जीवन में सफ़लता की कुंजी क्या है?
वर्तमान युग
प्रबन्धन कुशलता या मैनेजमैंट एफीशैंसी का युग है। जीवन का कोई भी क्षेत्र हो,
शिक्षा हो, व्यवस्था हो, नौकरी हो, सेना हो, मानवीय सम्बन्धों में गरमाहट हो, पड़ोस से सम्बन्ध हों, विदेश नीति हो, अंतरिक्ष की उड़ान हो, चांद पर जाना हो
या धरती पर जीना हो, प्रबन्धन जरूरी
है। वह भी कुशल, सकारात्मक,
परिणामवादी प्रबन्धन की हर युग में अनिवार्यता
थी।
प्रबन्धन का गुरु
भगवान राम-रावण
का युद्ध में कुशल योजना के बिना रामजी को सफलता नहीं मिलती, अनेक सलाहकार थे उनके, महाभारत युद्ध में अर्जुन को नियोजन से ही सफलता मिली।
रामदूत हनुमान जी को प्रबन्धन का गुरु माना जाता है। राम जी के आदेश को सफलता से
लागू करना है, उनकी सेवा के भाव
का सर्वदा यही उद्देश्य होता था। अन्तर केवल इतना है, आज प्रचार का जमाना है, प्राचीन समय में प्रचार नहीं होता था।
सामर्थ्य है,
पोटेन्शल है किन्तु ध्यान
नहीं आता
प्रबन्धन के
क्षेत्र में हनुमान जी हमारे आदर्श हैं। विभिन्न परिस्थितियों में उन्होंने कैसे
प्रखर बुद्धिबल से प्रबन्धन के नये-नये सूत्र खोज निकाले और वे हर चुनौती में सफल
हुए। उन्हें सीता जी की खोज के लिए लंका जाने के लिए समुद्र पार करना था। मन में
संशय और भय आया कि इतना विशाल समुद्र कैसे पार करूंगा? अब उनके अंदर सामर्थ्य है, पोटेन्शल है किन्तु ध्यान नहीं आ रहा। जामवन्त जी ने उन्हें
उनकी असीम शक्ति का बोध करवाया, तो उन्होंने अपनी
अलौकिक शक्तियों की पहचान कर, समुद्र को आसानी
से पार कर लिया।
महत्वपूर्ण
दायित्व अक्सर अहंकार को जन्म देता है
जीवन में जब किसी
को महत्वपूर्ण दायित्व दिया जाये तो व्यक्ति में अक्सर अहंकार आ जाता है, किन्तु हनुमान जी में ऐसा नहीं है। समुद्र पार
करते समय समुद्र में से राक्षसी उत्पन्न होकर हनुमान जी का रास्ता रोकती है,
किन्तु वह अपने शरीर को बहुत विराट बना लेते
हैं, उससे राक्षसी अपने मुख को
बड़ा कर खोल लेती है, किन्तु हनुमान जी
झट से अपने शरीर को सूक्ष्म बना कर उसके जबड़ों से पार हो जाते हैं। वास्तव में
प्रबंधन में मन बुद्धि, ज्ञान, ध्यान और भक्ति का सम्मिश्रित स्वरूप है यह।
अहंकारी व्यक्ति
को महत्व देने की आवश्यकता नहीं
लंका में प्रवेश
करने के उपरान्त हनुमान जी असमंजस में हैं कि सीता जी कहां होंगी, इस पुण्य कार्य के निष्पादन में प्रकृति भी
उनका साथ देती है। उनकी भेंट धर्मप्रेमी विभीषण से हो जाती है, जो उन्हें बताते हैं कि रावण ने सीता जी को
अशोक वाटिका में बन्द कर रखा है और उन्हें अशोक वाटिका का रास्ता भी बताया और वह
सीता जी के पास पहुंच गये।
वहां जाकर हनुमान
जी ने देखा कि रावण सीता जी को कई लालच देकर, उन्हें डरा धमका रहा है, उन्हें अपना बनाना चाहता है, किन्तु सीता जी हाथ में घास का तिनका धारण किये उनकी परवाह
नहीं करती, जिसका अर्थ स्पष्ट है कि
अहंकारी व्यक्ति को महत्व देने की आवश्यकता नहीं है। उसकी उपेक्षा करना ही उचित
है।
प्रबन्धन विद्या
की पराकाष्ठा है
अशोक वाटिका में
सीता जी बहुत निराश हैं पूर्ण एकाकीपन, रामजी की याद, पर उनका कोई
संदेश नहीं, उलझन की स्थिति,
स्थितियों की पूर्णतः अस्पष्टता, तब सीता जी अपना जीवन अन्त करने का सोचती हैं,
इतने में हनुमान जी वृक्ष पर बैठे राम जी की
मुद्रिका नीचे गिरा देते हैं। जिसे देखकर सीता जी उलझन में हैं। सीता जी मुद्रिका
को देखती हैं, इतने में हनुमान
जी उनके सामने प्रकट हो जाते हैं, उन्हें आश्वासन
देते हैं कि उन्हें उनके पास भगवान राम ने भेजा है, वह उनका पता लगाने आये हैं, सीता जी स्थितियों की पूरी जानकारी लेकर संतुष्ट हो जाती हैं।
अब सोचिये,
यहां हनुमान जी की प्रबन्धन विद्या की
पराकाष्ठा प्रकट होती है। पहले तो प्रमाण के रूप में रामजी की अंगूठी लेकर आना,
फिर उसे सीता जी को देना, उन्हें खोजने के लिए राम जी द्वारा किये जा रहे
सभी प्रयासों के बारे में बताना और उन्हें उनकी बातों पर विश्वास हो जाना, यह उनकी प्रबन्धात्मक सूझबूझ का चरम है।
जैसे को तैसा
रावण ने अहंकारवश
और क्रोध में हनुमान जी की पूंछ में आग लगा दी, सबने मना किया किन्तु वह नहीं माना, हनुमान जी ने भी सोचा जैसे को तैसा मिले तो उत्तम है,
उन्होंने सारी लंका ही जला दी। यह भी प्रबन्धन
का एक अलग स्वरूप था।
अहंकारी को
डराना-धमकाना भी प्रबन्धन का अंग
अंततः भगवान राम
ने भी प्रबन्धन का एक प्रमाण दिया, उन्होंने लंका
जाने के लिये सागर से मार्ग देने के लिए प्रार्थना की, किन्तु वह तीन दिन तक नहीं माना, अंततः उन्होंने सागर को धमकी दी कि वह तीर मारकर सागर को
सुखा देंगे, तब सागर रास्ता
देने के लिए मान गया और अद्भुत रहस्य प्रकट किया कि उनकी सेना में नल और नील सागर
पर पत्थरों से पुल बनाने में समर्थ हैं, ऐसा रामजी को बताया। पुल बनाया गया, जो रामसेतु के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। स्थिति आने पर अहंकारी को
डराना-धमकाना भी प्रबन्धन का अंग है।
डॉ. अर्चिका दीदी

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