गुरु पूर्णिमा परस्पर सूक्ष्म आदान-प्रदान का पर्व
दुनिया में सबसे
बड़ा रिश्ता कौन सा है ?
दुनिया में सबसे
बड़ा रिश्ता ‘गुरु’ और शिष्य का है। गुरु के साथ रिश्ता निभ सका और गुरु के प्रति
शिष्य की निष्ठा और श्रद्धा जग सकी, तो बदलाव की बड़ी क्रांति होती है। गुरु शिष्य के बीच आध्यात्मिक रिश्ता जगाने
का सर्वश्रेष्ठ दिवस है गुरुपूर्णिमा। गुरु पूर्णिमा को ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहते
हैं। कथानक आता है कि महर्षि वशिष्ठ के पौत्र व महर्षि पराशर के पुत्र ‘वेदव्यास’
बाल्यकाल से ही तप व वेद विस्तार में जुट गये थे। वेदव्यास के जीवन में विद्वता,
परमभक्ति एवं आध्यात्मिक गुरुत्व जगने के कारण
ही आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा का नाम व्यास पूर्णिमा पड़ा। इसीलिए यह गुरु धारण करने का
पवित्रतम दिवस है। गुरु-शिष्य परम्परा से जुड़ा दिव्य अवसर है गुरुपूर्णिमा। कहा
जाता है गुरुपूर्णिमा के अवसर पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियां गुरु में प्रकट होती हैं, जिसके सहारे शिष्य में प्रगाढ़ श्रद्धा-भक्ति, शक्ति जागती है, दीक्षा अनन्तगुणा होकर अंकुरित होती है और शिष्य के सौभाग्य
का उदय होता है। गुरु द्वारा प्राप्त साधन से शिष्य के रोग कटते हैं, समस्याएं सुलझती हैं, प्रायश्चित पूरा होता है आध्यात्मिक उत्थान होता है और
परिवार में सुख शांति समृद्धि की वर्षा होती है।
योग्य गुरु व
योग्य शिष्य से बनें इतिहास
योग्य गुरु व योग्य शिष्य के इस मिलन से इतिहास
में महान घटनायें घटी हैं। जीवन में महान रूपातंरण हुए हैं।
1.
चाणक्य और
चंद्रगुप्त,
2.
रामानन्द और कबीर,
3.
समर्थ गुरु
रामदास एवं छत्रपति शिवाजी,
4.
विश्वामित्र-श्रीराम,
5.
श्रीकृष्ण और
अर्जुन,
6.
रामकृष्ण परमहंस एवं स्वामी विवेकानन्द
आदि का मिलन यही तो है। यह मिलन बताता
है कि किसी योग्य गुरु के पास शिष्यत्व की योग्यता रखने वाला एक व्यक्ति ही समाज
के नवनिर्माण के लिए बहुत है। समर्थ गुरु एक साधारण से इंसान को भी ऐसा रूप दे
सकता है कि वह सारे संसार में पूजनीय बन जाये। इसीलिए गुरु को शिष्य के अंदर सुप्त
पड़ी शक्तियों का उद्घाटक कहते हैं।
दुनिया को अपने सद्गुणों से झुका लेते हैं जिनके ?
परमात्मा व गुरु की कृपा से जिन व्यक्तियों के
अन्तःकरण निर्मल होते हैं, वे दुनिया को
अपने सद्गुणों से झुका लेते हैं। गुरु कृपा जब भी जीवन में उतरती है, सबसे पहले शिष्य के जीवन में विनम्रता जगाती
है। सज्जनता, शालीनता, शांति रूपी क्रांति घटती है, फिर अंदर से भक्ति की लहर जगती है, धर्म में रुचि बढ़ती है। यही धीरे धीरे समाज में
विस्तार पाती है। लोककल्याण के मार्ग खुलते हैं, भक्ति, ज्ञान व वैराग्य
की कल्याणकारी चेतना स्थापित होती है। इस प्रकार गुरु के सदप्रयास से जीवन रूपी
बुझे दीपकों में ज्योति जल उठती है, फिर ज्योति से ज्योति जलने वाली फ्अग्निना अग्निं समिध्यते।य् जैसी अनन्तकालीन
परम्परा चल पड़ती है।
‘गुरु’ सत्पुरुष
है
‘गुरु’ सत्पुरुष है, इसलिए संतगण शिष्य को गुरु के निकट रहने की सलाह देते हैं।
गुरु के समीप रहना, गुरु आश्रम में
सोना, बैठना, चलना, उसके चिंतन में खोना, गुरु की धारणा
में निमग्न रहना, गुरु सत्संग,
स्वाध्याय, गुरु निर्देशित ध्यान, गुरु आदेशित सेवा में जीवन को प्रतिपल लगाये रखना परम
उपलब्धि माना जाता है। पर जीवन में आत्म ज्योति जगाने के लिए दो बातें इससे भी
महत्वपूर्ण हैं, प्रथम है योग्य
गुरु की खोज व पहचान, दूसरा मिले हुए
गुरु पर श्रद्धा को टिकाये रखना। वास्तव में सद्गुरु की खोज और उसकी प्राप्ति के
लिए अंतःकरण में शिष्यत्व महत्वपूर्ण है। जिस स्तर का हमारे अंदर का शिष्य भाव
होगा, उसी उच्चता के गुरु की
हमें प्राप्ति होगी। वैसे भी राम को पाने के लिए हनुमान स्तर की शिष्य भावना भी
आवश्यक है। आध्यात्म रामायण में जिक्र है राम के दल में अनेक लोग थे, पर सभी राम की निजता के अनुरागी थे, जबकि हनुमान को राम से अधिक ‘राम का काज’ प्रिय
था। वास्तव में किसी का सानिध्य लाभ स्वीकार करना सामान्य है, लेकिन उसका आदेश शिरोधार्य करना बड़ी बात है। हर
परिस्थिति में आदेश गुरु का ही शिरोधार्य हो सकता है, दूसरे का नहीं। हनुमान जी ने राम को गुरु रूप में वरण किया,
तो राम साक्षात गुरु रूप में ही उन्हें मिले
थे। परिणामतः हनुमान में राम पूरी तरह उतर आये, हनुमान राममय हो गये और आज तक गुरु कृपा की ज्योति से
ज्योति जलती आ रही है।
गुरु पूर्णिमा
श्रद्धा जागरण का पर्व है
हनुमान साहसी थे, सद्संकल्प एवं समर्पण के धनी थे, लेश मात्र का उनमें कर्तृत्व का अभिमान नहीं था। प्रभु
स्मरण एवं प्रभु समर्पण ही उनके जीवन का सार था। इसी समर्पण के बल पर उन्होंने राम
के प्रति अपनी श्रद्धा को पराकाष्ठा पर पहुंचाया। तो राम जैसे गुरु ने श्रद्धा के
बल पर शिष्य हनुमान को उच्च आध्यात्मिक पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया। परिणामतः गुरु
शिष्य एकाकार हो उठे। इससे स्पष्ट है कि जैसे पात्र यदि निर्वात हो तो उसमें कुछ
रख पाना असम्भव है। ठीक उसी प्रकार शिष्य की श्रद्धा उसे निर्वात होने से बचाती
है। श्रद्धा के सहारे गुरु शिष्य में सबकुछ उड़ेल देता है।
श्रद्धा होती है
अगाध
शिष्य, गुरु व गुरुपूर्णिमा तीनों एक स्थान पर मिलकर श्रद्धा को ही तो अगाध करते हैं,
इसलिए गुरुपूर्णिमा श्रद्धा जागरण का पर्व
कहलाता है। गुरुपूर्णिमा पर गुरु और शिष्य दोनों में परस्पर कारण स्तर की निकटता
बढ़ती है, इस समय गुरु शिष्य के बीच
आध्यातिमक आदान-प्रदान बढ़ जाता है, साथ ही इस समय
गुरु की ओर जो भी कुछ जिस भावना से प्रेषित करते हैं, वह शिष्य को अनन्तगुना होकर वापस भी मिलता है। गुरुदीक्षा
के पीछे यही चमत्कार कार्य करता है। ‘गुरु’ अन्दर से उमड़ पड़ता है और दोनों के बीच
का यह सूक्ष्म आदान-प्रदान सदा-सदा के लिए अमर बन जाता है। गुरु-शिष्य सहित
सम्पूर्ण राष्ट्र कृतकृत्य हो जाता है। ऋषियों द्वारा निर्देशित इस पवित्र अवसर को
न खोते हुए आइये गुरुपर्व उठायें, दूसरों का दुःख
दूर करने की अवस्था पायें जब-जब ऐसा हुआ है, युग ने करवट लिया है, गली-सड़ी परम्पराएं स्वतः मिटी हैं।

No comments:
Post a Comment