शिव-शक्ति महाध्यान-जो कर्म बीज जलाये
भावी मेटि सकत
त्रिपुरारी
संचित कर्म के
बीज को तप, साधना, भक्ति के द्वारा मिटाया जा सकता है, लेकिन वही संचित कर्म जब प्रारब्ध बन जाता है,
तो उसका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। पर इस
प्रारब्ध को भी मिटाने की शक्ति रखते हैं आदिनाथ महादेव शिव और सदगुरु। कहते भी
हैं ‘‘भावी मेटि सकत त्रिपुरारी’’। जबकि गुरु भक्त के प्रारब्ध को अपने निर्देशन
में कठोर तप, सेवा, जप, ध्यान और कृपा करके मिटाते हैं। कहा गया है कि ‘‘व्यक्ति की किस्मत परमात्मा
लिखता अवश्य है, पर गुरु
निर्देशित ध्यान उसे बदलने की शक्ति रखता है।’’ ध्यान शब्द चिंतन में आते ही
त्रिनेत्रधारी भगवान भूतभावन भोलेनाथ शिव विराज उठते हैं, यही शिव आदिगुरु कहलाते हैं और शिव के ध्यान से गुरु कृपा
मिलती है। गुरु कृपा से कर्मबीज जलते हैं। दूसरे शब्दों में गुरु का ध्यान शिव का
ही तो ध्यान है। जहां गुरु वहीं शिव, दोनों सूक्ष्म विधि से सर्वत्र व कारण विराजते हैं। दोनों दुःखद स्वप्नों के
हर्त्ता हैं।
‘बिंदु गुरुशक्ति
है और नाद शिव तत्व है
गुरु तत्व व शिव
तत्व आध्यात्मिक सुरक्षा चक्र है, ब्रह्मचक्र है,
शक्ति चक्र है, रक्षा कवच है, जो साधक को हर प्रकार से सुरक्षित करता है। भक्त की उचित मनोकामनाएं पूर्ण
करता है। यही सम्पूर्ण चराचर जगत का बिंदु और नाद है। ‘‘बिंदु गुरुशक्ति है और नाद
शिव तत्व है। यह दोनों जब एक धरातल आकर संसार चक्र से जुड़ते हैं, मायाधर की भूमिका में आते हैं, तब शिवशक्ति हो जाते हैं, जो माया चक्र के परम कारण निर्माता हैं। शिव और
पार्वती का विग्रह भी यही है, यह जगत भी
शिवशक्ति स्वरूप कहलाता है।’’ इसलिए गुरु निर्देशन में ध्यान का अवसर खोजकर अपने
संचित कर्म को मिटाने पर ध्यान देना चाहिए। शिव-शक्ति महाध्यान साधक में सम्पूर्ण
बदलाव लाने वाला अनोखा आध्यात्मिक प्रयोग है।
साधक के सुख
सौभाग्य का मार्ग प्रशस्त करता है
शिव स्वयं में
आदिगुरु एवं आदि योगी हैं, कल्याणकारी हैं,
वे क्रियमाण, संचित एवं प्रारब्ध तीनों प्रकार के कर्म का शमन करने में
समर्थ हैं। पर क्रियमाण कर्म संचित होकर प्रारब्ध बनने से पहले ही उसे मिटाने व
भून डालने में सदगुरु समर्थ होते कहे जाते हैं। सदगुरु इसके लिए अपने भक्तों को
ध्यान के साथ-साथ कुछ तप विधान और कुछ सेवाकार्यों से गुजारते हैं। इंदियों पर
नियंत्रण, वाणी पर नियत्रंण,
स्वाद पर नियंत्रण, लालच भरी दृष्टि पर नियंत्रण के साथ सदगुरु मार्गदर्शन में
की गयी शिव-शक्ति ध्यान से साधक के जीवन में धर्म उतरता है। धर्ममार्ग से जुड़ते ही
वह ईश्वर के निकट होने लगता है और जीवन कष्टों से बचता है। मुसीबतें आती हैं,
पर कुछ विगड़ता नहीं, यही शिव-शक्ति महाध्यान का महत्व है। इसमें महत्वपूर्ण
भूमिका गुरु की होती है। इन कठिन प्रयोगों के समय गुरु सीधे शिव की भूमिका में
रहता है और उसके द्वारा निर्देशित तप व सेवाकार्य शिवत्व स्वरूप शक्ति की भूमिका
निभाते हैं। तब गुरु का यह सम्पूर्ण प्रयोग रक्षा कवच बनकर कर्म की लाख जटिलताओं
में साथ निभाता है और भाग्य को डूबने नहीं देता। साधक के सुख सौभाग्य का मार्ग
प्रशस्त करता रहता है।
कैलाश शिखर व् ध्यान
साधना
शिव-शक्ति भगवान शिव कैलाश शिखर पर विराजते हैं,
हर प्रतिष्ठित सदगुरु की साधना कैलाश शिखर के सान्निध्य
में ही पूरी होती है, ऐसी मान्यता है।
इसीलिए भारत के संत, ऋषिगण सदियों से
कैलाशशिखर की आध्यात्मिक लहरियों में तैरते आ रहे हैं। उस आध्यात्मिक तरंगों से भर
कर जब वे लौटकर संसार के कल्याण का बीणा उठाते हैं, तो लोगों के जीवन के दुःख-दरिद्र, तनाव, दबाव मिटने लगते
हैं। जन जन के अंदर स्तर की आध्यात्मिकता व पुण्य, पवित्रता का संचारकर्ता होने लगता है। युग को नई शक्ति
मिलती है। जो जनमानस जीविका के नाम पर उद्यत प्रतिष्पर्धी, अशांत, तनावभरी भागदौड़
वाली जिन्दगी जीते हैं, उन्हें इससे बाहर
निकालने में शिव-शक्ति ध्यान फलीभूत होती है। यह साधकों में नीति पर चलते हुए
असफलता को स्वीकारने की शक्ति भरती है, ऐसा मार्ग दिखाती है जिससे जीवन की भाव संवेदनायें मरने से बचें। जीवन मूल्य
खोने न पायें, स्वतंत्र एवं
अनुशासित होकर अपना भाग्य जगाने का जन साधकों में विश्वास जगे, और जनमानस भरपूर मात्र में सद्गुण, सद्संकल्प, संतोष, श्रम, सेवाभावी संसाधन एवं प्रकृति के पूरक वाली
चेतना, आंतरिक प्रसन्नता व खुशी
से भरते रह सकें, यही गुरुवर की शिव-शक्ति
महाध्यान का लक्षण है शिव स्वयं में आदिगुरु एवं आदि योगी हैं, पर संसार के बीच वे सद्गृहस्थ परम्परा के निर्वाहक
भी हैं।
शिवपरिवार भरता
है प्रेरणा
अनन्तकाल से राष्ट्रसेवा,
समाज, धर्म, अध्यात्म, तप सहित संपूर्ण समाज व्यवस्था को गतिशील करने
एवं सेवाधर्म का निर्वहन ‘गृहस्थ’ धर्म के अधीन रहा। यही कारण है कि जो गृहस्थ
अपने परिवार के साथ ‘युगधर्म’ से जुड़कर सेवा धर्म निभाते हैं, उन पर भगवान शिव सदैव कृपा करते हैं। सेवाकार्य
में पुण्य आत्मायें सतत लगी रहें, इसके लिए
सदगुरुदेव महाराज भी भगवान शिव के प्रतिनिधि रूप में सेवा प्रकल्प में अपने भक्तों
को लगाकर उन्हें निज स्वभाव से जोड़ते है, उनका कल्याण करते रहते हैं। धरा पर सुख-शांति, सेवा, सृजन की धारायें
प्रवाहित रहें, शिवपरिवार
प्रेरणा भरता है।
शिव-शक्ति महाध्यान
को अपनायें
निजस्वभाव में
उतरकर मूल्यों से जुड़कर जीवन जीने से जीवन के उत्तरदायित्वों की पूर्ति सहज होती
है और समुचित जीवन निर्वहन सहज होता है। यही हमारी सदियों की जीवन परम्परा है। शिव-शक्ति
महाध्यान साधक में यह शक्ति भी भरता है। वास्तव में निजस्वभाव को जगाने का सही समय
यही है। आइये! जीवन को दिव्यता से जोड़ने एवं भारत को पुनः विश्व गौरव दिलाने के
लिए गुरुनिर्देशित शिव-शक्ति महाध्यान अपनायें, सौभाग्य जगाये।

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