Monday, 31 August 2020

इसलिए आवश्यक है मानव में देवत्व

 


मनुष्य में देवत्व के गुण जगें, मनुष्य मनुष्य की सही पहचान कर सके, सभी विचारों की सहिष्णुता अपनाएं, सत्य, प्रेम और अहिंसा में निष्ठा रखे, विश्वबंधुत्व, वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा को जीवन में धारण करें, यही तो है देवत्व का जागरण। मानव में परमात्मा का अंश है, जिसमें संपूर्णता के गुण एवं सम्पूर्ण ऊर्जाएं समाई हैं। इसी को आत्मा व परमात्मा के बीच का संबंध कहते हैं। एक शरीर से दूसरे शरीर में इस आत्मा का आवागमन जीवन की अमरता का द्योतक है। संत बताते हैं इस यात्र में आत्मा का एक योनि से दूसरे योनि में जाना शरीर के कर्मों पर निर्भर है। मानव के इनकर्मों को सही दिशा मिले यह हमारे देश के ऋषियों-संतों की अनन्तकालीन परम्परा है।

लोकधार्म जरूरीः

अर्जुन की आशंकाओं का निवारण करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने कर्म के तीन प्रकार बताते हुए कहा कि एक जन्मजात कर्म जो व्यक्ति को माता-पिता, परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य रूप में प्राप्त होते हैं। दूसरे प्रकार के स्वाभाविक कर्म हैं, जो व्यक्ति अपनी प्रकृति, प्रवृत्ति, संस्कारगत अभिरुचि, शिक्षा, अभ्यास, संग और आवश्यकता के अनुसार ग्रहण करता है। तीसरा है आपात कर्म। आपात कर्म जैसे देश पर संकट के समय देश की आवश्यकता अनुसार मानवता पर आयी आपदाओं के निवारणार्थ कदम उठाना, देश के रक्षार्थ युद्ध के लिए आपात् भर्ती में शामिल होना।

किसी महामारी के समय सरकार के निर्देशों के अनुसार सेवा के दायित्व निभाना आदि। राष्ट्रीय आपात की अवस्था में किसान, मजदूर, विद्यार्थी, शिक्षक, वकील, व्यापारी, लेखक, कवि, डाक्टर, नर्स, कम्पाउण्डर, सफाईकर्मी, चपरासी, अफसर सब राष्ट्रहित हेतु एक ही तरह के कर्म में तत्पर होकर लग जाते हैं। इसे लोकधर्म निर्वहन भी कहते हैं। यद्यपि भारतीय ऋषियों ने लोकहित से जुड़े कर्म को जीवन में अनवरत करते रहने पर जोर दिया है, ताकि परमात्मा का यह विश्व उद्यान सतत सुखी-समुन्नत बना रह सके। इस स्तर की भूमिका निभाने वाले भी देवत्वपूर्ण संत मनः स्थिति वाले व्यक्तित्व माने जाते हैं।

वापस लौटना होगाः

आज देवत्व जागरण की बड़ी जरूरत है। पर वैर-भाव, शत्रुता, घृणा एवं स्वार्थ में आकंठ लिप्त मनुष्य ने जैविक से लेकर परमाणु बम जैसे असंख्य हथियार आज जुटा लिए हैं। परिणामतः विश्व भर में फैली युद्धोन्माद, महामारी, संग्रह वृत्ति आदि ने मनुष्य की मनुष्यता को अप्रमाणित कर दिया है। लगता है जैसे मनुष्य को मनुष्यता व समाज की जरूरत ही नहीं। यह सब बहुत ही भयावह स्थिति है। मनुष्य में देवत्व को जगाये बिना यह सम्भव नहीं है। आज मनुष्य स्वयं ही एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। ऐसे में मनुष्य में इसलिए आवश्यक है मानव में देवत्व व्यवहार जगत विश्व को सर्वधर्म के रूप में अहिंसा को अनिवार्य रूप से स्वीकृति प्रदान कराना कैसे सम्भव है। भगवान बुद्ध,

महावीर, ईसा मसीह और महात्मा गांधी के अहिंसा धर्म को विश्व के हर तंत्र में न्याय एवं विधि व्यवस्था का अंग बनाने का संदेश ऐसा मनुष्य क्यों स्वीकार करेगा।

पशुवत व्यवहार क्यों?

एक और दुःखद पहलू कि आज मनुष्य अपने ही प्रियजनों, बंधु-बांधवों पर अमानवीय अत्याचार करने से नहीं हिचक रहा। वह परिवार के पवित्र प्रांगण से लेकर, शिक्षालय, धर्मस्थल, न्यायालय परिसरों में पशुवत व्यवहार करने पर उतारू है। मनुष्य अपराध, द्वेष, लोभ, मोह, भ्रष्टाचार, अत्याचार जैसी बुराई से नहीं चूकता। क्योंकि इन पापों के बीज मनुष्य में गहराई तक समाये हैं। ऐसे में मानव मन से पाप के बीज को पनपने से पूर्व नाश करने का उपाय खोजना होगा। इसके लिए उसे अपनी कमाई, अपनी आत्म आजादी, अपनी आत्म प्रसन्नता की ओर मोड़ना होगा। सच कहें तो प्रत्येक व्यक्ति हृदय से जानता है कि हमें क्या करना उचित है, क्योंकि हर मन में देवत्व बीज बैठा है। जरूरत है मन व भाव के स्तर पर उसे जगाने की। अपने सम्पूर्ण नेक कर्तव्यों की पूर्ति के लिए उसे परमात्मा की कृपा एवं शक्ति के प्रति सचेत करना होगा।

कर्मों, भावों की पवित्रता

मन मंदिर में बैठे परमात्मा से उसे सत्संग, ध्यान, ज्ञान, जप, द्वारा जोड़ना होगा। पूज्य सद्गुरुदेव श्री सुधांशु जी महाराज कहते हैं कि ‘‘समाज को स्वस्थ, शक्तिमान एवं संपूर्ण बनाने के लिए आज देश को ऐसे संत मन वाले व्यक्तियों की बड़ी जरूरत है। लोकमंगल के दर्शन की पुनर्स्थापना इसी से सम्भव है। तभी मनुष्य में देवत्व जगेगा और हर मानव के कर्म से देवत्व फल सकेगा।’’ वर्तमान परिस्थितियां संकेत देती हैं कि परमात्मा की मर्जी और इच्छा भी यही है। यदि हम उनके पुत्र, मनुष्यों में देवत्व का जागरण कर सकें तो धरती पर स्वर्ग लाना असम्भव नहीं। पर आत्मा को उसके स्त्रोत्  परमात्मा से जोड़ने और परमात्मा से मिलने के लिए हमें अपने कर्मों, भावों की पवित्रता आवश्यक है। यही एकमात्र उपाय है धर्म की स्थापना का, मानवता और नैतिकता के पुनर्जागरण का। आइये सभी देवत्व जागरण के इस अभियान में जुड़ें

Online Meditation Courses 

Immune Booster Program

Yogic Living Book

Kailash Mansarovar Yatra




Saturday, 29 August 2020

THE EMOTIONAL CROP


 

Cultivating and Reaping Positive Emotions

“If you love something, don't tell people. People ruin beautiful things”

The correlation with the above quotation is common to be found. It is everywhere, almost all-pervasive. In a way, it has become a cult and we all have become its preys, knowingly or unknowingly. It has become a human behaviour to negate and oppose to the choices or preferences of others, without any reason. You might've experienced it yourself. You might've shared your preferences with others; it can be your favourite song, the place you love to visit, the food you love to eat or simply a colour that you love to wear. You might've faced opposition instantly or simply the imposition of the other person's preference over yours. The “Holier than Thou” has now become “Smarter than Thou”!

"Insignificant" is a very dangerous emotion


This constant opposition has become an inseparable part of modern society, where one of the aims of the society is to pull each other down. This is however done unknowingly and unwillingly in most of the cases, but it still takes its toll. Some people feel left out from the top-notch of the society and this practice is making more and more people “insignificant”. This is a very dangerous emotion and once ingrained in an individual, is very difficult to get rid of. The most effected are the souls that are emotionally fragile and vulnerable.

The constant opposition and disapproval regarding each and every life preference is not handled well by some individuals. Some people find themselves above this game and don't wish to indulge in “to and fro” discussion all the time. This leads to a sense of withdrawal at first and then it slowly leads to the feeling of being “insignificant”.

Emotional Battles


This feeling is termed by various thinkers and philosophers as one of the most destructive feelings ever. It does not harm a person from outside, but it makes one feel shattered and hollow from inside. With the way modern society is designed, this feeling has intensified immensely. Modern society has become more and more disoriented and unattached. Our earlier societies were based on the idea of “co-existing” where huge families lived together and neighbours and other members of the society formed a huge part of one's “extended family”. This practice was considered very supportive and helped people overcome their distress and emotional turmoil easily. Modern society is extremely “nuclear”, where members of the same family often live in different cities and part of the world. People are bound to fight their own emotional battles and come out of it, on their own.



Friday, 28 August 2020

मौन ध्यान से खुलते हैं साधक के प्रज्ञा स्तोत्र

 


शब्द एक भौतिक पदार्थ है। शब्दों में मौन को प्रकट करना संभव नहीं है, अतः बुद्ध के शिष्य जब भी उनसे कोई प्रश्न पूछते थे, तो वे उन्हें ध्यान द्वारा अपने उत्तर स्वयं पाने का परामर्श देते थे।
बुद्ध तथा अन्य प्रवर्तकों के जीवन में ऐसा अनेक बार हुआ है जब उनके शिष्यों ने अपने गुरुओं के मौन में ही अपने प्रश्नों का उत्तर पाया है। बुद्ध ने ‘नागार्जुन’ को मौन रहते हुए एक फूल दिया और नागार्जुन को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया।

वास्तव में मौन ‘ध्यान’ के द्वारा व्यक्ति प्रज्ञा के स्तोत्र तक पहुंचता है। जहां पहुंचकर वह भौतिक जगत से प्राप्त अपने में संगृहीत ज्ञान और जानकारी से मुक्ति पा लेता है। शून्य की स्थिति में ही उसको स्तोत्र के शुभ एवं निश्चल स्वरूप से साक्षात्कार होता है, जो सत्य का स्वरूप है।

ध्यान में व्यक्ति मस्तिष्क के उस स्तोत्र तक पहुंच जाता

ध्यान में व्यक्ति मस्तिष्क के उस स्तोत्र तक पहुंच जाता है, जहां से प्रश्न जाग्रत होते हैं। बुद्ध का मानना था कि इसी स्तोत्र में उन प्रश्नों का उत्तर भी विद्यमान है। ध्यान में ही मनुष्य चेतन अवस्था की अपेक्षा अधिक संवेदनशील हो जाता है। इस स्थिति में वो दूसरे की कठिनाई को अनुकूलता में बदलते हुए उसकी सहायता को तत्पर होता है। किसी भी प्रश्न का सटीक उत्तर देने के लिए यह स्थिति बहुत कारगर होती है।

अतः इस स्तोत्र में पहुंचकर व्यक्ति प्रश्न का उत्तर पा लेता है। जिसे शब्दों की भौतिकता में प्रकट करने की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए बुद्ध शिष्यों को मौन साधना के लिए प्रेरित करते थे।
जैसे मछली सागर में रहती है, फिर भी सागर के अस्तित्व से वंचित रहती है। जैसे मृग के अंदर ही कस्तूरी की गंध (वास) होती है और वह उस सुगंध से मतवाला हो, उसे यत्र-तत्र खोजने का प्रयास करता है। ठीक वैसे ही हमारे मौन में, ध्यान में सभी प्रश्नों का उत्तर छिपा हुआ है। परन्तु हम बाहर खोजते हैं। वास्तव में जिस दिन हमें अपने मौन-ध्यान की अनुभूति होगी, तभी हमारे सभी प्रश्नों का समाधान संभव होगा। इस प्रसंग में बुद्ध और सारिपुत्र का एक उदाहरण प्रस्तुत है।

सारिपुत्र का एक साल तक मौन

बुद्ध के 80 महान शिष्यों में एक सारिपुत्र था, जो महान ज्ञानी था। जब वह बुद्ध के पास आया, तब उसके पास 5 हजार शिष्य थे। वह बुद्ध से बहस करने, उन्हें शास्त्रर्थ में हराने आया था, परन्तु जब वह बुद्ध के सामने आया, तो बुद्ध हंसे और कहा सारिपुत्र, तुम अधिक जानते हो, लेकिन तुम कुछ नहीं जानते। मैं यह जानता हूं कि तुमने बहुत ज्ञान इकट्ठा कर रखा है, लेकिन फिर भी तुम खाली हो। तुम मेरे पास मुझसे बहस करने और मुझे हराने आए हो, मैं यह भी जानता हूं।

यदि तुम वास्तव में मुझसे बहस करना चाहते हो, तो तुम एक वर्ष तक मेरी प्रतीक्षा करो। सारिपुत्र ने कहा एक वर्ष क्यों? बुद्ध ने कहा तुम एक साल मेरे पास मौन रहोगे। यदि तुम एक वर्ष तक मौन रह गए, तब तुम मेरे साथ बहस करना, क्योंकि जो मैं तुमसे कहने जा रहा हूं वह मौन से निकलेगा। तुम्हें इस छोटे से अनुभव की आवश्यकता है।

मैं जानता हूं सारिपुत्र कि तुमने जीवन में एक क्षण भी मौन का आनंद नहीं लिया। तुम ज्ञान से भरे हो। सारिपुत्र ने कहा ठीक है मैं एक वर्ष तक इंतजार कर सकता हूं। और वह वहां एक वर्ष तक मौन में बैठा और जब एक वर्ष बाद बुद्ध ने पूछा कि अब तुम मेरे साथ बहस कर सकते हो, मुझे हरा सकते हो। क्योंकि मैं तुमसे हारकर बहुत खुश होऊंगा। तब सारिपुत्र हंसा और उसने बुद्ध के चरण पकड़ लिए कहा कि आप मुझे दीक्षा दीजिए। अब मैं अपने को ही आपसे हार गया। मुझे अपने सभी प्रश्नों का उत्तर स्वयं में ही मिल गया। आप द्वारा निर्देशित मौन में मिल गया, ध्यान में मिल गया।

सभी प्रश्नों का एक मात्र समाधान मौन है

वास्तव में यही भारतीय ऋषियों, ज्ञानियों की विशेषता है। अतः स्तोत्र संवेदना और सत्य से साक्षात्कार के फलस्वरूप प्रत्येक प्रश्न का हर प्रज्ञावान उत्तर प्राप्त करने में सहज सफल हो जाता है। इसलिए हमारे सभी प्रश्नों का एक मात्र समाधान ध्यान है। वह स्तोत्र भी हमारे अंदर है, उसे कहीं बाहर से नहीं लाना है। उसे स्वयं के द्वारा स्वयं में ही खोजना है। खुद का परिष्कार करना है। आगे सब कुछ स्वतः घटित हो उठेगा।

 

Online Meditation Courses 

Immune Booster Program

Yogic Living Book

Kailash Mansarovar Yatra

Wednesday, 26 August 2020

Radha – an Epitome of Love | Happy Radha Ashtami



Radha and Krishna, having different bodies but united in the same soul, were inseparable. Radha only knew one thing, to love Krishna. Even though they did not marry each other, yet they are the idols among couples and many Hindu followers because they were true lovers, they were honest, and the relationship they had was based on trust, devotion, and purity.

Radha Ashtami is not just the celebration of Radha’s birth, who later fell in love with Krishna; Radha Ashtami is the celebration of womanhood. A woman who has many forms but all her forms know one thing, to selflessly devote and love unconditionally. Whether as a mother, a sister, a wife, or a friend; a woman loves with all her heart when she has to.

Radha Ashtami is celebrated on the ‘ashtami’ (8th day) of the Shukla Paksha (the bright fortnight of the moon) during the month of ‘Bhadrapada’ in the Hindu calendar. In the Gregorian calendar, it falls during the month of August-September. Radha Ashtami is also known as ‘Radha Jayanti’ or ‘Radhashtami’ and Hindu devotees worship Goddess Radha with utmost devotion and zeal. This day also honors the selfless bond of love between Sri Krishna and Radha, a unique relationship between human and God. Many devotees observe a fast out of respect for Radha.

Radha who got the position of a Goddess in Hindu mythology because of her unconditional love and devotion towards Krishna teaches us a very important lesson; God was and still is looking for humans who can offer Him their honesty, purity, love and devotion. God is not hungry of wealth, He is the creator, the organizer and the destroyer of everything what else could He ask for other than some pure souls to serve His purpose on Earth and spread the word of humanity among the mankind.

Online Meditation Courses 

Immune Booster Program

Yogic Living Book

Kailash Mansarovar Yatra

 

Tuesday, 25 August 2020

दृष्टि बदलते ही सृष्टि बदल जाती है | Gita Updesh -137 | Dr. Archika Didi

रोगों का निवारण भी होता है ‘योग निद्रा’ से


 आध्यात्मिक नींद को योग निद्राकहते हैं। यह वह नींद है जिसमें जागते हुए सोना है। सोने और जागने के बीच की स्थिति ही योग निद्राहै। यह अर्द्धचेतन जैसी स्थिति होती है। इसे किसी साधक विशेषज्ञ से सीखना चाहिए। योग निद्रा से तन और मन दोनों स्वस्थ रहता है। इससे रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, सिर दर्द, तनाव, पेट में घाव, दमा की बीमारी, गर्दन का दर्द, कमर का दर्द, अनिद्रा, अवसाद आदि में लाभदायक है। इसके चमत्कारिक लाभ हैं।

दिन के 24 घंटों में से 6-7 घंटे तो हम निद्रा में ही बिता देते हैं। नींद भगवान का सबसे बड़ा वरदान है जो थके हारे मनुष्य को अपनी गोद में लेकर आराम पहुंचाती है। यदि यह नींद हमारी समाधि बन जाए तो वो 6-7 घंटे बेहोशी में न बीतकर परमात्मा के चरणों में समर्पित हो जायेंगे। भक्ति परवान चढ़ने लगेगी, मानव का चोला सार्थक हो जाएगा।

प्रश्न यह उठता है कि इस नींद को समाधि बनाएं तो कैसे? बहुत सरल तरीका है। योगी की तरह सोना सीख जाएं अर्थात् योग निद्रा का अभ्यास करने से रात्रि में समाधि का आनंद और दिन में सतत ध्यान का आनंद रस जीवन को पुलकित कर देगा।

                1. योग निद्रा के लिए पहले पूरा शरीर ढीला छोड़ते हुए आराम से सीधे लेट जाएं।

                2. मन ही मन ईश्वर को याद करें और उसने जो अपने नाम की लगन लगाने की प्रेरणा आपको दी है उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दें।

                3. शरीर को रिलैक्स करने के लिए गहरे लम्बे सांस लें और छोड़ें।

                4. शरीर के एक-एक अंग को मन की आंखों से देखें और मन ही मन शांत कहते हुए उसे शिथिल करते जाएं।

                5. इस क्रिया को सिर से प्रारम्भ करते हुए पैरों तक जाएं और फिर पैरों से वापस सिर तक लौटें।

                6. इसी अवस्था में सीधे लेटे हुए मन को अपनी नाभि में केन्द्रित कर लें।

                7. एक खूबसूरत दृश्य की कल्पना करें कि आसमानों से जल की एक मोटी-सी बूंद आकाश से उतरी और नाभि से होकर उदर में समा गयी। इस जल के अमृत प्रभाव से वक्ष-मंडल में प्रेम और करुणा की ऊर्जा प्रवाहित होने लगी। उदर-मण्डल, हथेलियां, कंठ, सब ऊर्जा से भर रहे हैं। मुखमण्डल और सिर के ऊपरी भाग से ध्यान ऊर्जा अंदर प्रवेश कर रही हे। एनर्जी की बारिश हो रही है और मैं इसमें पूर्णतया भींगकर कर आनंदित हो रहा/रही हूं।

                8. आप आनंदित हैं अर्थात् आप ईश्वर से जुड़ चुके हैं। यही समय है उस परम प्रिय से मन की बात करने की। इसी क्षण प्रार्थना का बीज बो दीजिए, इच्छा प्रकट कर दीजिए और उस इच्छा को पूरा होते हुए दृश्यात्मक कीजिए। आप एक चुम्बकीय शक्ति से युक्त हैं और ब्रह्माण्ड से अपनी इच्छित वस्तु को अपनी ओर खींच रहे हैं आपकी झोली भर गयी और कृतज्ञता से आपकी अश्रुधारा बह कर आपके स्वामी के चरण पखारने लगेगी।

                9. सांसों पर मन को केन्द्रित करें और कुछ देर यूं ही स्थिर रहें।

                10. अब अपने तन का एहसास करते हुए हाथ-पांव को थोड़ा-थोड़ा हिलाएं, दोनों हथेलियों को नाभि केंद्र पर रखें और ऊर्जा दें।

                11. आज के अवसर के लिए धन्यवाद दें और बाएं करवट से उठ कर बैठ जाएं। अगर रात्रि का समय हो तो लेटे ही रहें। स्वयं ही गहरी नींद आ जाएगी और जब आप प्रातःकाल जागेंगे तो मन बहुत आह्लादित होगा। आपको लगेगा कि मैं कहीं की यात्रा से वापस लौटा हूं।

Saturday, 22 August 2020

Balance all the aspects of your Life!

 


Life is based on balance and this balance has to maintain in order to lead the path with happiness and contentment. The wheel of life depicts the important components of your life all at once and you get an idea about the things that mean the most to you. It is in a way a tool to analyze your life from a wider viewpoint and you can give weightage to your life's aspects. Based on the weightage that you give each aspect; you have the whole report of life in general.

 

The important aspects of life are namely, Money, Career, Spiritual Growth, Health, Fun, Personal Growth, Family and Social Involvement.

These aspects are almost common with each individual. Lives of almost everyone revolves around these aspects. There can be small variations between certain individuals about these aspects but more or less, they remain the same and impact our lives.

 

The main aim of our life is to seek a balance among these aspects and to maintain a rhythmic flow among them. Once the perfect rhythm is maintained, we are on the path of bliss from all angles. But first, we need to understand the implications of each and every life aspect. New Life Meditation holds your hand to understand and manoeuvre among these life aspects with ease


Friday, 21 August 2020

बंधनों में फंसी नारी कैसे करें दायित्व निर्वहन

 


नारी आज अधिक स्वतंत्र दिखती है, पर वह स्वतंत्रता एक प्रकार का बंधन है। सोने-चांदी से उसे लादना, अपने हित में उसे शौक-श्रृंगार से जोड़ना, अपने उत्पादों के विज्ञान में उसे उपयोग करना आदि तरह की स्वतंत्रता से कोई परिवार और समाज ठीक-ठीक उन्नति कैसे कर सकता है। यह हमारे लिए दुःखद है। जबकि भारत अनन्तकाल से मातृ सत्तात्मक समाज के लिए जाना जाता रहा है। प्रमाण है देशभर में यत्र-तत्र बिखरे जनजातीय, घुमक्कड़ प्रकृति के ऐसे समाज जिन पर अभी भी आधुनिक सभ्यता का प्रभाव नहीं पड़ा और पुरानी मान्यताओं में जीवन जीते हैं। उनके परिवार जीवन से लेकर सामाजिक निर्णयों तक में महिलाओं की अगुआई है।

उन समाजों में शादी-विवाहों के लिए स्त्री को ही वर चयन का अधिकार है। यहां तक कि आर्थिक दृष्टि से निर्णय लेने की भी जिम्मेदारी स्त्रियों के हाथ है, भले उस परिवार में पुरुष कमाकर लाते हों। भारतीय आर्ष साहित्य, वेद आदि से लेकर अनेक लोक साहित्य में भी बताई गई नारी शक्ति की महिमा अद्भुत है।

यही नहीं हमारे देवी-देवताओं में देवियों को शक्ति व नेतृत्व का प्रतीक बताना भी सिद्ध करता है कि भारतीय संस्कृति में नारी का स्थान प्रमुख रहा है। ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’’  इसी का संकेत है। पर मध्यकाल आते-आते नारी दोयम दर्जे पर कर दी गयी। उसके अधिकार छिन गये और तभी से देश का भावनात्मक, संस्कारगत पतन भी प्रारम्भ हुआ। अतः लंबे समय से गुलाम बनी, अनेक तरह के अन्याय, अत्याचार सहती आ रही नारी के प्रति पुनः संवेदनशीलता का भाव समाज में लाना होगा।

सामाजिक बंधनः

आज उदार व्यवहार द्वारा नारी में आत्म विश्वास जगाना, उसे आश्वस्त एवं विश्वस्त करने की जरूरत है। उसे संगिनी ही नहीं, परिवार एवं समाज के लिए मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण मानना जरूरी है। नारियों में आत्मविश्वास और उनके मन को हीन भावना से भी मुक्त करना होगा। जब तक नारी के हृदय से निराशाओं को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक वह सुविधा, साधन, सहयोग तथा अवसर पाकर भी इस योग्य न बन पाएगी, जिससे वह संस्कारवान पीढ़ी गढ़ सके।

वैसे नारी को किसी न किसी बहाने छला ही जाता आ रहा है। कभी मैत्री के आधार पर, कभी संबंधी, पत्नी, माँ के नाम पर त्याग को लेकर। यही नहीं अतिरिक्त बंधन में बँधकर उसे बलात उपभोग की वस्तु बनाकर उपयोग करने का तो व्यापार सा चल रहा है। जिससे नारी स्वतंत्र होकर भी मूलभूत मानवी अधिकार से वंचित जैसी है। कन्या का आज भी उसके अभिभावक कहीं भी बिना मर्जी विवाह कर सकते हैं। पति उसे अपने अधिकार में रख, अपनी मर्जी के अनुसार चला सकता है। पशुओं जैसी मारपीट तो आम बात है। यह स्थिति किसी भी मनुष्य के मूल अधिकारों के विपरीत है। नारी जो सृजेता है, उसके जीवन पर इतने कड़े प्रतिबंधों को कैसे न्यायोचित कहा जा सकता है।

फैशन-श्रृंगार के लिए नारी

यहां तक कि उसके मन पर ऐसे भाव बैठा दिये गये हैं कि बिना फैशन उसका जीवन बेकार है। फैशन-श्रृंगार के लिए नारी को आज जिस स्थिति में रहना पड़ता है, उसे मानवोचित नहीं कहा जा सकता। वास्तव में कभी लोहे की जंजीरों में जकड़ी नारी आज सोने की जंजीरों में जकड़ दी गयी है। शताब्दियों से चली आ रही जटिल परंपराओं में थोड़ा बदलाव करके विडंबनाओं को मर्यादा की मान्यता देना कहां का न्याय है। महत्वपूर्ण यह कि आज नारी भी इसे स्वयं उचित आवश्यक मानकर स्वीकार कर रही है। तर्कों, धर्म प्रचलनों की मनगढ़ंत द्वारा उन प्रतिबंधों को लोग समर्थन अलग से करते दिखते हैं।

नारी अपनी मानवी उपलब्धियों तक से वंचित है

सच कहें तो चिरकाल से चली आ रही अनर्गल मान्यताओं और आधुनिकता के गुरूर में ही तो नारी अपनी मानवी उपलब्धियों तक से वंचित है। इसी प्रकार वह भले आधुनिक स्थितियों में घर के छोटे से पिंजड़े से वह बाहर दिखती है, पर आजीवन मानसिक कैद से तो वह आज भी नहीं निकल पायी। इससे उसकी बौद्धिक क्षमता, भावनात्मक सम्वेदन शीलता, जीवन की आंतरिक सृजनशीलता तक चौपट हुई।

वह खुली हवा, धूप, हाथ-पांव हिलाने की स्थिति में तो दिखती है, पर वह अपनी गौरव-गरिमा खोने से नहीं बच पा रही। कभी छोटी आयु में विवाह हो जाने पर उसके स्वाभाविक शारीरिक विकास की जड़े कटी थीं, आज स्वाभाविक आयु पार करके विवाह के कारण अपने नई पीढ़ी की सृजन से वह दूर हो रही है। यह उचित है कि पच्चीस वर्ष से कम आयु में संतानोत्पादन नारी के स्वास्थ्य को क्षीण कर देता है। इससे अनेक बीमारियाँ आरंभ आयु में ही घेर लेती हैं।

विकृत जीवन शैली

इसी के साथ अधिक भाग दौड़, ऑफिस-घर के बेवजह तनाव, साथी-सहयोगियों द्वारा मनोबल गिराने, भविष्य को लेकर निराशा-आशंका के बीच पिसते रहना आदि को लेकर नारी को भी स्वयं सम्हलने की जरूरत है। इससे दाम्पत्य जीवन में असंतुलित व अमर्यादित भार पड़ेगा और मन टूटेगा, स्वास्थ्य भी खोखला होगा। स्त्रियों में आज अधिकांश को अपच, सिर दर्द, अनिद्रा, हाथ पैरों में जकड़न, आंखों में जलन, मुंह में छाले, थकान, सुस्ती, बेचैनी उदासी जैसी शिकायतें बनी रहती हैं। इन सबका कारण विकृत जीवन शैली है, जिससे उनकी जीवनी शक्ति का क्षीण हो जाना है। इसके अतिरिक्त अशिक्षा के कारण भी सोचने की शक्ति समाप्त होती जा रही है।

वास्तव में नारी को लेकर आज का समाधान है सद्गृहस्थ धर्म की मर्यादा का पालन। सद्गृहस्थ सबसे बड़ा धर्म भी है। पर इसके निर्वहन के लिये स्त्री और पुरुष दोनों को मिली-जुली जिम्मेदारी निर्वहन का संकल्प गढ़ना होगा। यदि केवल एक के भरोसे परिवार की गाड़ी आगे बढ़ाने का प्रयास होगा, तो लोग इस धर्म को स्वीकार तक करना बंद कर देंगे। यह सद्गृहस्थ धर्म हर नर-नारी को बोझ अनुभव होगा, आज हो भी रहा है। विदेशों में विवाह जैसी पवित्र व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो चुकी है। अतः जरूरत है नार-नारी परस्पर पूरक रूप में एक दूसरे को स्वीकार करें। ताकि समाज में संस्कारवान पीढ़ी गढ़ी जा सके। इसके लिए दाम्पत्य जीवन के दौरान नये ढंग से पुरुष व स्त्री को परस्पर समझ स्तर पर अपने को विकसित करने की रीति तैयार व स्वीकार  करनी होगी।

Online Meditation Courses 

Immune Booster Program

Yogic Living Book

Kailash Mansarovar Yatra


समस्त सृष्टि के पीछे है ईश्वर की शक्ति | Gita Updesh -136 | Dr. Archika ...

Thursday, 20 August 2020

The Significance Of Lord Ganesh

 


Ganesh Chaturthi is a Hindu festival that celebrates the birthday of Lord Ganesha. This day falls on the fourth day of Shukla Paksha in the month of Bhadrapada. The celebration, joy, and Mirth of welcoming Lord Ganesha on earth go on for ten days. It ends with a grand procession on the Ananth Chaturdashi, which marks the culmination of the festival.

The Story Behind Lord Ganesh’s Unique Look

Lord Ganesha is the younger son of the mighty Lord Shiva and Goddess Parvati. On earth, we recognize Lord Ganesha to be the harbinger of wisdom, luck, and prosperity. The story runs that Lord Shiva severed the head of Ganesha in anger when he was stopped by his little child to meet Parvati.
When Parvati saw the decapitated head of Ganesha, she was furious. Lord Shiva realized his mistake and promised to return life back into the body. But the head that Lord Shiva’s weapon cut off was impossible to put back together. So, the head of an elephant sleeping with its head towards the north was taken and placed on the body of Ganesh to make him whole again.

The Significance of Lord Ganesh’s Body Parts

To many persons, Lord Ganesh might look weird, but there is a significance of each of his parts.

The Elephant Head of Ganesha

The large head of Ganesha is something that everyone notices as soon as one beholds an idol. It signifies his astute ability to judge right from wrong. It also denotes knowledge, intelligence, and wisdom.

Broken Teeth of Ganesha

Lord Ganesha is in constant search for knowledge and is an avid writer. Mythology says, with his broken tusk, he wrote the epic Mahabharata.

Lord Ganesh’s Large Ears

Ganesh hears our prayers and answers them. It is his large ears that let our prayers and pleadings reach him quickly.

Four Arms of Lord Ganesha

Each of the arms of the Lord represents an attribute that runs in all human beings. His first arm denotes the ‘Mind.’ The second arm symbolizes ‘ Intellect.’ The third arm represents ‘Ego,’ and the fourth one stands for ‘consciousness.’

The Trishul on Lord’s Forehead

There is a ‘Trishul’ on the forehead of the Lord. The Trishul consists of three arrows, which signify the ‘past,’ ‘present,’ and ‘future.’ The presence of Trishul on Ganesh’s forehead denotes his mastery over time.

The mantra of success for everyone

Lord Ganesha has a mantra of success for all of us. His big head indicates that we should always think big and bold and large ears signify that we should listen more calmly and patiently. Similarly, small sharp eyes signify that we should always be focussed. And large stomach teaches us to peacefully digest all good and bad in life.
As years are passing by, the caste-discrimination among the Hindus is lessening. Ganesh Chaturthi is not only the celebration of Lord Ganesh’s birthday but also spreads a social message of a lifestyle devoid of prejudice against any particular caste. So, this Ganesh Chaturthi lets be one and celebrate a better and a more prosperous tomorrow.

Online Meditation Courses 

Immune Booster Program

Yogic Living Book

Kailash Mansarovar Yatra

Monday, 17 August 2020

जीवन में दूरदर्शितापूर्ण चयन की चेतना जगाती है भगवद्गीता

 


इस जगत में हर व्यक्ति किसी न किसी प्रयोजन से जुड़ा है, हर व्यक्ति के जीवन का अपना उद्देश्य है। प्रत्येक मनुष्य के लिए उसका कर्त्तव्य उसे पुकारता रहता है। व्यक्ति अपने कर्त्तव्य का चयन कर जब अपनी ऊर्जा को उस ओर लगाता है, तब उसके जीवन का नया रूप संसार के सामने आता है। जीवन उसी दिन मूल्यवान बनता है, जिस दिन हम अपने जीवन के उद्देश्य को पहचानते और सही ढंग से चयन करते हैं। किसी को पर्वत की ऊंची चोटी पुकारती है, किसी को सिंहासन पुकारता है, किसी को धन पुकारता है, किसी को युगधर्म पुकारता है, लेकिन ये पुकार इसलिये है कि इन्हें लेकर आप दुनिया के सामने एक प्रेरक व्यक्ति बन सकें। एक आदर्श समाज खड़ा कर सकें, जिससे लोग प्रेरणा लें। वास्तव में हमारे चयन में ही हमारी सार्थकता है। कर्त्तव्य पथ भी हमें श्रेय तब दिला पाता है, जब हमारे चयन में दूरदर्शिता हो। कर्त्तव्य चयन से लेकर संगी-साथी के चयन में दूरदर्शिता।

जीवन में चयन की इसी दूरदर्शितापूर्ण प्रेरणा जगाती है गीता। सावधानीपूर्वक उसी का संग करे जो अच्छाई के लिये हो, विचारों में शक्ति भरे, अच्छी सोच शुरू करे, सकारात्मक चिन्तन बने, सेहत, परिवार, व्यक्ति के बारे में अच्छे भाव पैदा करे। यही दूरदर्शिता भरा संग है। इसके विपरीत जिसके साथ बैठने से जीवन पर ऐब लगता हो, वह कुसंग माना जाता है।

ऋषि कहते हैं सद्विचार, सत्कर्म, सतचिन्तन, सद्व्यवहार, सदाचार, सद्आहार, सत्संग (अच्छी संगत) ही जीवन की श्रेष्ठता का मूल है। इस सद्-असद् के बीच हम क्या चयन करते हैं, उसी पर जीवन के परिणाम निर्भर करते हैं।

महाभारत के 18वें पर्व में कृष्ण अर्जुन संवाद रूप में स्थित गीता के 18 अध्यायों से स्पष्ट होता है कि महाभारत 18 अक्षौहिणी सेना के मध्य चला, पर किसी को श्रेय व कीर्ति मिली, किसी को अपयश। इसका कारण था उनके चयन की धारणा।

कहते हैं व्यक्ति की जिंदगी में उठे नकारात्मक विचार जब उसे गलत दिशा में ले आते हैं, तो वह कौरवी वृत्ति कही जाती है। कौरव सेना को चलाने वाला है दुर्योधन। दुर्योधन ही कभी सुयोधन था। सुयोधन वह व्यक्ति जो अच्छी तरह पुरुषार्थ करना जानता है। लेकिन बुरे चयन के कारण उसका नाम दुर्योधन पड़ गया।

महाभारत की 18 अक्षौहिणी सेना के मध्य भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान देते हुए समझाया कि दैवी सम्पदा और आसुरी सम्पदा प्रत्येक व्यक्ति के अंदर है। अच्छाई और बुराई की लड़ाई प्रत्येक व्यक्ति के अंदर सदैव चल रही है। यही कौरवी सेना और पाण्डव सेना का आंतरिक महाभारत है। प्रश्न यह है कि हम किस पक्ष का चयन करते हैं। पाण्डव सेना को हांकने वाले श्रीकृष्ण हैं और अर्जुन पाण्डव योद्धा सेनापति बनकर लड़ने वाला है।

चयन की श्रेष्ठ दृष्टि देखिये कि अर्जुन ने अपने गोविन्द को चुना। इस संकल्प से कि कृष्ण भले ही मेरी तरफ से न लड़ें, अपनी लड़ाई हमें खुद लड़नी ही पड़ेगी, लेकिन जिस दिशा में मेरे रथ को जाना चाहिये, श्रीकृष्ण ही मेरे रथ की सही दिशा को संभालें।

वास्तव में जिस व्यक्ति ने अपनी बुद्धि के रथ को भगवान को सौंप दिया, उस व्यक्ति की दुनिया में जीत निश्चित है। इसके विपरीत जिसने गलत को अपना सारथी बना लिया, अर्थात् अपना  नेतृत्व दुर्योधन जैसे व्यक्ति के हाथ दे दिया, उसकी कितनी ही बड़ी शक्ति क्यों न हो, वह व्यक्ति अपना जीवन समर हारता ही है।

यही कारण है जिन श्रेष्ठ व्यक्तियों ने अपना प्रतिनिधि दुर्योधन को चुना, विनाश को प्राप्त हुए ही, कलंक के भागीदार भी बनें। अनन्तकाल से संसार में उन्हें तिरस्कृत होना पड़ा रहा है।

इसी प्रकार अश्वथामा का चयन भी अनन्तकाल तक के लिये उसे अपयशी बना गया। वह चयन का दर्प ही था कि उसने पाण्डवों के बच्चों को रात में सोते हुए मार दिये। लड़ाई भाइयों की थी, मारे गये बच्चे। दुर्भाग्य देखिये कि यह खबर सुनकर प्राण निकलते वक्त भी दुर्योधन के चेहरे पर अनाचक मुस्कुराहट ले आती हैं, वह ईर्ष्याभरी मुस्कुराहट लेकर दुनिया से गया। गीता संदेश देती है कि बुरा व्यक्ति जब भी दुनिया से जाता है, तो उसे खुशी भी ईर्ष्या व दूसरे के विनाश से ही मिलती है। यहां भी वही सूत्र है कि चयन हमें करना है, हम प्रेम चयन करते हैं या द्वेष-घृणा-ईर्ष्या।

कर्ण ने भी चयन ही तो किया था। दुर्योधन जैसा दम्भी, मिथ्याचारी किस प्रकार एक व्यक्ति को अपना बना लेता है। कहते हैं भीष्म और द्रोणाचार्य ने मिलकर एक स्वयंवर से कर्ण को बाहर इसलिए रखा, क्योंकि उस प्रतियोगिता में राजा या राजकुमार ही शामिल हो सकते थे। कर्ण राजा थे नहीं, अतः इस प्रतियोगिता से बाहर माने गये। तभी दुर्योधन ने देखा कि अर्जुन को हराने वाला सामर्थ्यवान कर्ण सामने है। उसने तुरन्त पिता द्वारा दिया अंग देश का राज मुकुट उठाकर कर्ण के सिर पर रख दिया और कहा आज से और अभी से आप अंग देश के राजा हो गये। दुर्योधन ने कहा मैं तुम्हें राजा बनाता हूँ, तुम अंग देश के राजा हो, अब तुम स्वयंवर में इन्हें ललकारो। कर्ण ने आश्चर्यभाव से दुर्योधन से पूछा कि आपने मेरे सिर पर मुकुट रख करके मान तो दिया, अब बदले में आप क्या चाहेंगे, अपनी शर्त बतायें। दुर्योधन ने कहा, सिर्फ दोस्ती। यहीं से कर्ण के चयन विधान ने कर्ण के साथ काम करना शुरू कर दिया।

इसीलिये कर्ण मरा तो श्रीकृष्ण को कहना पड़ा, अर्जुन याद करो वह दिन जब दुर्योधन ने इसे मुकुट पहनाया था। कर्ण ने अब तक जो कुछ भी गलत किया, वह इसका स्वभाव नहीं था, अपितु हर गलत कार्य दोस्ती के कारण। चयन के चलते ही हर जगह दुर्योधन के साथ खड़ा रहा। यद्यपि एक व्यक्ति के रूप में यह ऊंचा इंसान था, लेकिन गलत जगह खड़ा था। गलत चयन कर चुका था।

Friday, 14 August 2020

गुलामी वाले मन को बदलकर मनायें स्वतंत्रता दिवस - 15 अगस्त

 

भारत अपने जन्म काल से ही क्रांति एवं संघर्ष के लिये जाना जाता रहा है। पर यह क्रांति व्यक्तित्व के रूपांतरण की थी और हर संघर्ष सृजन के लिए था। इसीलिए यहां का संघर्ष एवं क्रांति की धारा सम्पूर्ण विश्व की दिशाधारा से बिल्कुल विपरीत थी। दो क्रांतियां समान चलती थीं, एक व्यक्तिगत जीवन स्तर पर, दूसरी समाज व्यवस्था स्तर पर। व्यक्तिगत जीवन में यहां का हर व्यक्ति अपनी मनुष्यता को, अपने निज स्वभाव को पा लेने के लिये संघर्षशील रहा, वहीं यहां की हर व्यवस्था इस संकल्प के प्रति संघर्षशील रही कि समाज के सुख-दुःख के बीच अंतिम व्यक्ति के उत्थान, न्याय, स्वतंत्रता को कैसे बनाये रखा जाये। यही कारण था कि इस देश का राजा भी एक आम नागरिक की हैसियत से ही जीवकोपार्जन करता और न्यायशीलता के लिये शासन चलाता था। इस देश का न्यायपरक गौरव इस स्तर का रहा कि एक आम नागरिक की अपेक्षा अधिक कठोर दण्ड का विधान यहां राजा के लिए था। यहां वार्षिक योजनायें बनती थीं, पर योजना के सफलता की समीक्षा प्रत्येक दिन होती थी। यदि एक भी व्यक्ति को भूखे पेट रहना पड़ता, तो राजा पर प्रश्न खड़ा हो जाता था। ये पक्ष भारतीय शासन को दुनियां में महान दर्जा दिलाते थे।

यहां पदार्थ नहीं, आत्म के विकास के लिये लोग जीते थे। कर्मफल सिद्धांत और पुनर्जन्म यहां के नागरिकों के जीवन संकल्पों में समाया था।

अंग्रेजों सहित अनेक विदेशी आततायियों के उनके विरोध में चले स्वतंत्रता संघर्ष में योद्धाओं ने इसी संकल्प नीति के साथ अपने प्राणों की आहुतियां दीं। यहां जीवन क्रांति का बीज स्वयं को तपाने, जीवन को आदर्श के लिए कठिनाइयों में झोकने के भाव के साथ अंकुरित होता था। राम-कृष्ण से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन काल में गांधी, सुभाष, लक्ष्मीबाई, शहीद भगतसिंह, आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल सहित आदर्श की धारा से जुड़ा हर व्यक्ति इसका उदाहरण है। स्वतंत्रता आंदोलन में लाखों वीरों ने इसी संकल्प-साहस से अपने को देश के लिए न्यौछावर कर देश को स्वतंत्र कराया। इन शहीदों में राष्ट्र को लेकर अनोखे स्वप्न थे। भारत के प्राचीन गौरव को पुनः विश्व भर में स्थापित करने के लिये ही हमारे इन लाखों शहीदों, सेनानियों ने संघर्ष किया था। गांधी, सुभाष, महर्षि अरविन्द सहित हमारे देश के मनीषियों ने भारत को लेकर जिस स्वप्न को देखा था, हम उस दिशा में कितना बढ़ पाये, इसकी समीक्षा और नये संकल्प के साथ उन सपनों को साकार करने की नवयोजना गढ़ने का राष्ट्रीय पर्व  ही तो है स्वतंत्रता दिवस।

भारत को आधुनिक संदर्भ में समझने के लिए हमें स्वतंत्रता आंदोलन के समय लिये गये संकल्प को समझना ही होगा। समझना होगा अपने आर्ष साहित्य में समाये भारतीय चैतन्य सूत्रें को और देखना होगा कि हम व हमारी सरकार इन पर कितना आगे बढ़ सकी। स्वतंत्रता दिवस पर यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हम उत्तरोत्तर अपने शहीदों के स्वप्नों का भारत बनाने की दिशा में संवैधानिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, व्यावहारिक, सामाजिक आदि अनेक आयामों की दृष्टि से एक नागरिक को इस दृष्टि से कितना मजबूत किया। अन्यथा आजादी के तराने गाने, तिरंगा लहराने व शहीदों की प्रशंसा करके इति श्री का कोई अर्थ नहीं।

यदि हमें अपने भारत का विकास करना है, तो भारत की प्रवृत्तिगत मौलिकता को उभारना होगा। यदि हम भारत की आत्मा को पाना चाहते हैं, तो कानून की दृष्टि से, व्यक्तित्व निर्माण की दृष्टि से, व्यक्ति के आत्म सम्मान, उसकी शैक्षिक, सामाजिक प्रतिष्ठा की दृष्टि से यहां जो कुछ अंग्रेजी शासनकाल में था, हमें उससे भिन्न श्रेष्ठ व्यवस्था निर्मित करनी ही पड़ेगी। हमें नहीं भूलना होगा कि अंग्रेजी शासन के दौर में जब-जब भारत देश संकटों से घिरा, तब-तब अंगेजी शासक, शासन एवं खुद इंग्लैण्ड की तिजोरियां भर उठीं। बंगाल का अकाल याद ही है, जब उसमें लाखों लोग मर रहे थे, उसी दौर में इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति की नींव रखी जा रही थी। यहां के किसान, कारीगर, मजदूर, आदिवासी से लेकर देश का हर वर्ग तबाह हो रहा था। यही नहीं भारतीय संस्कृति की जड़ों को खोखला करने का काम भी तो अंग्रेजी राज में ही हुआ। शिक्षा एवं श्रम नीति पर कुठाराघात इसी दौर में हुआ। सभी जानते हैं भारत की शिक्षा पद्धति निःशुल्क गुरुकुल आधारित थी, जिसे नष्ट करने का कार्य अंग्रेजी नीति ने ही किया। भाषा-जातिवाद-क्षेत्रवाद के गहरे बीज इसी दौर में  बोये गये। पूरा देश आर्थिक दृष्टि से परावलम्बी उपनिवेशवादी शोषणनीति का शिकार ही तो था।     

अंग्रेजों ने अपनी कुटिल नीति के चलते देश के नागरिकों को विविध ढंग से अधीर भी किया। निराशा, आत्महीनता, असंयमित, डरपोक, भीरु, परावलम्बी बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।

देश आजाद हुआ तो गांधी जी जैसे अनेक विचारकों की नीतियों को लेकर आशा जगी कि देश स्वदेशी शिक्षा, स्वदेशी चिकित्सा, स्वदेशी उद्योग पद्धति, स्वदेशी अर्थनीति, स्वदेशी संस्कृति  के सहारे श्रमनीति रोजगार का मार्ग तय करेगा। तस्वावलम्बी श्रम आधारित विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था को देश के सामने लाया जायेगा। इसप्रकार भारत एवं भारतीयता के बीच नागरिकों के निजस्वभाव की स्थापना का ही तो यह स्वप्न था। गांधी जी कहते भी थे किसी ने हमें गुलाम नहीं बनाया, अपितु हमने स्वयं अपनी परावलम्बी नीतियों व सोच के चलते गुलामी ओढ़ ली। पर भारत की निजता में उतरे बिना शहीदों के स्वप्नों का भारत नहीं गढ़ा जा सकता। वैसे तो देश आजाद हुआ पर तब से लेकर आज तक हम गुलामी वाला मन नहीं बदल सके।

               

ऐसे में यह राष्ट्रीय स्वतंत्रता के दौर में शहीदों द्वारा देखे सपनों को पुनः लक्षित न किये, तो भविष्य में तबाही सुनिश्चित है। कोरोना जैसा संकट इसकी एक सामान्य बानगी भर है, कि ठहरो और भविष्य में सम्हलने लायक स्वदेशी कार्य योजना बनाओ। हमें समर्थ बनना है तो स्वदेशी युक्त आत्मनिर्भरता को अपनाना पड़ेगा।