Meditation & Spiritual Guru, Vice Chairperson at Vishwa Jagriti Mission, Founder & Director at Dr. Archika Foundation Read more: http://drarchikadidi.com/
Friday, 31 July 2020
Thursday, 30 July 2020
ये राखी बंधन है ऐसा—
भारतीय संस्कृति के अलंकार कहे जाने वाले पर्व और त्योहारों में रक्षाबंधन एक भावपूर्ण त्योहार है। रक्षाबन्धन भाई और बहिन के मध्य प्रेम और स्नेह की डोर बांधने वाला रक्षा सूत्र है। बहन भाई की कलाई में राखी बांधकर भगवान से उसके कुशलक्षेम की कामना करती है और भाई बहन की रक्षा का वचन देता है। सावन की फुहारों, घटाटोप मेघ, सर्वत्र छाई प्राकृतिक हरियाली और उस पर भी चारों ओर से रक्षाबंधन के गीतों की मधुर धुन ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना’ ‘मेरे चंदा, मेरे भैया, मेरे अनमोल रतन’ आदि गीतों को सुनकर हृदय तरंगित होने लगता है और ऐसे में सात समंदर पार से भी प्रेम व सौहार्द के इस बंधन को निभाने के लिए भाई-बहन राखी के त्यौहार पर अपने घर आ जाते हैं।
श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा रक्षाबन्धन के भावपूर्ण त्यौहार शुभ दिन बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है तो भाई अपनी बहन को खुशियों के उपहार प्रदान करते हैं। भाई-बहन के लिये बड़ी ही खुशी और सद्भावना का त्योहार होता है ये रिश्ता। भाई-बहन जब आमने-सामने होते हैं, कहीं चेहरे पर खिलखिलाहट तो कहीं प्रेम से आंसू छलक जाते हैं।
बड़ा ही सुन्दर दृश्य होता है जब कोई बहन अपने भाई की राखी लेकर अपने मायके जाती है। भाई-बहिन के इस भाव प्रधान त्यौहार की अनुपम विशेषता है। दोनों को सामंजस्य बनाना होता है। अपनी बहन भी इस त्यौहार को पूर्ण रूप से मनाए और दूसरे की बहन जो हमारे घर में पत्नी-बहू-बेटी बनकर आई है, वह भी प्रसन्नतापूर्वक इस पर्व को धूमधाम से मनाए।
पौराणिक तथा लौकिक कथा
रक्षाबन्धन का त्यौहार कई पौराणिक तथा लौकिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। किसी समय देवासुर संग्राम हुआ। इस संग्राम में बारह वर्ष युद्ध के बाद भी दानव पराजित न हुए। तब इन्द्र बहुत असमंजस की स्थिति में अपने गुरु वृहस्पति से युद्ध जीतने का उपाय पूछा। एक किवदंती के अनुसार बृहस्पति ने इन्द्र के दाएं हाथ में रक्षा कवच बांधा जिसके प्रभाव से उसे इतना विश्वास और बाहुबल प्राप्त हुआ कि श्रावण पूर्णिमा के दिन ही विजयी हुआ। उसी स्मृति में पुरोहित यजमानों को रक्षा सूत्र बांधते हैं। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार इंद्राणी ने इन्द्र के हाथ में रक्षा कवच बांधा था और उसी प्रताप से श्रावणी के दिन इन्द्र ने असुरों पर विजय प्राप्त किया। श्रावणी के दिन रक्षा-सूत्र पुत्र-पौत्र आदि के पारिवारिक सुख के लिए बांधा जाता है। जैसा कि श्लोक से स्पष्ट है-
यः श्रावणे विमलासि विधानविज्ञो रक्षाविधानमिदमाचरेत् मनुष्यः।
आस्ते सुखेन परमेण स वर्षमेकं पुत्रप्रपौत्रसहितः ससुहृज्जनःस्यात्।।
कई स्थानों पर श्रावणी के इस रक्षा-सूत्र को रोगों को दूर करने वाला बताया गया है-
सर्वरोगोपशमनं सर्वाशुभं विनाशनम्।
सकृत्कृतेनाब्दमेकं येन रक्षाकृतो भवेत्।।
रक्षा सूत्र बांधते समय विशेष मंत्र का विधान है। कहते हैं किसी समय असुर राजा बलि ने वामन अवतार भगवान विष्णु को तीन पग भूमि दान करने का वचन दिया, तो संकल्प के समय उसे इसी धागे से धर्म बंधन में बांधा गया। रक्षा सूत्र के प्रति उसकी इतनी गहरी निष्ठा कि अपने गुरु शुक्राचार्य के समझाने पर भी बलि नहीं माना, क्योंकि वह रक्षा-सूत्र से धर्म बंधन को स्वीकार कर चुका था। उसी घटना की स्मृति स्वरूप रक्षा-सूत्र बांधते समय यह मंत्र पढ़ा जाता है-
येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षेमाचल माचल।।
रक्षाबंधन के पावन पर्व पर भाई-बहन के एक दूसरे के प्रति जो आदर्श भाव होते हैं उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे बहन अपने भाई की दीर्घायु, आशीष और खुशहाली की शुभकामनाएं देने वाली संसार की सबसे बड़ी देवी हो तथा भाई अपनी कलाई आगे बढ़ाकर इस तरह से राखी बंधवाता है कि जैसे कोई महावीर अपनी बहिन का विश्वासपूर्ण उसकी सुरक्षा का वादा कर रहा हो।
राखी के धागे से बहन के द्वारा भाई के लिये की गई लम्बी उम्र की कामना और भाई के द्वारा सद्भावना के कच्चे धागे में बंधकर बहन की रक्षा का पक्का वचन निभाना ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ के देववाणी का निर्वहन ही तो है। आइये! हम सब इस विशिष्ट सूत्र राखी के संकल्पों को जीवन में उतारें और समाज में शांति, सौहार्द का मार्ग प्रशस्त करने व नर-नारी के प्रति पवित्र दृष्टि अपनाने का अंतर में भाव जगायें, तभी इस पर्व की सार्थकता है।
Wednesday, 29 July 2020
The Gift
Saturday, 25 July 2020
Eating a Piece of Fruit | Living with Meditation
Eating a Piece of Fruit: This exercises the concept of living in the moment, the basic requirement for this exercise is to forget all the concepts and think of yourself as an alien. Keep an orange in front of you and notice it.
- Set aside all your thoughts, ideas and emotions and look at it as you are seeing it for the first time.
- Pick up that orange and feel its texture, notice the shape, size, colour and the smell of it.
- Peel the orange and feel all its layers running through your fingers, observe the weight of the fruit in your hand and the flesh of it.
- Raise the fruit to your lips and stop it right before eating it, smell it before biting into it.
- Bite into the fruit slowly, feel its texture and the flesh of it. Let the juice flow in and fill your tongue with flavours.
- Continue to eat the fruit, let the juice and the texture enrich your senses. Keep repeating until the fruit is finished.
Friday, 24 July 2020
Food For Thought
Giving in to one's gluttony, disregarding
diets and collecting calories is how we have come to terms with our eating
habits. Whatever is cheap or convenient has become the standard knowledgeable
people stoop to and the most disappointing aspect of it all is, we're okay with
it. Since when did you start thinking that your unhealthy lifestyle won't catch
up to you? The consumption of food is not merely an activity one indulges in
three times a day. There's a science behind the art of eating and you'll be
surprised how effective it can be.
Each item of food offers a different
nutrition and every nutrient is beneficial to the body and mind. A subtle part
of the food we eat also becomes psychosomatic i.e. it becomes part of our body
as well as out mind. Our body is made up of 70% water and the rest comprises of
organs, these organs function on different micronutrients. Micronutrients cause
our bodily functions to keep going, each organ needs different nutrients hence
inducing a balanced diet. A balanced diet can be achieved by eating your food
in small portions, dividing it in such a way that your body never runs out of
fuel and keeps you energetic throughout the day. The concept of a balanced diet
has existed since the beginning of time but initially originated from a Sattvic
diet, which is also an anti-carcinogenic diet; a diet we should all embrace
with open arms.
“Sattvic” derived from Sanskrit, means pure
and divine. To follow a Sattvic diet, is to prepare your meals using the right
plan-based ingredients. Sattvic diet states that one should not only eat for
taste; the food needs to be nutrient rich and should not be the cause of
restlessness or fatigue, which would make it “Rajsic” or food from a 'Rajsic'
diet. The Rajsic diet is strictly opposed in spiritual lifestyles. However,
things can be worse if you're following a diet that makes one gain weight and
turns one lethargic; in other words a “Tamsic” diet. These are the different
types of diets cited in the Vedas.
As we evolve towards a technologically
advanced world, it becomes essential for everyone to follow a healthy routine.
On the same lines one must exercise for at least half an hour a day and eat at
equal intervals in relatively smaller portions. Most importantly, one must pray
before eating, for anything we ingest with good intentions, becomes part of us
in a positive manner, furthermore feeding the Soul.
The Soul is wrapped inside five layers
called Pancha kosha of Arishadvarga. The outermost of the Pancha koshas is the
Annamay Kosh (Food Sheath); beneath it lies the Pranmay Kosh (Vital Air
Sheath); beyond that lies the Manomay Kosh (Mind Sheath); then lies the
Vigyanmay Kosh (Intellect Sheath) and finally, the Aanandmay Kosh (Bliss
Sheath) where one attains ceaseless joy, unrelated to the body or mind. The
right Guru can help you reach the innermost Kosh by guiding your diet and
thoughts.
Eating what is right for us (not becoming
slaves to our taste buds) is the spiritual way of living. Craving for the taste
of food is just momentary; the satisfaction that follows never lasts longer
than a day at most. Food is merely a fuel for your bodily functions. A
spiritual being does not work according to the body, so eat enough for your
body to function well, but do not run after taste. One must eat to live and not
live to eat.
Thursday, 23 July 2020
Tuesday, 21 July 2020
भगवान का होने के लिए भारी साहस चाहिए
‘‘यह राह नहीं है फूलों की, कांटे ही इस पर मिलते हैं’’ इन पंक्तियों में आध्यात्मिक मार्ग-परमात्मा के मार्ग पर चलने को कांटों भरा मार्ग बताया गया है। वास्तव में बात सही है। क्योंकि धार्मिक होना आसान है, परमात्मा को मानना आसान है, पर परमात्मा व गुरु हमारा है, हम गुरु व परमात्मा के हैं, यह कह पाना बड़े साहस का विषय है। इतना कहने के लिए सम्पूर्ण शरीर के कोषाणु को शक्ति लगाना पड़ता है। रोम-रोम से अपने को गुरुमय, परमात्मामय अनुभव करना पड़ता है। इसके बिना जीवन में परमात्मा आता भी नहीं है। पर यदि जीवन में एक बार भी यह साहस व्यक्ति जुटा सका, तो जीवन बदल जाता है। जीवन सुख-शांति-संतोष, समृद्धि प्रगति से भर उठता है।
तब भगवान व गुरु की कृपा साथ-साथ चल पड़ती है। पूज्यवर श्री सुधांशु जी महाराज कहते हैं कि ‘‘अंदर यह भाव जगाने के लिए जो तुम्हारे रास्ते में कांटे बोता है, उसके रास्ते में तुम्हें फूल बिछाना पड़ेगा, सबके प्रति अपना प्रेम भेजकर देखोगे कि जो दूसरों की राह में फूल बिछाने वाले हैं, उन्हें कोई कमी नहीं रहती। परमात्मा को पाने का यही एक मार्ग है।’’
पीड़ा में मुस्कानः
जिन्दगी तो एक यात्रा है, एक न एक दिन पूरी हो जाएगी। पर परमात्मा साथ है तो पता भी नहीं चलता, यह सफर कब पूरा हो गया। आंसू पीते हुए आगे बढ़ते रहना, यही तो भक्त की पहचान है।
दूसरों के आंसू पीकर पीड़ा दूर करने वाले ही महान पुरुष बनते हैं।। इसलिए आपके पास पीड़ाएं हैं, तो सहजभाव से मुस्कराइये, उन पीड़ाओं को सहते हुए हिम्मत से आगे बढ़ते रहें। दुःख आए तो भगवान का ध्यान कर लें। सुख आये तो उसे सेवा से जोड़ लें। निश्चित वह वापिस आएगा और अपार सुख को देकर जाएगा। सुख की वर्षा होगी, उसकी इसी कृपा का भरोसा रखें, फिर देखें सब कुछ बदलता दिखेगा।
महापुरुषों की शरण ग्रहण करें, सत्संग से जुड़ें, क्योंकि महानपुरुष दूसरों के आंसू स्वयं पीकर उनको प्रसन्नता देते आये हैं। इसलिए उनका संग-साथ जिन्दगी बदलने के लिए एक प्रयोगशाला है। इससे जीवन जीने की नई दिशा मिलती है और दिशा बदलने से दशा बदल जाती है।’’ दिव्य प्रकाश जीवन में भर उठता है। परमात्मा प्रकाशों का ही प्रकाश तो है, इस तरह जीने वालों को दुनिया का घोर अंधेरा उस छू नहीं सकता। इस तरह जब परमात्मा से सम्बन्ध बनाएंगे तो जीवन में चमत्कार घटेगा।
तब मिलेगा सब कुछः
इसी प्रकार भगवान से जब भी कुछ मांगो, तो दूसरों की पीड़ा दूर करने की शक्ति मांगो। उससे प्रार्थना करो कि मेरे अन्तःकरण को सुन्दर बना दो तथा सभी सुखी हों, निरोग हों, कोई दुःख-पीड़ा न देखे। प्रार्थना करो कि सबके आंसू छीनकर प्रसन्नता दे पाऊं, दुःखी लोगों की पीड़ा दूर कर सकूं, यही जीवन का लक्ष्य बने। एक ही भावना रहे कि प्रभु ऐसी कृपा करो कि लोगों के जीवन में आनन्द भर सकूं।’’ यह ख्याल लगातार बना रह सके, तो समझ लो परमात्मा जीवन में उतर रहा है। यही जीवन साधना है।
ऐसे साहसी भावों के बाद ही परमात्मा हमारी बुद्धि के रथ को संभालेगा। तब न लालच रहेगी, न दण्ड का डर, भक्ति करोगे तो श्रद्धा और भावना से और अनन्त-अनन्त कृपाओं से भर उठोगे। यही सच्ची बन्दगी है, सच्ची भक्ति होगी। इस तरह सच्चे निर्मल हृदय से उसकी शरण में जाओगे, तो सब कुछ मिलेगा। यही भगवान के प्रति वफादारी है।
शिकायती न बनेंः
ध्यान रखें निष्ठावान इंसान कभी शिकायत नहीं करता। अगर मन में शिकायत आने लग जाए, तो इसका मतलब है निष्ठा में कमी है। ऐसी अवस्था में अपने को सम्भालते चलें। शेख सदी की तरह। शेख सादी एक अच्छे कवि चिन्तक, विचारक, मनीषी तत्त्वज्ञ थे। एक दिन बादशाह की तरफ से निमंत्रण मिला कि शेख साहब आकर हमारे दरबार में अपनी कविताएं सुनाओ। उनकी दरबार में जाने की इच्छा तो बहुत थी, लेकिन जब अपने कपड़ों की तरफ उन्होंने देखा तो उन्हें बहुत दुःख हुआ कि मेरे पास अच्छे कपड़े भी नहीं हैं।
मैं वहां जाऊंगा तो अपने आप पर शर्म आएगी। उन्होंने वहां जाने का विचार बदल दिया। थोड़ी देर बाद वे हाथ फैलाकर अपने प्रभु से कहने लगे कि तूने मुझे गुण दिया कि कविता रचता हूं। लेकिन तूने मुझे दीन हीन भी बना दिया कि आज राज दरबार में जाने की स्थिति मेरे पास नहीं है। मुझे तुझसे शिकायत है खुदा। ऐसा कहकर वे रो पड़े, तभी वे देखते हैं कि एक लंगड़ा इंसान कंधे पर खिलौने लटकाए उनके सामने आकर खड़ा हुआ। शेख सदी ने उसे देखकर कहा, ‘‘क्यों भाई भूख लगी हो तो कुछ खाने के लिए लेकर आऊं।’’ उसने गर्दन हिलाकर मना कर दिया।
हम भगवान के होकर जियेंगे:
तभी उन्होंने देखा कि उस खिलौने वाले का एक हाथ मुड़ा था। टांग भी एक ही काम कर रही थी, उसने लकड़ी का सहारा ले रखा है। फिर भी उसने कहा-मुझे मालिक की दी हुई रोटी बहुत है। मेरे पास बहुत कुछ है। खिलौने वाले व्यक्ति ने कहा साहब मैं सपने बेचता हूं। इन छोटे-छोटे बच्चों के पास जाकर जब खिलौने बेचता हूं, तो ये हमारे खिलौने खरीदकर सपनों की दुनिया में खो जाते हैं। जब ये बच्चे हंसते हैं तो मेरे दिल को सुकून मिलता है। इन सपनों को बेचने से जो दो जून की रोटी मुझे मिल जाती है, उससे गुजारा करता हूं। मुझे अपने खुदा से कोई शिकायत नहीं, उसने मुझे बहुत दे रखा है।
शेखसदी ने उसकी निष्ठा देख भाव-विभोर हो उठे और अंदर से साहस जगाया कि हे भगवान आज से भगवान हमारा है और हम भगवान के होकर जियेंगे। वास्तव में जिसमें इतना साहस होता है, उसी पर भगवान कृपा करते हैं और फिर भगवान का हो लेता है।
Monday, 20 July 2020
Saturday, 18 July 2020
Venus and Mars | Happy Sawan Shiva-Ratri
In search of the fine line between emotions and
practicality, we wage a war each day between our heart and mind or more
specifically between our feminine and masculine energies. Is there a conclusion
to this debate? Is there a middle path that one can travel without suffering
from doubt, confusion and uncertainty?
We can find this phenomenon occurring in the duality of
almost everything in life; fragrant flowers have sharp thorns for protection,
water can be as calm as a lake yet as violent as a flood; for every good there
is evil, and in every evil there is good, and this being said, every man and
women being absolute opposites, live in harmony and have sustained life this
far. Such is the beauty of nature; it has created a counter part for everything
to create a balance in the world. Likewise, the world has two types of
energies, masculine and feminine, and claiming one can spend their life being
dependent on just one energy is ethically, fundamentally and universally
impossible. Without a balance, society cannot be maintained, which begs the
question, is there a way to possess both these powers in one self and maintain
a balance?
Lord Shiva gave an answer to this question, when he formed
the avatar of Ardhnareshwar, half man, half woman. Anyone on Earth can posses
similar powers and come to an equilibrium. Just like men and women consisting
of their own unique characteristics, God blessed each individual with masculine
and feminine energies in varying ratios. Men are capable of letting their
hearts dictate terms their mind’s would not normally let them and Women are
even more capable of making rational decisions that often go against their
emotional nature. Humans have two energies which both need to be used at times
to maintain equilibrium and live a balanced life.
There are two holes within the spine, on either side which
are like conduit pipes for all the nerves to pass. This is the Ida and the
Pingala, the left and right channel. In the energy body or Pranamayakosha,
there are 72,000 nadis. Nadis are paths or passages of energy in the system,
which spring from 3 basic nadis – the left, the right and the central – the
Ida, Pingala, and Sushumna. These 72,000 nadis don’t have a physical
manifestation but have 72,000 different ways in which the energy can move.
Sushumna is the most significant aspect of human physiology. Life really
begins, when energies enter into the Sushumna nadi.
The Ida and Pingala
represent the basic duality of life. It is this duality, which we traditionally
personify as Shiva and Shakti. Men are more career oriented and typically
belong to the workaholic category, women are more accepting and outgoing. Women
know how to balance between personal and professional life better than men.
Where men are more driven by money and power, women are more driven by passion
and creativity. To maintain equilibrium and balance the two energies within
each self, one should meditate. Mental imbalance happens when either of the
energy’s overpowers the other making the person lose their balance easily causing
them problems in their personal and professional life.
Thursday, 16 July 2020
Wednesday, 15 July 2020
हम संयमित जीवन जिएं
हम अपनी पूरी आयु जी सकें । हमारी अकाल मृत्यु ना हो, इसलिए हमको संयमित जीवन जीना पड़ेगा । ( ऋग्वेद)
मनुष्य के शरीर और मन में शक्तियों का अपार भंडार है, उसको नष्ट होने से बचाएं। उसका सदुपयोग करके आशाजनक सफलता प्राप्त करें।
क्यों कि हम अपनी इन बहुमूल्य शक्तियों को नष्ट करते हैं और इस शरीर को शक्तिहीन
बना देते हैं।
सामान्यः शरीर और मन अपने-अपने आहारों द्वारा निरंतर शक्तियों का
उपार्जन करते रहते हैं। इससे हमारी सामर्थ्य बढ़ती रहती है। इस शक्ति को अपव्यय से
बचाकर रचनात्मक दिशा में उपयुक्त कर किसी
भी क्षेत्र में प्रगति की जा सकती है। संयम का अर्थ है, शक्तियों के अपव्यय को रोकना। यह अपव्यय हमारी इन्द्रियों द्वारा ही होता है।
इसमें प्रमुऽ हैं जीभ और जननेन्द्रिय।
जीभ के द्वारा हम बकवास, निंदा, चुगली, गप्पे हांकने में अपनी शक्तियों का नाश करते हैं । यदि जीभ को असत्य और कटु
न बोलने के संयम से बांध दिया जाय, तो हमारी वाणी में सत्यता और प्रभाव बढ़
जाता है। उसमें श्राप और वरदान देने की क्षमता आ जाती है, जैसे हमारे ऋषि और मुनियों को प्राप्त था। मौन को तप माना गया है। तपस्वियों
जैसा मौन रहना तो मुश्किल है, परंतु बड़बोलेपन पर तो नियंत्रण रखा जा
सकता है। जितना आवश्यक हो उतना ही बोलें।
जीभ का दूसरा असंयम है ‘चटोरापन’ । स्वाद के लिए हम असभ्य
पदार्थों को खाते रहते हैं । स्वाद के चलते हम भूल से अधिक खा लेते हैं, जिससे अपच हो जाता है । इससे पाचनतंत्र
कमजोर होने लगता है । स्वाद से अधिक जरूरी हमारा स्वास्थ्य है, जो लोग स्वाद के चलते स्वास्थ्य को अनदेखी करते हैं । ऐसे लोग अपने स्वास्थ्य
को लेकर परेशान रहते हैं ।
इन्द्रियों का संयम तो बहुत जरूरी है। इंद्रियों का असंयम शरीर
के सार तत्व को नष्ट कर देता है। इस सार तत्व से ही शरीर में ओजस, चेहरे पर चमक, वाणी में प्रभाव, आँखों में ज्योति, मस्तिष्क में मेधा और स्वभाव में साहस का प्रभाव होता है। इस सार तत्व का
जितना अपव्यय होता है, मनुष्य शारीरिक और मानसिक रूप से उतना ही
दुर्बल होता जाता है। अति कामुक व्यक्ति न निरोगी रह सकता है और न जीवन का अधिक
आनंद उठा सकता है।
संयम अर्थात् शक्तियों का संचार। असंयम अर्थात् सामर्थ्य की बर्बादी।
इसीलिए असंयम से अपने शरीर को बर्बाद होने से रोकें और संयम से अपने को शक्तिशाली
प्रभाववान तथा बुद्धिमान बनाएं। यही सुखी व स्वस्थ जीवन का राजमार्ग है।
Monday, 13 July 2020
It is all in you - Har Har Mahadev
Friday, 10 July 2020
बीमारियों से बचने के लिए ध्यान करें ध्यान-योग
पूर्ण विश्राम की अवस्था में सांसों के
प्रति सजग होना ही ‘ध्यान’ है। पूर्ण मतलब शरीर, मन और हृदय अर्थात् क्रिया, सोच-विचार और भावनाओं इन तीनों के विश्राम
की अवस्था ही ‘ध्यान’ है।
‘ध्यान’ प्रयास से नहीं आता है। जब भी आप ‘ध्यान’
जगाने का प्रयास करेंगे, तो विघ्न पड़ता है, परेशानियां आती हैं। जब आप स्वयं को पूरी तरह छोड़ देगें, तो धीरे-धीरे ‘ध्यान’
लगने लगेगा और आपको पता भी नहीं चलेगा।
हमारी क्रियाओं के तीन तल, तीन स्तर हैं-एक शरीर का तल है, जहां हम कुछ कर्म करते हैं। दूसरा तल मन
का है जहां से हम सोचते-विचारते हैं। तीसरा तल है हमारे हृदय का, भाव के जगत का, जहां हम अनुभव करते हैं भावनाओं को। इन
तीनों के भीतर एक चौथा तल है। वह किसी क्रिया का तल नहीं है, वहां सिर्फ बीइंग है-होना है, सिर्फ चेतना है, जहां हम शरीर, मन या हृदय से कुछ भी नहीं कर पाते हैं।
उस बीइंग में होने का नाम ‘ध्यान’ है।
योग-ध्यान का स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर
काफी चर्चा चलती है। बीमारियों से बचने के लिए दो उपाय हैं-एक है दवाइयां लेना और
दूसरा है ‘ध्यान’। मेडिकल साइंस रोग को शारीरिक या मानसिक
विकृति मानता है, जबकि ‘ध्यान’
से मनुष्य को परम शांति की अनुभूति होती है।
उल्लेखनीय है कि आदमी सिर्फ शरीर या आत्मा
ही नहीं है-वह दोनों ही है। दवा शरीर को स्वस्थ करती है। ‘ध्यान’
मन, अंतस को स्वस्थ करता है।
स्वस्थ होने का अर्थ आमतौर पर लोग मानते
हैं कि बीमार न पड़ना। यदि कोई बीमार नहीं है तो वह स्वस्थ है, लेकिन वास्तव में क्या वह व्यक्ति स्वस्थ
है। लम्बे समय से चिकित्सा जगत स्वास्थ्य की ऐसी ही परिभाषाएं देता रहा है। इसका
समाधान हमारी भारतीय मनीषा पद्धति में प्राचीनकाल से ही है।
आधुनिक मनोविज्ञान का मानना है कि कई
बीमारियां तो केवल शरीर में रासायनिक परिवर्तनों का परिणाम है, लेकिन शरीर में होने वाले नकारात्मक
जैव-रासायनिक परिवर्तनों को रचनात्मक दिशा देने में ‘ध्यान’
ही सक्षम है।
मेटाबॉलिज्म से लेकर हृदय गति, रक्तचाप,
श्वसन और मनोरासायनिक परिवर्तनों को भी शामिल किया जाता है। सभी वैज्ञानिक ‘ध्यान’
के महत्व को स्वीकार करते हैं, लेकिन ‘ध्यान’ के बारे में आम धारणा है कि यह बहुत कठिन
प्रक्रिया है। हजारों वर्षों से ‘ध्यान’ की साधना भारतीय ऋषि-मुनि
करते रहे हैं। अब तो यह मान लिया गया है कि यह साधु-संतों के लिए ही नहीं सबके लिए
है। यह केवल अभ्यास की चीज है, इसे कोई भी कर सकता है।
आज की जीवन शैली ऐसी है कि हमें तमाम
आवेगों और आकांक्षाओं का दमन करना पड़ता है। प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि हम गहरी
सांस भी नहीं ले पाते हैं। जीवन में जहां से हमें ऊर्जा मिलती है वे स्त्रोत्र
सूखते जा रहे हैं। इन स्त्रोत्र को फिर से सक्रिय करने का एकमात्र उपाय ‘ध्यान’
ही है।
‘प्रतिरक्षा’ एक जैविक क्रिया है जो संक्रमण, बीमारी या अन्य अवांछित जैविक हमलावरों के
लिए पर्याप्त जैविक रोग प्रतिरोध होने की स्थिति का वर्णन करती है। प्रतिरक्षण
प्रणाली में अंग, कोशिकाएं, टिशू और प्रोटीन इत्यादि शामिल हैं। ये
सभी तत्व मिलकर शरीर को सही तरीके से काम करने में सहायक बनते हैं। प्रतिरक्षा
प्रणाली मानव शरीर को बीमारियों, संक्रमण और वायरस इत्यादि से लड़ने में सहायता करती है।
आजकल कोरोना वायरस पूरे विश्व को अपने
गिरफ्रत में ले चुका है। असंख्य लोग इसकी गिरफ्रत में हैं। तमाम लोग कोरोना से मर
भी रहे हैं। ऐसे में योग, प्राणायाम और योग-ध्यान से हम इम्यून सिस्टम,
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर इस महामारी से अपने को बचा सकते हैं, जबकि अभी तक इसके लिए दवा की खोज नहीं हुई
है। ऐसे में आप योग-ध्यान से अपने इम्यून सिस्टम को बढ़ाकर किसी भी रोग से बच सकते
है। कहावत भी है-करो योग, रहो निरोग। निर्विचार होकर ध्यान में उतरिये। ध्यान स्वतः लगने लगेगा।
योग-ध्यान करें इससे आप बीमारियों से भी बच सकते है।














