Friday, 22 July 2022

Muktinath and Pashupatinath Tour – A Journey of Spiritual Awakening


 



Muktinath and Pashupatinath Tour – A Journey of Spiritual Awakening-> Over the last five decades, a significant number of people throughout the world have shown interest towards spiritual awakening. The number of such people increased manifold when the coronavirus pandemic struck the whole world. Amidst all this worldly chaos, a simple meditation session has proved to be a life saver for entire humanity.

The limitless benefits of meditation have shown people a ray of hope in these troubled times. Be it mindfulness, maturity in thinking, meeting with God in silence or any kind of physical, mental or spiritual needs; meditation has brought miracles in people’s lives. In addition, the flexibility of doing it right in the middle of our super busy lives has increased its popularity like never before. One can meditate in many ways. For beginners, the easiest way to do it is sitting quietly, focusing their attention to the third eye with a soft music playing in the background.

Meditation brings you relaxation and blesses your soul with calmness. A qualified instructor’s proper guide to meditation promises good mental and physical changes.

However, people who want more advancement in life materialistically as well as spiritually must opt for best guided meditation programmes in India. These programmes offer guided meditation for relaxation which is sought after by everyone.

But, why exactly do we need a spiritual retreat?

In our fast-paced lives, we have lost our touch with nature and its beautiful aspects. A spiritual retreat offers a much-needed break to the heart and mind. There are many top meditation centres in India where a city dweller can escape this hectic, monotonous and tiring lifestyle. These meditation retreats in India helps one to immerse in the exceptional experience of cosmic spirituality.

The tour packages for Muktinath and Pashupatinath provided by us gives you a chance to connect with the divine energy of Lord Vishnu and Shiva. The tour package for Muktinath guarantees a guided mindfulness meditation. Same way, the luxury tour package for Pashupatinath is a perfect healing retreat where you experience spirituality like never before. We also provide helicopter tour package for Muktinath for the comfort of such seekers. The tour package for Muktinath and Tour package for Pashupatinath are the best way to meditate where participants get the opportunity to open themselves up to the Almighty.

About Muktinath temple

The famous Muktinath temple in Nepal’s Muktinath Valley is dedicated to Lord Vishnu and revered by Hindus and Buddhists alike. Here, Lord Vishnu got rid of his devotee Brinda’s curse and achieved salvation. That’s why, it is believed that people visiting it attain salvation. The pagoda-styled Muktinath temple is amongst the 108 Vaishnava shrines. Tibetan Guru Padmasambhava meditated here on his way to Tibet making it equally sacred for Buddhists.

Whereas, situated across both banks of Bagmati River on the eastern outskirts of Kathmandu, the 17th century Pashupatinath Temple is another holy shrine for Hindus. It is a UNESCO World Heritage Site which attracts millions of devotees all over the world. Like Muktinath, Pashupatinath mandir is a pagoda-styled temple.

Both Muktinath and Pashupatinath temples are filled with extreme spiritual energy. Thus, together they make for a great destination for religious purposes and spiritual practices. Visiting these two holy shrines are sure to bring the seekers the most sought-after peace of mind.

The Muktinath and Pashupatinath spiritual tour is a great idea to rediscover yourself. Those want to heal themselves naturally by meditating in peace must take this tour package for Muktinath and Pashupatinath in Nepal.

It is a fact that visiting such places of divine energy leaves an indelible mark on a person where they learn to meditate through our guided meditation sessions. This spiritual retreat introduces the participants to the world of guided relaxation. The path to enlightenment through our self-mediation process unblocks mental barriers and ensures best meditation experiences. This tour promises spiritual experiences and enables one to deal with the harsh realities of life with patience and perseverance.

Ongoing Event:

Muktinath & Pashupatinath Special Meditation retreat by Dr. Archika Didi

From 20th to 25th August, 2022

For Registration & More information visit: https://sacredkailash.com/muktinath-pashupatinath-meditation-retreat/

Contact us at:  7291986653 ,   7291986656 ,  7291986657 ,  Info@lifepathway.in

 

Thursday, 21 July 2022

जैसा व्यवहार दुनिया से चाहते हो वैसा ही करना धर्म है

 जैसा व्यवहार दुनिया से चाहते हो वैसा ही करना धर्म है



धर्म  सदैव ही धारण करने योग्य होता है

‘‘धारणा धर्म इत्याहु धर्मः धार्यते’’ प्रजाः यही तो है। अर्थात जो गुण, स्वभाव, अच्छी चीजें मनुष्य को मनुष्य बनाए रख सकें, जिसके द्वारा प्रजा का कल्याण हो वही धर्म है। इसीलिए कहा गया है कि धर्म के बिना इस दुनिया में किसी का कार्य नहीं चलता। मनुस्मृति ६.९१  में मनु महाराज इसी का विस्तार कुछ इस तरह करते हैंः-

                धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।

                धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।

                वेदव्यास जी ने भी कही- “आत्मनः  प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् इति धर्मय”

यदि हम इनका विस्तार करें तो कह सकते हैं कि

‘‘अपने लिए जो कुछ चाहते हैं वैसा व्यवहार दुनिया के साथ करने का नाम धर्म है।’’

धार्मिक कब हो जाओगे?

पुराणों में इससे भी आगे जाकर कहा गया कि अपने लिए, अपने प्रिय पुत्र व पुत्री के लिए जैसा व्यवहार आप चाहते हैं, उसी तरह से जब आप दूसरों के लिए कार्य करने लग जाओगे, तब तुम सच में धर्मात्मा कहलाओगे। अर्थात जब तुम्हारे जीवन में करुणा आएगी, क्षमा आएगी, जब तुम दूसरों को माफ करना शुरू करोगे, तो निश्चित ही तुम धार्मिक हो जाओगे। हमारे यहां इसी स्तर के धर्म धारण करने की आदिकालीन परम्परा चली आ रही थी। हर व्यक्ति के व्यक्तित्व से उसका इसी स्तर का धर्म अभिव्यक्त होता था, वह सामान्य नागरिक हो अथवा कोई प्रोफेशनल्स।

धर्ममय थे ये सब ऋषि-मुनि

इस दृष्टि से गौर करें तो महाभारत के पूर्व का युग जीवन समाज में धर्म-कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व का था, जीवनशैली से लेकर शिक्षा-दीक्षा से जुड़ी सभी विद्यायें धर्ममय, न्यायमय थी। सम्पूर्ण ऋषिमय था। धनुर्वेद विद्या से लेकर अस्त्र-शस्त्र संचालन सहित सारी विद्याओं के जनक शिवजी माने गये हैं। इसके बाद भारद्वाज ऋषि, परशुराम, विश्वामित्र आदि जो भी आगे ऋषि मुनि, ज्ञानी, ध्यानी आये, उन्होंने धनुर्वेद का तत्त्कालीन धर्म स्वरूप इस दुनिया में विस्तार से किया। दूसरे शब्दों में धनुर्वेद के माध्यम से अस्त्र शस्त्र संचालन और उनका निर्माण आदि का विस्तार ईमानदारी के साथ युगधर्म के रूप में हुआ। इस देश में हमारे यही ऋषि मुनि राजनीति, कूटनीति के प्रकार एवं प्रयोग विधियां भी लोगों को सिखाते थे। यही नहीं षड्यंत्र के 6 या 10 यंत्र आदि अनेक तरह की विधियां भी धनुर्वेद के साथ साथ ही उस समय सिखाई  जाती थीं। जो जिस क्षेत्र के योग्य था, उसके द्वारा इन्हें सीखना और सिखाने वाले द्वारा सिखाना तत्कालीन धर्म था। सभी इसमें पूर्ण ईमानदारी बरतते थे। यद्यपि कुछ मूलभूत शिक्षाएं तो सबको समान दी जाती थीं, इसके बाद तत्कालीन योग्यता के आधार पर उसे विशेषज्ञ बनाया जाता था, अलग तरह की विद्याएं सिखाई जाती थीं। चिकित्सा शास्त्र, सर्जरी-शल्य चिकित्सा में विशेषज्ञता के लिए धन्वंतरी से लेकर सुश्रुत, चरक, वाग्भट, अश्विनी कुमार जैसे अनेक-अनेक ऋषियों के नाम अग्रगण्य हैं। यह सब अपने अपने क्षेत्र में धर्ममय थे। इस तरह हमारे देश का बहुत बड़ा चिकित्सा व आरोग्य शास्त्र सामने आया।

विद्याओं-शास्त्रों के मूल जनक भगवान शिव

रसायन शास्त्र के तहत रसायन को पूर्ण स्वरूप से देने में हारीत नागार्जुन, सुषेण वैद्य, शुक्राचार्य थे। सुषेण जैसे वैद्य को संजीवनी बूटी से लेकर संजीवनी विद्या का ज्ञान था, जिसका लाभ असुर लोग भी लेते थे। इसी प्रकार वास्तु कला भी हमारे देश की विशेष विद्या थी। वास्तुकला में शतोधन, विश्वकर्मा, मय जैसे दानवों का नाम सुनते हैं, जिनके पास में अद्भुत शक्तियां थीं, विश्वकर्मा इंद्र के सहयोगी थे। देश का राग रागनी और स्वर शास्त्र, जिसमें नारद मुनि निष्णाद थे। राग रागनी और स्वर शास्त्र के लिए, नारद ऋषि ने महत्व दिया, उसी में उद्दालक, उपमन्यु, गंधर्व का नाम आता है। पशुपालन विभाग के ऋषि उपमन्यु, उत्कच, महानद ऐसे अनेक आते हैं। शास्त्र रचना करने वाले लोगों की भी एक परंपरा थी। लेखन, ज्ञान के विकास, शास्त्रें की रचना करने में अग्नि, वायु, अंगिरा, ब्रह्मा, व्यास ऋषि, सूत और वैशम्पायन सहित अनेक विशेष ऋषि हुए हैं। उस दौर में तपस्वियों की परम्परा भी दिखती है, तप शक्ति के द्वारा अपने आप को ऊंचा उठाने वाले ऋषि मुनियों ने अपने आपको और देश के आत्मबल को शक्तिशाली बनाया। इसमें च्यवन ऋषि, दधीचि सहित असंख्य नाम आते हैं। ऐसे ऋषियों की एक लम्बी श्रृंखला थी। तपस्वियों ने ही भारत को दर्शनशास्त्र दिये, जिसमें गौतम, कपिल, कणाद, जैमिनी, पतंजलि आदि ऋषि आते हैं। पतंजलि ने भारत को योग विज्ञान दिया। इन सम्पूर्ण विद्याओं-शास्त्रों के मूल जनक भगवान शिव ही माने जाते हैं।

धर्म कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व हीनता का प्रवेश है महाभारत काल

इस प्रकार हमारे देश में ज्ञान, चिकित्सा, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, आयुध, शस्त्र-शास्त्र से लेकर तप आदि का सर्वाधिक ऊंचा आदर्श था। कह सकते हैं सम्पूर्ण तंत्र धर्ममय थे, लोककल्याणकारी भावों से भरे थे, परिणामतः सम्पूर्ण विश्व उन्नतशील भारत के इस ज्ञान विज्ञान को लेकर लालायित था। लेकिन महाभारत काल आते आते अधर्म के दायरे में आ गये और हर तरफ लोगों के धर्म-कर्त्तव्य में शिथिलता आने लगी। इसका प्रभाव समाज की अवनति से लेकर व्यक्ति के चिंतन चरित्र में गिरावट एवं परिवार में लोभ, लालच के चलते विखराव के रूप में देखने को मिलने लगा। जिसे लोगों के धर्म-कर्त्तव्य में भगवान श्रीकृष्ण को अवतार लेकर सम्भालना पड़ा।

Tuesday, 19 July 2022

FOUR STAGES OF LIFE-TIME


 

FOUR STAGES OF LIFE-TIME

Our great people – saints and sages - have divided life-time into four stages. In the first twenty-five years of our life, we should accumulate knowledge, wealth, especially the wealth of physical health and strength. It is observed that while learning mathematics, one of the first things that a student is taught is ‘to add’. Then he would be taught subtraction and, thereafter, multiplication – that’s just the way it is done.

Life has four stages

The sages said that the same is the order of life. To learn maths we have to understand these four things. In the same way, life is divided into four stages. During the first stage one is not married, say about twenty-five years of age, one learns how to add or accumulate. You add to your qualities, increase physical strength, mental capacity and balance of mind. So it is all addition. As you enter the family life, you start decreasing the same things on your own self. As one learns to increase and decrease in this way, one’s capacity, strength and experience also increase. Next, one has to multiply the same experience many times over, and, having done so, stepping out of his family life, he has to distribute the same knowledge and experience in the world outside.

A man retires four times in his life-time

In our Indian tradition there is no place for retirement, what according to the Western civilization, is supposed to be the period of life when one gets leave from work. In our tradition if you start talking about retirement, it won’t be once, but four times. From eight years to twenty-four years, a person lives in the house of his Guru to accumulate knowledge. He retires from there, i.e., his student life, and enters his family life. He lives in his family life up to fifty years. Stepping out of his family life he starts doing penance in forests. It is advised that during this stage of life, one should increase one’s endurance, have better control over one’s speech and the ears should be tolerant enough so as not to feel bad even after hearing unpleasant words.

Retirement is not the end of life

On turning seventy-five years of age, one should become an ascetic, sharing with one and all whatever one has obtained. In this way if one spends the last stage of life in philanthropy, so there is no scope of retirement anywhere. The Indian tradition is that you keep giving till the last stage of your life. The issue is not merely that of food and clothing – start social service which you can complete at any age. It is your duty, therefore, to do something good for the coming generations too. So get going and do something and make your old age useful.

Thursday, 14 July 2022

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन

 


ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन

 

ग्रीन हाउस गैस

ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन में ग्रीन हाउस गैस सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। ग्रीन हाउस गैसें ही हैं जो वातावरण की स्वाभाविक गर्मी या ऊष्मा को अपने अंदर सोखकर वातावरण को शुष्क करती हैं। हमारे पर्यावरण में फैली ग्रीन हाउस गैसों के कारण ही हमारी पृथ्वी पर तापमान में बढ़ोत्तरी होती रहती है।

ग्रीन हाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड प्रमुख गैस है, जिसे हम जीवित प्राणी अपने साँस के द्वारा बाहर निकालते हैं। पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में पृथ्वी पर कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्र लगातार बढ़ी है। कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन और तापमान वृद्धि में गहरा सम्बन्ध माना जाता है।

तापमान में लगातार वृद्धि

                ग्लोबल वार्मिंग धरती के वातावरण के तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी है। हमारी धरती प्राकृतिक तौर पर सूर्य की किरणों से उष्मा प्राप्त करती है। ये किरणें वायुमंडल से गुजरती हुईं धरती की सतह से टकराती हैं और फिर वहीं से परावर्तित होकर पुनः लौट जाती हैं। जबकि ग्रीनहाउस गैसें धरती के ऊपर एक प्रकार से एक प्राकृतिक आवरण बना लेती हैं। यह आवरण लौटती किरणों के एक हिस्से को रोक लेती हैं, जो धरती के वातावरण को गर्म बनाए ररवती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण सूर्य की अधिक किरणों को रोकने लगता है, जो ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव का कारण बनता है। जबकि मनुष्यों, प्राणियों और पौधों के जीवित रहने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्शियस तापमान आवश्यक है।

ग्लोबल वार्मिंग का कारण

                ग्लोबल वार्मिंग के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार तो मनुष्य और उसकी गतिविधियां (एक्टिविटीज ) ही हैं। अपने आप को इस धरती का सबसे बुद्धिमान प्राणी समझने वाला मनुष्य अनजाने में या जानबूझकर अपने ही निवास स्थल को समाप्त करने पर तुला है। मनुष्य जनित गतिविधियों से कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन, नाइट्रोजन आक्साइड इत्यादि ग्रीनहाउस गैसों की मात्र में बढ़ोतरी हो रही है, जिससे इन गैसों का आवरण सघन होता जा रहा है। यही आवरण सूर्य की परावर्तित किरणों को रोक रहा है, जिससे धरती के तापमान में वृद्धि हो रही है। जंगलों का बड़ी संख्या में विनाश और वाहनों, हवाई जहाजों, बिजली संयंत्रें, उद्योगों से अंधाधुंध होने वाले धुआं, बिजली के उत्पादन के लिए जीवाष्म ईंधन के जलने पर उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड  और एयरकन्डीसनर, रेफ्रीजरेटर्स, अग्निशामकयंत्रें इत्यादि में इस्तेमाल की जाने वाली गैसें आदि की वजह से कार्बन डाइऑक्साइड  में बढ़ोतरी हो रही है। जो ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को बढ़ा देती है। यह धरती के ऊपर बने एक प्राकृतिक आवरण अर्थात ओजोन परत को नष्ट करने का काम करती है।

ग्लोबल वार्मिंग को कम करना

साथ ही इससे गर्मी व ठंड में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो सकती है, इसके लिए लोगों को एयर कंडिशनिंग व बिजली का कम इस्तेमाल करना चाहिए। पेट्रोल, डीजल और बिजली का उपयोग कम करें, जंगलों की कटाई को रोकें, अधिक से अधिक पेड़ लगाएं, अंधाधुंध औद्योगीकरण से बचें। जंगलों के संरक्षण पर बल दें, पवन ऊर्जा सौर ऊर्जा और पनबिजली पर ध्यान दिया जाए, मानवीय श्रम पर विचार करना होगा। वाहनों में से निकलने वाले धुएँ का प्रभाव कम करने के लिये पर्यावरण मानकों का पालन करना होगा। जंगलों के संरक्षण पर बल देना होगा। अक्षय ऊर्जा के उपायों पर ध्यान देना होगा यानि अगर कोयले से बनने वाली बिजली के बदले पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और पनबिजली पर ध्यान दिया जाए तो वातावरण को गर्म करने वाली गैसों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

ग्रीन बनाना होगा

                हमें अपनी पृथ्वी को सही मायनों में ‘ग्रीन’ बनाना होगा। हम अपने आस-पास के वातावरण को प्रदूषण से जितना मुक्त रखेंगें, इस पृथ्वी को बचाने में उतनी ही बड़ी भूमिका निभाएंगे। विश्व जागृति मिशन इस संदर्भ में विविध प्राकृतिक प्रयोगों द्वारा लम्बे समय से जन जागरूकता में जुटा हैं, आप भी सहभागीदार बनें।

Thursday, 7 July 2022

गुरु पूर्णिमा परस्पर सूक्ष्म आदान-प्रदान का पर्व



 

गुरु पूर्णिमा परस्पर सूक्ष्म आदान-प्रदान का पर्व

दुनिया में सबसे बड़ा रिश्ता कौन सा है ?

दुनिया में सबसे बड़ा रिश्ता ‘गुरु’ और शिष्य का है। गुरु के साथ रिश्ता निभ सका और गुरु के प्रति शिष्य की निष्ठा और श्रद्धा जग सकी, तो बदलाव की बड़ी क्रांति होती है। गुरु शिष्य के बीच आध्यात्मिक रिश्ता जगाने का सर्वश्रेष्ठ दिवस है गुरुपूर्णिमा। गुरु पूर्णिमा को ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहते हैं। कथानक आता है कि महर्षि वशिष्ठ के पौत्र व महर्षि पराशर के पुत्र ‘वेदव्यास’ बाल्यकाल से ही तप व वेद विस्तार में जुट गये थे। वेदव्यास के जीवन में विद्वता, परमभक्ति एवं आध्यात्मिक गुरुत्व जगने के कारण ही आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा का नाम व्यास पूर्णिमा पड़ा। इसीलिए यह गुरु धारण करने का पवित्रतम दिवस है। गुरु-शिष्य परम्परा से जुड़ा दिव्य अवसर है गुरुपूर्णिमा। कहा जाता है गुरुपूर्णिमा के अवसर पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियां गुरु में प्रकट होती हैं, जिसके सहारे शिष्य में प्रगाढ़ श्रद्धा-भक्ति, शक्ति जागती है, दीक्षा अनन्तगुणा होकर अंकुरित होती है और शिष्य के सौभाग्य का उदय होता है। गुरु द्वारा प्राप्त साधन से शिष्य के रोग कटते हैं, समस्याएं सुलझती हैं, प्रायश्चित पूरा होता है आध्यात्मिक उत्थान होता है और परिवार में सुख शांति समृद्धि की वर्षा होती है।

योग्य गुरु व योग्य शिष्य से बनें इतिहास

                योग्य गुरु व योग्य शिष्य के इस मिलन से इतिहास में महान घटनायें घटी हैं। जीवन में महान रूपातंरण हुए हैं।

1.       चाणक्य और चंद्रगुप्त,

2.       रामानन्द और कबीर,

3.       समर्थ गुरु रामदास एवं छत्रपति शिवाजी,

4.        विश्वामित्र-श्रीराम,

5.       श्रीकृष्ण और अर्जुन,

6.        रामकृष्ण परमहंस एवं स्वामी विवेकानन्द

 आदि का मिलन यही तो है। यह मिलन बताता है कि किसी योग्य गुरु के पास शिष्यत्व की योग्यता रखने वाला एक व्यक्ति ही समाज के नवनिर्माण के लिए बहुत है। समर्थ गुरु एक साधारण से इंसान को भी ऐसा रूप दे सकता है कि वह सारे संसार में पूजनीय बन जाये। इसीलिए गुरु को शिष्य के अंदर सुप्त पड़ी शक्तियों का उद्घाटक कहते हैं।

दुनिया को अपने सद्गुणों से झुका लेते हैं जिनके ?

                परमात्मा व गुरु की कृपा से जिन व्यक्तियों के अन्तःकरण निर्मल होते हैं, वे दुनिया को अपने सद्गुणों से झुका लेते हैं। गुरु कृपा जब भी जीवन में उतरती है, सबसे पहले शिष्य के जीवन में विनम्रता जगाती है। सज्जनता, शालीनता, शांति रूपी क्रांति घटती है, फिर अंदर से भक्ति की लहर जगती है, धर्म में रुचि बढ़ती है। यही धीरे धीरे समाज में विस्तार पाती है। लोककल्याण के मार्ग खुलते हैं, भक्ति, ज्ञान व वैराग्य की कल्याणकारी चेतना स्थापित होती है। इस प्रकार गुरु के सदप्रयास से जीवन रूपी बुझे दीपकों में ज्योति जल उठती है, फिर ज्योति से ज्योति जलने वाली फ्अग्निना अग्निं समिध्यते।य् जैसी अनन्तकालीन परम्परा चल पड़ती है।

गुरु’ सत्पुरुष है

                ‘गुरु’ सत्पुरुष है, इसलिए संतगण शिष्य को गुरु के निकट रहने की सलाह देते हैं। गुरु के समीप रहना, गुरु आश्रम में सोना, बैठना, चलना, उसके चिंतन में खोना, गुरु की धारणा में निमग्न रहना, गुरु सत्संग, स्वाध्याय, गुरु निर्देशित ध्यान, गुरु आदेशित सेवा में जीवन को प्रतिपल लगाये रखना परम उपलब्धि माना जाता है। पर जीवन में आत्म ज्योति जगाने के लिए दो बातें इससे भी महत्वपूर्ण हैं, प्रथम है योग्य गुरु की खोज व पहचान, दूसरा मिले हुए गुरु पर श्रद्धा को टिकाये रखना। वास्तव में सद्गुरु की खोज और उसकी प्राप्ति के लिए अंतःकरण में शिष्यत्व महत्वपूर्ण है। जिस स्तर का हमारे अंदर का शिष्य भाव होगा, उसी उच्चता के गुरु की हमें प्राप्ति होगी। वैसे भी राम को पाने के लिए हनुमान स्तर की शिष्य भावना भी आवश्यक है। आध्यात्म रामायण में जिक्र है राम के दल में अनेक लोग थे, पर सभी राम की निजता के अनुरागी थे, जबकि हनुमान को राम से अधिक ‘राम का काज’ प्रिय था। वास्तव में किसी का सानिध्य लाभ स्वीकार करना सामान्य है, लेकिन उसका आदेश शिरोधार्य करना बड़ी बात है। हर परिस्थिति में आदेश गुरु का ही शिरोधार्य हो सकता है, दूसरे का नहीं। हनुमान जी ने राम को गुरु रूप में वरण किया, तो राम साक्षात गुरु रूप में ही उन्हें मिले थे। परिणामतः हनुमान में राम पूरी तरह उतर आये, हनुमान राममय हो गये और आज तक गुरु कृपा की ज्योति से ज्योति जलती आ रही है।

गुरु पूर्णिमा श्रद्धा जागरण का पर्व है

                हनुमान साहसी थे, सद्संकल्प एवं समर्पण के धनी थे, लेश मात्र का उनमें कर्तृत्व का अभिमान नहीं था। प्रभु स्मरण एवं प्रभु समर्पण ही उनके जीवन का सार था। इसी समर्पण के बल पर उन्होंने राम के प्रति अपनी श्रद्धा को पराकाष्ठा पर पहुंचाया। तो राम जैसे गुरु ने श्रद्धा के बल पर शिष्य हनुमान को उच्च आध्यात्मिक पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया। परिणामतः गुरु शिष्य एकाकार हो उठे। इससे स्पष्ट है कि जैसे पात्र यदि निर्वात हो तो उसमें कुछ रख पाना असम्भव है। ठीक उसी प्रकार शिष्य की श्रद्धा उसे निर्वात होने से बचाती है। श्रद्धा के सहारे गुरु शिष्य में सबकुछ उड़ेल देता है।

श्रद्धा होती है अगाध

 शिष्य, गुरु व गुरुपूर्णिमा तीनों एक स्थान पर मिलकर श्रद्धा को ही तो अगाध करते हैं, इसलिए गुरुपूर्णिमा श्रद्धा जागरण का पर्व कहलाता है। गुरुपूर्णिमा पर गुरु और शिष्य दोनों में परस्पर कारण स्तर की निकटता बढ़ती है, इस समय गुरु शिष्य के बीच आध्यातिमक आदान-प्रदान बढ़ जाता है, साथ ही इस समय गुरु की ओर जो भी कुछ जिस भावना से प्रेषित करते हैं, वह शिष्य को अनन्तगुना होकर वापस भी मिलता है। गुरुदीक्षा के पीछे यही चमत्कार कार्य करता है। ‘गुरु’ अन्दर से उमड़ पड़ता है और दोनों के बीच का यह सूक्ष्म आदान-प्रदान सदा-सदा के लिए अमर बन जाता है। गुरु-शिष्य सहित सम्पूर्ण राष्ट्र कृतकृत्य हो जाता है। ऋषियों द्वारा निर्देशित इस पवित्र अवसर को न खोते हुए आइये गुरुपर्व उठायें, दूसरों का दुःख दूर करने की अवस्था पायें जब-जब ऐसा हुआ है, युग ने करवट लिया है, गली-सड़ी परम्पराएं स्वतः मिटी हैं।