Friday, 30 October 2020

जन-जन को बलिदान भाव से जोड़ती भगवद्गीता



योग की बात आते ही व्यक्ति पद्मासन लगाकर नाशाग्र ध्यान की बात सोचने लगता है। यद्यपि यह भी योग की एक पद्धति है, लेकिन यह ऐसी सर्वजनीन नहीं है कि आम व्यक्ति भी इस अवस्था को पाकर जीवन को व्यावहारिक स्तर पर जी सके। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से श्रीमद्भगवद गीता में आम जनमानस को बलिदानी भाव के साथ निज स्वभाव में जीने की प्रेरणा से जुड़े योग का संदेश देते हुए कहते हैं। तपस्वियों, शास्त्र ज्ञानियों और सकाम कर्म करने वालों की अपेक्षा ‘योगी’ श्रेष्ठ माना जाता है, इसलिए हे अर्जुन! तू ‘योगी’ बन। अपने अंतःकरण से जो मुझको निरंतर स्मरण (दिव्य प्रेमाभक्ति) करता है, ऐसा मेरे द्वारा परम-योगी माना जाता है। आइये! योगियों की परिभाषा को गहराई से समझे हैं-

विपरीत परिस्थितियों में अविचलताः

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्

सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्

अर्थात् हे पार्थ वे क्षत्रीय सुखी हैं, जिन्हें संयोग से युद्ध लड़ने का अवसर मिलता है। युद्ध क्षत्रियों के लिए स्वर्ग का द्वार है। न्याय के लिए युद्ध में ही उसका गर्व और गौरव है। अगर वे युद्ध जीते अथवा युद्ध में लड़ते हुए शरीर समाप्त हो जाए, तो भी उसके लिए स्वर्ग ही है। वास्तव में श्री कृष्ण का दिया संदेश विश्व मानवता के लिए है, जिसमें श्रेष्ठतम उच्च ऐसे व्यक्तित्व खड़े करना था, जो किसी भी विपरीत परिस्थितियों का अपने जीवन संघर्षों से सामना करे घबराएं नहीं। उसे जीवन का एक सुंदर अवसर मानें। पूज्य सुधांशु जी महाराज कहते हैं-जो लोग कठिनाई में अवसर देखते हैं, वे ऊंचाई पर पहुंचा करते हैं। इन परिस्थितियों में ही स्वास्थ्य पर ध्यान जाता है, मस्तिष्क का नवीनीकरण होता, प्राण शक्ति को प्रबलता मिलती है, बेहतरीन योजनाएं बनती हैं। इस प्रकार अपने को बेहतर करने, मुश्किलें आसान बनने वाले। असली कर्म योद्धा का अवसर वाला व्यक्तित्व निखरता है। यहां भगवान श्री कृष्ण युद्ध लड़ने को भी अवसर इसीलिए बताते हैं, क्योंकि जीवन में हर पल युद्ध ही तो चल रहा होता है।’’

अपयशी कौनः

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सघ्ग्रामं न करिष्यसि

ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमावाप्स्यसि

जबकि धर्म युद्ध को नहीं लड़ने वाला अपने कर्तव्य से पतित हो, स्वधर्म की कीर्ति खोकर पाप को प्राप्त होता है। वास्तव में योद्धाओं के बीच एक अच्छा योद्धा साबित होने में कीर्ति है। आश्चर्य कि अर्जुन जैसा महारथी जिसने पाश्वपत अस्त्र लेने के लिए बड़ी कठिन तपस्या की हो, शिव जी के साथ भी युद्ध करने के लिए खड़ा हुआ हो, ऐसा योद्धा आवश्यक युद्ध के समय हृदय की दुर्बलता बस भावावेश में आकर भिक्षा माँगकर खाने, जंगल जाकर बसने की बात करे, तो उसके इस भाव को उसे उसका असली स्वभाव कैसे माना जा सकता है। स्वभाव के विपरीत होने के कारण ही भगवान श्रीकृष्ण इसे अकीर्ति वाला कर्म कहते हैं। भगवान अर्जुन से कहते हैं ‘‘ततः स्वधर्म कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि’’ कि तुम अपने स्वधर्म को छोड़ दोगे तो अपनी कीर्ति को मारकर बड़े पाप के गर्त में गिर जाओगे। संसार के हर व्यक्ति को हर क्षण ऐसे ही एक कृष्ण की जरूरत पड़ती है।

वास्तव में गुण कर्म स्वभाव से युक्त हर व्यक्ति का एक स्वधर्म होता है। जन्म भी इसी स्वधर्म अर्थात कर्म और संस्कार के आधार पर प्राप्त माना जाता है। आगे व्यक्ति जिन संस्कारों के साथ पलता है, वही उसका वर्ण बनता है। वह संस्कार ही उसके सबकॉन्शिस माइण्ड में स्वभाव बनकर उसके चित्त में अंकित हो उस व्यक्ति का एक गुणधर्म बनता है। इस गुणधर्म से व्यक्ति अलग नहीं जा सकता, आदतें उसको खींच कर बार-बार वहीं लाएंगी ही। श्री कृष्ण कहते हैं कि गुण कर्म स्वभाव के अनुसार जो व्यक्ति के दायित्व हैं, उनसे भागना सबसे बड़ा पाप कर्म हैं।

हर बलिदानी योगीः

द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सूर्यमंडल भेदिनौ।

परिव्राट योग युत्तफ़श्च रणे चाभि मुखो हतः।।

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-दो लोग इस दुनिया में सूर्य मण्डल का भेदन करते हुए ब्रह्म मण्डल तक पहुंचते हैं, एक योगी अर्थात् ऐसा व्यक्ति जो संसार से विरत्तफ़ होकर अपने साधना द्वारा ब्रह्म से अपना सम्बन्ध जोड़कर जीवन व्यतीत करता है। अर्थात् योगाग्नि में अपने आप की आहुति देने वाला दूसरा वह जो रण में नियमों, अनुशासनों का पालन करते हुए अपने देश व मानव धर्म के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर देता है। कहते हैं बलिदान भाव से प्राणों को छोड़ने वाले लोग सूर्य मण्डल का भेदन करते हुए ब्रह्म मण्डल तक पहुंच जाते हैं और स्वर्ग के अधिकारी बनते हैं। दूसरे शब्दों में कि ‘‘जो व्यक्ति अपने तन-मन-भाव-बुद्धि-चेतना की कर्मशीलता द्वारा जीवन की सार्थकता सिद्ध करते हैं, वह योगी ही होते हैं।

अर्थात् किसी देश को स्वतंत्र कराने, शीर्ष तक पहुंचाने में जो लोग नींव का पत्थर बनकर सर्वस्व बलिदान देते हैं, वे योगी कहलाते हैं। विराट टिका हुआ भवन उन्हीं के प्राणों की शक्ति पर टिका होता है। इसीलिए इन नींव के पत्थरों की प्रार्थना हर दिन आवश्यक है। इससे ऋषियों का आशीर्वाद बलिदानी पुरुषों का आशीर्वाद, बरसता है और परिवार में संस्कार और संस्कृति स्थिर होती है। पितरों, गुरुजनों के आदर्शों और धर्म, जीवन के नैतिक मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए लोगों ने  अपना पूरा जीवन लगा दिया। ये सभी बलिदानी हैं।

यही असली योग है। योग में असफल हुआ मनुष्य स्वर्ग आदि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर उनमें अनेकों वर्षों तक जिन इच्छाओं के कारण योग-भ्रष्ट हुआ था, उन इच्छाओं को भोग करके फिर सम्पन्न सदाचारी मनुष्यों के परिवार में जन्म लेता है। अथवा स्थिर बुद्धि वाले विद्वान योगियों के परिवार में जन्म लेता है, किन्तु इस संसार में इस प्रकार का जन्म निःसंदेह अत्यन्त दुर्लभ है।

हे कुरुनन्दन! ऐसा जन्म प्राप्त करके वहां उसे पूर्व जन्म के योग संस्कार पुनः प्राप्त हो जाते हैं और उन संस्कारों के प्रभाव से उसके परमात्मा रूपी परम सिद्धि को प्राप्त करने के उद्देश्य फिर से प्रारम्भ हो जाते हैं।

पूर्व जन्म के अभ्यास के कारण वह निश्चित रूप से परमात्मा पथ की ओर स्वतः ही आकर्षित हो जाता है। ऐसा जिज्ञासु ‘योगी’ शास्त्रों के अनुष्ठानों का उल्लंघन करके भी योग में स्थित हो ही जाता है।



Monday, 26 October 2020

प्रवृत्ति नहीं निवृत्ति है सुख का द्वार | Gita Updesh - 155 | Dr Archika...

योग से ऑफिस का तनाव दूर करें


 

योग से ऑफिस का तनाव दूर करें

आजकल जो लोग व्यस्तता के कारण अपने स्वास्थ्य पर ज्यादा समय नहीं दे पाते हैं, वे अपने दैनिक जीवन में यौगिक क्रियाओं से अपने शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। ये क्रियाएं बहुत ही आसान और कम समय में की जा सकती हैं। इसलिए इसे अपने कार्यालय में भी कर सकेते है। ये हमारे शरीर के श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र, रक्तसंचार तंत्र की कार्यक्षमता को बढ़ती है। इन्हें करने के लिए मात्र दस मिनट का समय चाहिए। खाना खाने के दो घंटे बाद इसे किया जा सकता है।

                आज सभी दफ्रतरों में कम्प्यूटरों पर कार्य किया जा रहा है। कई घंटे लगातार कम्प्यूटर पर काम करने से हमारी आंखों पर दबाव पड़ता है। जिससे आंखें कमजोर हो जाती हैं।

आंखों से सम्बन्धित व्यायाम

                * कुर्सी पर सीधे बैंठे। पीठ की मांसपेशियों को ढीला छोड़ दें, छत की तरफ देखें, फिर पलकों को धीरे-धीरे नीचे लाकर फर्श की ओर देखें। इस क्रिया को 10 बार करें।

                * गर्दन को हिलाए बिना आंखों को दस बार घड़ी की दिशा में और दस बार घड़ी की विपरीत दिशा में आराम से घुमाएं।

                इस क्रियाओं को करने के बाद दोनों हाथ की हथेलियों को आपस में रगढ़कर आंखों के ऊपर रखें। इससे आंखों की थकान दूर होती है और आंखों की मांसपेशियां पुष्ट होती हैं, जिससे आंखों का रक्त संचार ठीक हो जाता है।

गर्दन से सम्बन्धित व्यायाम:

                * गर्दन हमारे शरीर का एक अहम् अंग है। गर्दन झुकाकर लगातार काम करने से या गलत ढंग से बैठकर काम करने से गर्दन अकड़ जाती है और इसमें दर्द होने लगती है। स्थिति बिगड़ने से थॉयरायड ग्रंथि की कार्य प्रणाली में खराबी आने लगती है।

                * कुर्सी पर सीधे बैठ जाएं, छत की ओर देखते हुए गर्दन को पीछे की तरफ झुकाएं। धीरे-धीरे गर्दन को सीधा करते हुए आगे की तरफ इतना झुकाएं जिससे ठुड्डी गले के निचले भाग को छूने लगे। इस क्रिया को दस बार कर सकते हैं। अगर गर्दन में जकड़न और दर्द हो तो गर्दन झुकाने वाली क्रिया नहीं करनी चाहिए।

                इस क्रिया से गर्दन में पड़ी झुर्रियां कम हो जाती है। इससे थॉयरायड ग्रंथि भी अपनी कार्य प्रणाली सुचारू रूप से कार्य करने लगती है।

कंधों से सम्बन्धित व्यायाम:

                * कम्प्यूटर के सामने कई घंटे बैठने से आंखों पर ही नहीं बल्कि कंधों पर भी दबाव पड़ने लगता है। इसको समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो कंधों का लचीलापन समाप्त हो जाता है। उसमें अकड़पन आने लगती है।

                * कुर्सी पर सीधे बैठ जायें। दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाकर इण्टरलॉक कर लें। इसके बाद सांस भरते हुए दोनों हाथों को सिर के ऊपर तान दें। कुछ समय तक सांस को धीरे-धीरे छोड़ते हुए, हाथ को नीचे ले जाकर शरीर को ढीला छोड़ दें। इस क्रिया को दस बार करने से कंधे का तनाव और आर्थराइटिस रोग दूर होता है।

पाचन तंत्र के लिए व्यायाम:

                * कुर्सी पर सीधे बैठ जायें, टांगों को सीधे रखते हुए एड़ियों को जमीन पर टिका दें। हाथों को ऊपर की ओर उठाएं और धीरे-धीरे जितना हो सके झुकाते जाएं। झुकाने की इस प्रक्रिया में अपने पेट को बार-बार संकुचित करें। कुछ सेकेण्ड तक इस अवस्था में रहने के बाद हाथों को ऊपर उठाकर नीचे लाएं और शरीर को ढीला छोड़ दें। यदि मेरुदण्ड की समस्या है तो इस व्यायाम को न करें।

                पाचन तंत्र, पैंक्रियाज, जिगर और हृदय की कार्यक्षमता बढ़ाने के साथ इससे पीठ की अकड़न दूर हो जाती है।

                तनाव और थकान दूर कर तन-मन को सुकून देने वाले इस व्यायामों का पूरा फायदा लेने के लिए हमें अपने खानपान पर विशेष ध्यान देना होगा। मौसमी फल, हरी सब्जी, अंकुरित अन्न, दूध, दही आदि का सेवन अवश्य करें। मैदे से बनी चीजें, मिर्च, मसाला, घी, तेल तथा शीतल पेय पदार्थों का प्रयोग कम करें।

                संतुलित आहर तथा व्यायाम से व्यक्ति अपने शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है। व्यकि् को हमेशा सकारात्मक सोच रखना चाहिए।


Saturday, 24 October 2020

शक्ति के संचयन एवं प्रदर्शन का पर्व दशहरा

 


               भारतवर्ष प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों का देश रहा है। इस देश में अनेक चमत्कार हुए हैं। ऋषि-मुनि तपस्या में इतने लीन हो जाते थे कि उनको खाने-पीने, सर्दी-गर्मी-बरसात तथा जंगली जानवरों की भी कोई चिन्ता नहीं होती थी। वे इतनी घोर तपस्या करते थे कि भगवान को भी उनकी तपस्या के आगे झुकना पड़ता था तथा भगवान उनके सामने प्रकट होकर उन्हें वरदान देते थे। यह इस देश में इसलिए सम्भव हो सका, क्योंकि यहाँ लोगों में सत्यता, कत्र्तव्यपरायणता और परोपकार की भावना कूट-कूट भरी हुई है। आज भी जो लोग सच्चे हृदय से भगवान पर श्रद्धा रखते हुए उनकी भक्ति में तल्लीन होते हंै, उनका आत्मबल बढ़ जाता है और वे दिव्यता को प्राप्त कर लेते हैं। उनके मुखमण्डल में यह दिव्यता साफ झलकती है।


अनेकता में एकता समाए हुए है भारत देश:


भारत एक ऐसा देश है जहाँ पर विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परम्पराओं को मानने वाले लोग रहते है। इसलिए भारत में अनेकता में एकता दिखाई देती है।

भारत मेले और उत्सव के लिए विश्व भर में विख्यात है। यहाँ पर प्रत्येक धर्म के लोग पर्वों को बड़े हर्षाेल्लास के साथ मनाते हैं तथा एक दूसरे के त्योहारों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

असत्य पर सत्य की विजय:


भारत के प्रत्येक भाग में दशहरे का त्योहार बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। भारत सरकार ने इस उत्सव पर राजपत्रित अवकाश घोषित किया है। यह उन दिनों की बात है जब लंका के असुर राजा रावण का अत्याचार चारों तरफ इस कदर बढ़ गया था कि वह अपने आपको भगवान समझने लगा था। इसी अहंकार के कारण रावण ने प्रभु श्रीराम की आर्या माता सीता का हरण कर लिया था और उन्हें वापस देने के लिए तैयार नहीं था। भगवान राम माता सीता के वियोग में बहुत दुःखी हो गए थे। उन्होंने हनुमान की वानर सेना और लक्ष्मण के साथ मिलकर रावण को युद्ध में परास्त कर दिया था। इस उत्सव की शुरुआत हिन्दू धर्म के लोगों द्वारा उस दिन से हुई, जब भगवान श्रीराम ने लंका के राजा रावण को दशहरे के दिन मार गिराया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है।


पापों से मुक्ति का पर्व दशहरा:


इस पर्व को विजयादशमी के नाम भी जाना जाता है क्योंकि आश्विन शुक्ल दशमी को ही रावण का वध किया गया था। दशहरे के दिन को इतना शुभ माना जाता है कि प्राचीन काल के राजा भी इसी दिन विजय की प्रार्थना कर रणक्षेत्र के लिए प्रस्थान करते थे। दशहरे का पर्व दस प्रकार पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी जैसे अवगुणों को छोड़ने की प्रेरणा देशवासियों को देता है।


कृषि उत्सव पर्व दशहरा:


भारत कृषि प्रधान देश है। भारत के लोग धरती को धरती माता के नाम से पुकारते हैं। यह धरती से ही नर-नारी, पशु-पक्षी, जानवर आदि अपना जीवन-यापन करते हैं। यदि धरती नहीं होती को हमारा जीवन जीना असम्भव हो जाता। मनुष्य या किसी भी जीवन प्राणी को जीने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज अनाज, पानी, हवा, पेड़-पोधे और शुद्ध वातावरण है, जो हमें धरती से प्राप्त होता है। भारत का किसान अपने खेतों से सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी सम्पत्ति जब अपने घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का कोई ठिकाना नहीं रहता। वह इसे भगवान की कृपा मानता है और अपनी भावना प्रकट करने के लिए वह दशहरे के दिन पूजन करता है और भगवान को कोटि-कोटि धन्यवाद देता है।


दशहरा त्योहार को दुर्गोत्सव भी कहते है:


पूजनीय धर्मग्रन्थ रामायण में ऐसा लिखा है कि देवी दुर्गा को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए राजा राम ने चंडी होम कराया था। राजा राम युद्ध की देवी दुर्गा के भक्त थे, इसलिए राजा राम ने नौ दिनों तक देवी दुर्गा की पूजा की थी तथा दसवें दिन रावण को मारने का राज जानकर उस पर विजय प्राप्त की थी। रावण को मारने के बाद माता सीता को वापस पाया था। दशहरा को दुर्गोत्सव भी कहा जाता है क्योंकि उसी दसवें दिन माता दुर्गा ने भी महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था।


भारत के अनेक क्षेत्रों में रामलीला का आयोजन:


भारत में अधिकतर इलाकों में रामलीला का नाटकीय मंचन किया जाता है जिसे देखने के लिए नर-नारी, बूढ़े-बच्चे रामलीला का मंचन देखने के लिए जाते हैं और भरपूर मनोरंजन करते हैं। इस अवसर पर मेलों के आयोजन भी किए जाते हैं, जिनमें बच्चों के लिए झूले आदि लगाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त खाने-पीने एवं मनोरंजन हेतु अनेक प्रकार के स्टाॅल लगाए जाते हैं।


दशहरे पर विराट् मेले का आयोजन:


देश के विभिन्न इलाकों में दशहरे वाले दिन विराट् मेलों को आयोजन किया जाता है, इस दिन रावण, मेघनाथ एवं कुम्भकरण का पुतला जलाया जाता है। इस पुतले को आग के हवाले करने के लिए गणमान्य व्यक्तियों को बुलाया जाता है तथा उन्हीं के द्वारा पुतलों में आग लगाई जाती है और भारी मात्रा में आतिशबाजी की जाती है जिसे देखकर भारत के लोग आनन्दित हो उठते है। मेला देखने के लिए लोग अपने परिवार, दोस्तों के साथ आते हैं और खुले आसमान के नीचे मेले का भरपूर आन्नद लेते हैं। मेले में विभिन्न प्रकार की वस्तुएं, खिलौने, चूडियाँ, कपड़े, झूलने के लिए अनेक प्रकार के झूले, खाने-पीने के लिए अनेक प्रकार के व्यंजनों के स्टाल लगाए जाते हैं जिसमें सभी कुछ न कुछ खरीदते है और खाते-पीते है। लोग अगले दशहरे का इन्तजार करने के लिए अपने घर वापस खुशी-खुशी लौट जाते हैं।


निष्कर्ष:


आज के इस आधुनिक युग में हमारे चारों तरफ अहंकारी, विश्वासघाती, घूसखोर, दगाबाज, बलात्कारी और अपना हित साधने वाले लोग बहुत बड़ी संख्या में फैले हुए है। इसलिए आज जरूरत आन पड़ी है कि भगवान राम के आदर्शों पर चलते हुए सबसे पहले हम अपने अन्दर के रावण का अन्त करें । रावण रूपी मानव पर विजय पाने के लिए हमें पहले खुद राम बनना होगा। हम लोग बाहर रावण का पुतला तो जलाते हैं लेकिन अपने अन्दर रावणत्व को पालते हैं। जब भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की वह काल सतयुग था परन्तु आज कलयुग है जिसमें प्रत्येक घर में रावण मौजूद हंै।


इसलिए रावण पर विजय प्राप्त करने में अनेकों कठिनाइयों का सामने करना पडे़गा। प्रत्येक मनुष्य को इस दिन अपने अन्दर के रावण पर विजय प्राप्त कर हर्षोंल्लास के साथ इस त्योहार को मनाना होगा। जिस प्रकार अन्धकार का नाश करने के लिए एक दीपक ही काफी होता है, वैसे ही अपने अन्दर के रावण का विनाश करने के लिए एक श्रेष्ठ सोच ही काफी है। आज हमें अपने संस्कारों, ज्ञान, कत्र्तव्यपरायणता, ईमानदारी, लगन और अपनी इच्छा शक्ति से जितने भी गलत कार्य हैं, उनसे दूर रहकर इस समाज और राष्ट की सेवा करनी है। हमें अपने अन्दर पाप, काम, क्रोध, मोह, लोभ, घमण्ड, स्वार्थ, जलन, अहंकार, अमानवता और अन्याय को घुसने नहीं देना है और सत्कर्म की ओर अपने आपको ले जाना है।


Tuesday, 13 October 2020

State of Mind With Meditation



Our mind has two states – one is pure and the other one is impure. When one gets drawn towards the worldly web, they get stuck in its sadness, problems, and anxiety. When one absorbs all of those troubles, the mind starts turning impure and full of sadness. When the mind is in its impure state, one will get impure thoughts and it will disrupt their peace of mind. However, when one submits their mind to the peace and serenity of God, His grace (simran) helps the mind unwind and return to its pure state. To be at peace and be happy in the grace of God, is the ultimate objective of a spiritual person. The more you indulge in God’s grace, the more you are likely to walk on the path of enlightenment and embrace peace along with pure thoughts. Know that your mind is on the right path and is on the path of purification when you walk with God in your thoughts.


When your mind is distracted, despite being in God’s presence, it begins getting impure. It needs to be brought back to the center to be on the right path; to be at peace and be pure again. The thoughts one gets from their consciousness and awakening, the feeling of divinity, it all comes only when one reaches out to The Almighty with a pure heart, putting God first in all their work and thoughts. Then every action and thought get the light of the day in the name of God and for God; in remembrance of God and for the work of God. When one submits oneself at the feet of God entirely, and the thought of God is prime, one’s mind takes a purer form, going on the right path. When the mind is fully connected to God, know that the purification of the mind has begun.

Friday, 9 October 2020

Increase Immunity Lifestyle During Covid-19


 

The human body is made of panchbhoot tatva, and that is the reason our body needs sunlight, a touch of the earth, some deep breaths, some water to survive, and a  restful night. But in these apocalyptic times of the pandemic, everyone is worried about their family and their health, but unable to step out of their homes to enjoy most of it. We all are busy looking  for ways to improve our immune system so that we can keep this coronavirus at bay. But we also must be aware of the fact that immunity cannot be enhanced in just a few days, it takes time.

His Holiness Sudhanshu Ji Maharaj stresses the importance of the immune system and inner strength because both are essential to fight any disease. So here are some measures to cope with the on-going pandemic and what all we can do to improve our immunity:

1. Healthy diet: Unhealthy food choices lead to a weak immune system. A recent example is our neighbouring country- China, where people eat non vegetarian foods, we cannot even imagine hurting, and get sick  every now and then. To have better immunity, we need to consume more or less a vegetarian diet, boiled food, including sprouts. What’s  to be noted is that Vitamin C enriched grenn chutney should be an essential part of every meal

Other routines that can also be included in one’s daily lifestyle are gargles with lukewarm saltwater, drinking turmeric water (lukewarm) once a day, using aloe vera in an appropriate form, consuming gilloy kadha, eating raw black pepper mixed with honey, having some neem ras (juice of neem leaves) to name a few.

2. Proper Sleep: An adult person needs an undisturbed sleep of 6 hours, whereas infants and children need 8 to 10 hours’ sleep[1] , respectively[2] . One needs to be calm and happy, and absorb as much life energy as possible during sleep. Sound sleep helps us maintain a strong nervous system, improving our overall health.

3. Lifestyle: After diet and sleep comes the 3rd pillar of the human body, i.e., Lifestyle! One needs to sleep on time, wake up on time, and keep the body up and going to live a better life in the long run. One also needs to adopt a physical activity plan including 3 types of exercises daily:

a. Cardio – be it jogging, running, brisk walking, whatever suits your body and age, just go for it. It keeps you and your body active.

b. Yogasan – be open to any form of yoga that helps you keep going. It not only prevents you from many diseases but also prepares your body to fight infections. Start with stretching aasans which will improve your flexibility in the long run.

c. Pranayampranayam (breathing exercises) will help you boost your overall immune system. Include 3 basic Pranayams in your daily routine, Anulom Vilom, Kapalabhati, and Bhastrika. You can also add Ujjayi Pranayama and Agnisar Kriya Pranayama. But those with any gastric problem or recent surgeries should avoid doing the latter. 

While working on these 3 pillars of the body, one should keep some basic things in mind, like washing hands frequently with soap and water, not touching any public surface, refrain from touching your face repeatedly, to name a few.

Besides immunity the covid prevention guidelines are essential for all to follow. Everyone must practice social distancing and self-hygiene to protect themselves and their community from this vicious coronavirus. Follow the important safety guidelines being issued by the local public health authorities.

 

Wednesday, 7 October 2020

‘ध्यान’ का अर्थ विचारों का अंत

 


ध्यानधारणा के आगे की प्रक्रिया है। जब धारणा का अभ्यास करने वाला साधक मन को विशेष ध्येय पर स्थिर कर लेता है, तो उस प्रक्रिया को ध्यानकहते हैं। यह समाधि-सिद्धि के पहले की अवस्था है। कुछ उपनिषदों में ध्यानके विभिन्न स्वरूप बताये गये हैं।

मैत्रेयी और स्कन्द पुराण उपनिषद में ध्यानको मन की निर्विषय अवस्था बताया गया है। ध्यानं निर्विषयं मनः।

योग तत्वोपनिषद् में अपने इष्ट पर ध्यानकरने को सगुण ध्यान कहा गया है। इसके द्वारा सिद्धियां प्राप्त होती हैं। निर्गुण ध्यान को समाधिप्राप्त करने वाला माना गया है। योग-कुण्डलिनी उपनिषद् में संसार को नकारने की प्रक्रिया को ध्यानकहा गया है। महर्षि पतंजलि के अनुसार जहां चित्त लगाया जाय उसी में वृत्ति का लगातार चलना ध्यानहै। अर्थात् जिस ध्येय वस्तु में चित्त को लगाया जाय, उसी में चित्त का एकाग्रह हो जाना अर्थात् ध्येय मात्र की ही तरह की वृत्ति का प्रवाह बनना, उसके बीच में किसी भी दूसरी वृत्ति का न उठना ही ध्यानहै।

विश्व के विभिन्न भागों में ध्यानकी कई विधियां प्रचलित हैं। इनमें से कई में तो बहुत भिन्नता है। भावातीत ध्यान पर किये गये अनुसंधान के अनुसार ध्यान के साधक के व्यक्तित्व में मौलिक सुधार होता है।

विपसना ध्यान पद्धति मन एवं शरीर की क्रियाशीलता में वृद्धि करती है। इसके अभ्यास से मस्तिष्क तथा नाड़ी संस्थान की क्रियाशीलता बढ़ जाने से उस व्यक्ति में चैतन्यता के वृद्धि की सम्भावना रहती है। योग की आध्यात्मिक तथा स्वास्थ्य से सम्बन्धित उपयोगिता सिद्ध है।

 ‘ध्यानमें निहित है-मन का ऐसा गुण-धर्म जो पूरी तरह अवधान (चित्त की वृत्ति का निरोध) देश के लिए ऐसा मन जो पूरी तरह स्थिर, निश्चल हो सके। मन चंचल है, हमेशा भागता रहता है, सोचता रहता है। जो मन निरंतर बड़बड़ाता रहता है वह किसी भी चीज का प्रत्यक्ष बोध कैसे कर सकता है?

जो मन पुरी तरह से अवधानयुक्त है, केवल उसी मन में अवलोकन के लिए सम्पूर्ण ऊर्जा होती है, क्योंकि अवलोकन करने के लिए साधक में प्रबल ऊर्जा होनी चाहिए।

धार्मिक साधु-संत और अन्य लोग भी कहते हैं कि आप ऊर्जा को बर्बाद मत करिए। यदि आप अवधानयुक्त हैं तो यह ऊर्जा के समग्र संयुक्तीकरण का सवोत्कृष्ट रूप है। मन बिना किसी प्रयास के नितांत मौन हो सकता है, इसलिए ऐसा मन ऊर्जा से भरा होगा, इसमें कोई विकृति नहीं होगी।

 ‘ध्यानका अर्थ है­-विचारों का अंत हो जाना-तभी एक भिन्न आयाम प्रगट होता है, जो समय से परे है।


Monday, 5 October 2020

Guru: The Guiding Light of your Life!

 



It happens quite often, when one is thinking about God, trying to become one with the Almighty, thinking about good things, suddenly the mind starts wandering here and there. A wave of unwanted thought stirs the calm waters in your subconscious mind, you start thinking about worldly things, and get sidetracked. This is what maya (illusion of material world) does, distracts one from the right path.

But the person who never gets distracted for a moment, always seems engrossed in worshipping God, is a truly spiritual being. And those who are spiritual, always think about the Almighty feel that they are the ones worshiping God. In fact, it is God who has chosen them, and that is why one is able to continue the path of Parmatma praapti (finding the God). One does not get to choose the Guru, but the Guru chooses some pure souls as his disciples. There is chaos all around in this world and it is easy to get distracted without the guidance of a Guru. If one chooses to walk on the path shown by the Guru, then he is one of those pure souls chosen by the Almighty. Such a person is fortunate and must be grateful towards God and Guru both. Guru always looks after his disciples and never lets them face any disappointment in life.  The path of spirituality is so long that people get tired, but Guru keeps showing them the ray of hope and a reason to keep going.

Once Gautam Buddha was going somewhere with his disciple, Anand. On getting tired, they stopped for a moment and decided to ask somebody from the nearby village if they knew how long that journey was going to be. When Anand asked them, they said it is not that far and they just had to keep walking for a while. So Gautam Buddha and Anand walked and walked for two hours but couldn’t reach anywhere. When they saw some villagers nearby, Anand told Gautam Buddha, “Maybe the previous villagers were mistaken. Let me ask the people around here.” Even those people said, “don't worry, just keep walking. It is not that far. You are almost there.” Gautam Buddha continued his journey with Anand by his side. Soon twilight set in, but the journey became never-ending. Anand started feeling agitated now, thinking that people might be misguiding them by not telling them the truth. Then Gautam Buddha smiled and said, “They are not lying. They are trying to motivate us by keeping our hope alive. If they had not said what they did then do you think we could have walked so far?  

Similarly, the Guru keeps his disciples motivated by encouraging them to keep walking the long path of spirituality with unwavering courage. Walk a little and keep walking, you will reach the destination. This is Guru’s Grace and His Divine Power. The journey is very long, but one should not feel disappointed. If you are disappointed then you will never reach, and if you are full of hope then you will reach the ultimate destination in life. It is also important to adopt the teachings of your Guru, learn good qualities from wherever you can and keep moving ahead on your journey. Guru is the guiding light who shall guide you along this long path.