससे ध्यान का समुचित लाभ प्राप्त होता है, वे हैं-

पद्मासन व कमल मुद्रा-

                यह रीढ़ की हड्डी की तंत्रिकाओं को मजबूत बनाता है और उनके कार्यों का संचालन करता है। रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में भी रत्तफ़ की आपूर्ति अच्छी करता है। यह आंतरिक भागों को सुडौल बनाने में सहायक है और मन में शांत और ताजगी लाता है। यह पाचन प्रक्रिया को उत्तेजित करता है। पद्मासन से जब शरीर स्थिर रहता है तो मस्तिष्क भी शांत होता है। इसके लिए टाँगों को बाहर की ओर बढ़ा कर बैठें। अपनी दायीं टाँग को घुटनों के पास से मोड़ें और पैर को बायीं जांघ पर ले आएं। इसी प्रकार बायीं टांग को मोड़ें और बायी एड़ी को जितना हो सके दायीं जांघ के पास लाने की कोशिश करें ताकि दोनों एड़ियां नाभि को छू पाएं। सिर गर्दन और रीढ़ एक सीधी रेखा में होने चाहिये। घुटने जमीन को छूने चाहिए। अपने हाथों को ज्ञान मुद्रा में अपने घुटनों पर रखें।

सुखासन व सहज मुद्रा-

                यह मस्तिष्क को शांत करता है, मानसिक और शारीरिक संतुलन प्रदान करता है। घुटनों और जोड़ों में लचक लाता है। कमर को मजबूती देता है। इस मुद्रा के लिए जमीन पर अपनी दोनों टाँग सामने की ओर फैला कर बैठ जायें। एक टाँग को मोड़ें और इसके पैर को दूसरी टाँग की जांघ के नीचे रखें। दूसरी टाँग को मोड़ें और इसे दूसरी टाँग के नीचे रख दें। बिना तनाव के गर्दन, सिर और कमर को सीधा रखें। आँख बंद कर लें। अपने हाथों को ज्ञान मुद्रा में अपने घुटनों पर रखें।

सिद्धासन व सिद्ध मुद्रा-

                यह स्थित रत्तफ़ प्रवाह को उत्तेजित करती है, जो संयम बढ़ाने में सहायक है। यह यौन विकार, हृदय सम्बन्धित कार्य और रत्तफ़ चाप को बेेहतर बनाने में भी मदद करता है। यह बवासीर और बवासीर जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित लोगों के लिए फायदेमंद है। इसके लिए फर्श पर अपनी टाँगें अपने सामने की ओर फैला कर बैठें। अपने हाथों को साइड में रखें। बायें घुटने को मोड़ें और अपनी बायीं एड़ी को श्रोणि तक ले जायें। अपने दायें घुटने को मोड़ें और अपनी दायीं एड़ी को खिसका कर अपने दायें टखने के सामने की ओर ले जायें। दायां पैर उठायें, दायें टखने को बायें टखने के बिल्कुल ऊपर रखें और अपनी एड़ी को अपने जननांग तक ले कर आयें। अपने दायें पैर की उंगलियां को जांघ और पिंडली के बीच में दबाएं। अपनी बाहों को आराम देते हुए अपने हाथों की हथेलियां नीचे की ओर करके समान दिशा के घुटनों पर रखें। गर्दन और सिर को सीधा रखे सामने की ओर देखें।

वज्रासन व वज्रपात मुद्रा-

                यह पाचन क्षमता को बेहतर बनाती है। आमतौर पर इसे भोजन के बाद किया जा सकता है। यह गैस की समस्या को समाप्त करता है। यह घुटनों, टाँगों, पैरों और जांघों के दर्द को कम करता है। यह ग्रंथियों के ड्डाव में वृद्धि करता है। यह प्लीघ, गलतुण्डिका, मज्जा और शरीर के अन्य भागों में बनने वाली श्वेत रत्तफ़ कणिकाओं को बढ़ाता है। यह श्रोणि की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। यह बवासीर और अंत्र वृद्धि रोग के लिए अच्छा है। इसके लिए दोनों टाँगों को सामने की ओर फैलाकर आराम से बैठें। बायीं टाँग को घुटने के पास से मोड़ें और दायें पैर को दायें कूल्हें के नीचे रखें। इसी प्रकार बायीं टाँग को मोड़ें और बायें पैर को बायें कूल्हें के नीचे रखें। पैरों को ऐसे समायोजित करने का प्रयास करें कि पैरों की उंगलियां आपस में छुएं और एड़ियां अलग रहें। दोनों घुटनों को साथ लायें और दोनों कूल्हों को दोनों एड़ियों के बीच टिकाएं। हथेलियां नीचे की ओर करके दोनों हाथ घुटनों पर रखें और आँखें बंद करें। रीढ़ और गर्दन को बिल्कुल सीधा रखें। सामान्य रूप से साँस लें और अपना ध्यान नासिका छिद्रों के अंदर आने और बाहर जाने वाली हवा पर केन्द्रित करें।

                वास्तव में हर व्यक्ति को ऐसे प्रयोगों से जुड़कर अपने को स्वस्थ रखने का अभ्यास करना चाहिए।

Thursday, 6 April 2023

मानसिक मार्ग हैं - मानव शरीर स्थित नाड़ियां



 मानसिक मार्ग हैं - मानव शरीर स्थित नाड़ियां

मानव शरीर में बायोप्लाजमिक ऊर्जा (प्राण) यात्र के असंख्य गलियारे हैं, जिन्हें नाड़ी कहा जाता है। प्राचीन योगियों ने भौतिक शरीर में बहत्तर हजार नाड़ियां बताई हैं, कुछ लोग यह संख्या तीन सौ बीस हजार बताते हैं। इन सभी नाड़ियों में तीन प्रमुख हैं, जिन्हें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के नाम से जाना जाता है। इनमें भी सबसे प्रमुख सुषुम्ना है, जो रीढ़ की हड्डी के भीतर स्थित है।

रीढ़ का अर्थ

यहां रीढ़ का अर्थ शारीरिक रीढ़ नहीं है, बल्कि यह भी शरीर स्थित विशेष मानस मार्ग है। यह नाड़ी

मूलाधार से चलकर प्रत्येक चक्र से गुजरते हुए आज्ञा चक्र से जोड़ती है। आज्ञा चक्र शिखर का चक्र है। ये भी चक्र शरीर में स्थित बायोप्लाज्मिक ऊर्जा के हिस्से हैं। इड़ा नाड़ी मूलाधार चक्र की बाईं तरफ से निकलते हुए, एक घुमावदार पथ में बारी-बारी बीच के चक्रों के मध्य से गुजरती है। जो अंत में आज्ञा चक्र के बाईं ओर जाकर समाप्त होती है। इसी तरह मूलाधार चक्र के दाहिनी ओर से उभरते हुए, इड़ा नाड़ी के विपरीत आज्ञा के दाईं ओर तक पिंगला नाड़ी जाती है।

इड़ा और पिंगला

इड़ा और पिंगला प्राण के दो अलग-अलग पहलुओं के रूप में काम करते हैं। वे एक ही ऊर्जा के दो अलग-अलग ध्रुवों को दर्शाते हैं। इड़ा को ऊर्जा का नकारात्मक पक्ष माना जाता है, जिसे चन्द्र नाड़ी भी कहा जाता है। जबकि, पिंगला उसी ऊर्जा का सकारात्मक पक्ष है, जिसे सूर्य ऊर्जा भी कहा जाता हैं।

दाईं नाड़ी वह पिंगला है और बाईं ओर इड़ा

दाईं नाड़ी वह पिंगला है और बाईं ओर इड़ा। प्राचीन योगियों ने पाया कि प्रत्येक नथुने के माध्यम से श्वास का प्रवाह समान रूप से नहीं होता है। अपितु जिस नथुने का प्रवाह प्रमुख होता है, तो उसी नाड़ी का प्रवाह भी प्रमुख रहता है। तत्पश्चात् इसके विपरीत क्रम में वे चलती हैं। जबकि परिवर्तन के दौरान दोनों नथुनों में प्रवाह सामान्य हो जाता है। वहीं मूल प्राण सुषुम्ना नाड़ी के मध्य से बहता है, यह सम्पूर्ण क्रम केवल कुछ मिनट तक रहता है। नाड़ी प्रवाह व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार बदला जा सकता है। इस श्वास का अध्ययन, अर्थ और प्रभाव स्वर योग विज्ञान का विषय हैं।

जीवन शैली

हममें से प्रत्येक व्यक्ति की एक अलग जीवन शैली है। कुछ लोगों को अपने दैनिक जीवन में अधिक शारीरिक काम पड़ता है, कई अन्य के लिये अधिक मानसिक काम पड़ता है। हममें से कुछ अंतर्मुखी हैं, कुछ बहिर्मुखी हैं। कुछ शारीरिक काम पसंद करते हैं, तो दूसरों को मानसिक काम पंसद है, अर्थात् सभी के पास अपनी ताकत और कमजोरियां हैं। प्रत्येक व्यक्ति में श्वास उतार-चढ़ाव की जीवन शैली व अवधि भिन्न है। योगीजन बताते हैं कि किस प्रकार का काम किसके लिये उपयुक्त है, उसके लिये व्यक्ति की नाक में हवा का प्रवाह प्रमुख रहता है। यदि दाएं नथुने का प्रवाह अधिक है, तो उस मनुष्य का झुकाव शारीरिक काम की ओर है, और उसका मस्तिष्क बहिर्मुखी होगा और वह अधिक गर्मी पैदा करेगा। यदि प्रवाह बाएं नथुने से अधिक होता है, तो वह मानसिक कार्य की दिशा में बहुत अधिक इच्छुक होगा और मन अंतर्मुखी काम करेगा। इसीलिए जब आप नींद में होते हैं, तो इड़ा नाड़ी प्रभावी होती है, यदि ऐसा नहीं हैं, तो समुचित नींद लेना भी एक विशेष कार्य बन जाता है। इसी प्रकार खाने के दौरान पिंगला नाड़ी सक्रिय रहनी चाहिए, अन्यथा पाचन भी एक कार्य बन जाएगा।

श्वास प्रवाह और प्राण प्रवाह

प्राण के ये दोनों पहलू जो विशेष रूप से इड़ा और पिंगला नाड़ी में प्रवाहित होते हैं, प्रत्येक मानव के दो सबसे स्पष्ट लक्षणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अर्थात् सोचने और कार्य करने की क्षमता को यह अत्यधिक प्रभावित करते हैं। नथुनों के माध्यम से श्वास प्रवाह और प्राण प्रवाह जाना जाता है। आम तौर पर यह प्रवाह अनैच्छिक होता है, लेकिन इच्छा शक्ति और विभिन्न यौगिक तकनीकों का उपयोग करके प्राण प्रवाह में हेरफेर करना संभव है। अगर किसी को नींद नहीं आ रही है, तो दाएं नथुने से बायीं तरफ या विपरीत क्रम में प्रवाह को बदलकर नींद संभव किया जा सकता है। हालांकि दिनभर में प्रत्येक नथुने में एक सा प्रवाह लगभग 12 घंटे तक रहता है, दोनों मिलकर कुल चौबीस घंटे तक चलता है। योग का सामान्य उद्देश्य है प्रत्येक नथुने में प्राण प्रवाह को समान रूप से बनाना।