Friday, 28 August 2020

मौन ध्यान से खुलते हैं साधक के प्रज्ञा स्तोत्र

 


शब्द एक भौतिक पदार्थ है। शब्दों में मौन को प्रकट करना संभव नहीं है, अतः बुद्ध के शिष्य जब भी उनसे कोई प्रश्न पूछते थे, तो वे उन्हें ध्यान द्वारा अपने उत्तर स्वयं पाने का परामर्श देते थे।
बुद्ध तथा अन्य प्रवर्तकों के जीवन में ऐसा अनेक बार हुआ है जब उनके शिष्यों ने अपने गुरुओं के मौन में ही अपने प्रश्नों का उत्तर पाया है। बुद्ध ने ‘नागार्जुन’ को मौन रहते हुए एक फूल दिया और नागार्जुन को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया।

वास्तव में मौन ‘ध्यान’ के द्वारा व्यक्ति प्रज्ञा के स्तोत्र तक पहुंचता है। जहां पहुंचकर वह भौतिक जगत से प्राप्त अपने में संगृहीत ज्ञान और जानकारी से मुक्ति पा लेता है। शून्य की स्थिति में ही उसको स्तोत्र के शुभ एवं निश्चल स्वरूप से साक्षात्कार होता है, जो सत्य का स्वरूप है।

ध्यान में व्यक्ति मस्तिष्क के उस स्तोत्र तक पहुंच जाता

ध्यान में व्यक्ति मस्तिष्क के उस स्तोत्र तक पहुंच जाता है, जहां से प्रश्न जाग्रत होते हैं। बुद्ध का मानना था कि इसी स्तोत्र में उन प्रश्नों का उत्तर भी विद्यमान है। ध्यान में ही मनुष्य चेतन अवस्था की अपेक्षा अधिक संवेदनशील हो जाता है। इस स्थिति में वो दूसरे की कठिनाई को अनुकूलता में बदलते हुए उसकी सहायता को तत्पर होता है। किसी भी प्रश्न का सटीक उत्तर देने के लिए यह स्थिति बहुत कारगर होती है।

अतः इस स्तोत्र में पहुंचकर व्यक्ति प्रश्न का उत्तर पा लेता है। जिसे शब्दों की भौतिकता में प्रकट करने की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए बुद्ध शिष्यों को मौन साधना के लिए प्रेरित करते थे।
जैसे मछली सागर में रहती है, फिर भी सागर के अस्तित्व से वंचित रहती है। जैसे मृग के अंदर ही कस्तूरी की गंध (वास) होती है और वह उस सुगंध से मतवाला हो, उसे यत्र-तत्र खोजने का प्रयास करता है। ठीक वैसे ही हमारे मौन में, ध्यान में सभी प्रश्नों का उत्तर छिपा हुआ है। परन्तु हम बाहर खोजते हैं। वास्तव में जिस दिन हमें अपने मौन-ध्यान की अनुभूति होगी, तभी हमारे सभी प्रश्नों का समाधान संभव होगा। इस प्रसंग में बुद्ध और सारिपुत्र का एक उदाहरण प्रस्तुत है।

सारिपुत्र का एक साल तक मौन

बुद्ध के 80 महान शिष्यों में एक सारिपुत्र था, जो महान ज्ञानी था। जब वह बुद्ध के पास आया, तब उसके पास 5 हजार शिष्य थे। वह बुद्ध से बहस करने, उन्हें शास्त्रर्थ में हराने आया था, परन्तु जब वह बुद्ध के सामने आया, तो बुद्ध हंसे और कहा सारिपुत्र, तुम अधिक जानते हो, लेकिन तुम कुछ नहीं जानते। मैं यह जानता हूं कि तुमने बहुत ज्ञान इकट्ठा कर रखा है, लेकिन फिर भी तुम खाली हो। तुम मेरे पास मुझसे बहस करने और मुझे हराने आए हो, मैं यह भी जानता हूं।

यदि तुम वास्तव में मुझसे बहस करना चाहते हो, तो तुम एक वर्ष तक मेरी प्रतीक्षा करो। सारिपुत्र ने कहा एक वर्ष क्यों? बुद्ध ने कहा तुम एक साल मेरे पास मौन रहोगे। यदि तुम एक वर्ष तक मौन रह गए, तब तुम मेरे साथ बहस करना, क्योंकि जो मैं तुमसे कहने जा रहा हूं वह मौन से निकलेगा। तुम्हें इस छोटे से अनुभव की आवश्यकता है।

मैं जानता हूं सारिपुत्र कि तुमने जीवन में एक क्षण भी मौन का आनंद नहीं लिया। तुम ज्ञान से भरे हो। सारिपुत्र ने कहा ठीक है मैं एक वर्ष तक इंतजार कर सकता हूं। और वह वहां एक वर्ष तक मौन में बैठा और जब एक वर्ष बाद बुद्ध ने पूछा कि अब तुम मेरे साथ बहस कर सकते हो, मुझे हरा सकते हो। क्योंकि मैं तुमसे हारकर बहुत खुश होऊंगा। तब सारिपुत्र हंसा और उसने बुद्ध के चरण पकड़ लिए कहा कि आप मुझे दीक्षा दीजिए। अब मैं अपने को ही आपसे हार गया। मुझे अपने सभी प्रश्नों का उत्तर स्वयं में ही मिल गया। आप द्वारा निर्देशित मौन में मिल गया, ध्यान में मिल गया।

सभी प्रश्नों का एक मात्र समाधान मौन है

वास्तव में यही भारतीय ऋषियों, ज्ञानियों की विशेषता है। अतः स्तोत्र संवेदना और सत्य से साक्षात्कार के फलस्वरूप प्रत्येक प्रश्न का हर प्रज्ञावान उत्तर प्राप्त करने में सहज सफल हो जाता है। इसलिए हमारे सभी प्रश्नों का एक मात्र समाधान ध्यान है। वह स्तोत्र भी हमारे अंदर है, उसे कहीं बाहर से नहीं लाना है। उसे स्वयं के द्वारा स्वयं में ही खोजना है। खुद का परिष्कार करना है। आगे सब कुछ स्वतः घटित हो उठेगा।

 

Online Meditation Courses 

Immune Booster Program

Yogic Living Book

Kailash Mansarovar Yatra

No comments:

Post a Comment