हर पल भगवान विट्ठल की अनुभूति में जीने वाली : संत मुक्ताबाई
सनातन परम्परा को आत्मसात
करने वाली यह भारत भूमि संतों के प्राकट्य की दृष्टि से अत्यधिक उर्वर भूमि है। सनातन
हिन्दू धर्म की मान्यता वाला वह कोई बड़ा समूह हो अथवा छोटा, वह किसी भी जाति-वर्ग से सम्बंध क्यों न रखता हो, यहां के हर समाज ने उच्च स्तरीय संतों को जन्म
दिया है। सनातन धर्म की इसी संत परम्परा में एक महत्वपूर्ण कड़ी जुड़ती है संत
मुक्ताबाई की।
संत ज्ञानेश्वर व् संत मुक्ताबाई
थे सगे बहिन-भाई
वारकरी संप्रदाय की प्रमुख
संत मुक्ताबाई प्रसिद्ध संत ज्ञानेश्वर जी
से रिश्ते में सगे बहिन-भाई का संबंध था। भगवान् विट्टòलनाथ के अनन्य उपासक इनके पिता विट्टòल पंत व माता रुक्मिणी बाई ने ‘‘विवाह संन्यास’’ जीवन के पक्षधर थे, लेकिन अपने सदगुरु की
आज्ञा से उन्होंने गृहस्थ आश्रम अपनाया। जिनसे मुक्ताबाई सहित कुछ चार भाई-बहिन
निवृत्ती नाथ, सोपान नाथ, ज्ञानेश्वर और संत मुक्ताबाई का जन्म हुआ। इन
चारों भाई-बहनों का वारकरी संप्रदाय के
महत्त्वपूर्ण संतों में स्थान प्राप्त है।
संत ज्ञानदेव ने मुक्ताबाई
को दीक्षित किया
संत ज्ञानेश्वर की बहन मुक्ताबाई बचपन से ही
आध्यात्मिक जीवन एवं ईश्वर चिंतन से जुड़ी विचारों वाली नारी थीं। मुक्ताबाई कम आयु
में ही बौद्धिक एवं साधनात्मक दृष्टि से गहराई में उतर चुकी थीं। इसे देखकर
प्रसिद्ध संत ज्ञानदेव ने मुक्ताबाई को दीक्षित करके उन्हें संत परम्परा से जोड़ा। मुक्ताबाई
का योगाभ्यास में गहरी पैठ बनती गयी और धीरे धीरे वे अपने आध्यात्मिक जीवन से
ओतप्रोत विचारों के चलते समाज में प्रतिष्ठा पाने लगीं। आगे चलकर आपने अपने सगुण
प्रेम भक्ति को उच्च कोटि तक पहुंचाकर अद्वैत की गहरी अनुभूति वाली संत बन गयी। मुक्ताबाई
द्वारा लिखी हरिपाठ, ताटीचे अभंग जैसी मराठी रचनायें आज भी लोगों के
लिए नित्य पाठ का विषय बनी हुई हैं।
कौन कच्चा है, कौन पक्का
कथानक आता है कि एक बार मुक्ताबाई, ज्ञानेश्वर, नामदेव आदि संतगण तीर्थयात्र के दौरान गोरा कुम्हार के घर
ठहरे। उनके यहां पका या कच्चा वर्तन है, यह समझने वाली थापी पड़ी थी, जिसे देखकर मुक्ताबाई
गोरा कुम्हार से थापी के कार्य करने का ढंग समझने लगीं। गोरा कुम्हार ने जब बताया
कि थापी से घड़े को ठोक कर उसका कच्चा-पक्का होना देखा जाता है। यह सुनकर मुक्ताबाई हंसती हुई बोली कि ‘हम सबको भी इससे ठोक कर बताओ कि कौन कच्चा है,
कौन पक्का। गोरा कुम्हार पहुंचे हुये साधक थे,
उन्होंने मुक्ताबाई का संकेत समझते हुए कहा
क्यों नहीं, अभी बताता हूँ।
गोरा कुम्हार ने एक एक के
विषय में बताते हुए नामदेव जी से कहा तुम अभी कच्चे हो। इस बात से साधक नामदेव
बुरा मान गये। क्योंकि नामदेव तब तक गुरुदीक्षा नहीं लिये थे, गोरा कुम्हार ने कहा, ‘नामदेव! तुम भक्त हो, पर गुरु की शरण में जाओगे तब ही पक्के बनोगे।’
गुरुकृपा से प्राप्त की भगवान
विट्ठल की उपस्थिति
कहते हैं तब संत मुक्ताबाई ने गुरु महिमा का बखान-गान किया। यहीं से उनमें गुरु के प्रति लौ जगी, फिर स्वयं विट्टòल जी की प्रेरणा से नामदेव जी ने विसोबा खेचर को अपना गुरु बनाया और शांत मन से निज स्वभाव में स्थित होने लगे।
गुरु ही संत मुक्ताबाई के जीवन आधार थे, गुरुकृपा से ही वे ऐसी साधिका बनीं, जिन्हें हर क्षण अपने चारों ओर भगवान विट्ठल की उपस्थिति अनुभव होती थी। साधना और लोक कल्याण में जीवन लगाते हुए महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में गोदावरी नदी के तट पर स्थित आपेगाँव में जन्मी इस संत मुक्ताबाई ने तापी नदी के तट पर अपने शरीर का त्याग कर परमसत्ता में विलीन हो गयीं। ऐसी संत साधिका को बारम्बार नमन है।

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