प्रगति और स्पर्द्धा मानव जीवन के विशेष गुण हैं और इसी से इसमें सरसता है। प्रतिस्पर्द्धा, पुरुषार्थ, सूझ-बूझ एवं संतुलन को विकसित करके ही जीवन को आनंदमय बनाया जा सकता है। परिस्थितियों से संषर्घ द्वारा ही प्रगति संभव होती है। कठिनाइयों, अभावों, प्रतिकूलताओं और संघर्षों का सृजन इसीलिए हुआ है कि उनसे टकराकर मनुष्य अपनी क्षमता और प्रतिभा का विकास करते हुए आत्मबल और मनस्विता की महान विभूतियों का संग्रह कर सके। पर अधिकतर व्यक्ति जीवन में जरा सी भी कठिनाई आने पर विचलित हो जाते हैं। निराशा और हताशा की भावना उनकी कठिनाइयों को और भी अधिक बढ़ा देती है।
शक्ति की रचनात्मक प्रयोग
कार्यक्षेत्र में प्रवेश करने वाला कभी अनुकूलता का लाभ लेता है और कभी प्रतिकूलता का सामना करता है। लाभ मिलने पर हर्षोन्मत्त होकर उछलने वाले और हानि होने पर रोने वालों की स्थिति बड़ी ही दयनीय होती है। संघर्षशील संसार में अपनी समर्थता एवं दृढ़ता को प्रदर्शित कर सकने का सुख उन्हें नहीं मिल पाता। इस संघर्ष में सफलता उन्हीं को मिल सकती है जिनमें शारीरिक शक्ति के साथ-साथ आत्मिक शक्ति की भी प्रचुरता हो। अकेला शारीरिक बल विवेक के अंकुश के अभाव में लोगों के लिए समस्याएं ही पैदा करता है। शक्ति की रचनात्मक प्रयोग ही सबके लिए हितकर होता है।
कितनी भी विषम परिस्थितियां हों, अपने को आवेश से बचाकर मानसिक संतुलन कभी भी खोना नहीं चाहिए। असफलताएं हमारे धैर्य, साहस, संतुलन, पौरुष और विवेक को चुनौती देकर हमारे आत्मबल को बढ़ाती हैं। संघर्ष से प्राप्त सफलता का स्वाद कितना मधुर होता है, पसीने की कमाई से कितना आनंद मिलता है, इसे हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं। प्रतिकूलता से संघर्ष करने की शक्ति ही हमें ओजस्वी, तेजस्वी और वर्चस्वी बनाती है।
दीदी आपको मेरा सादर प्रणाम स्वीकार हो। स्पर्धा से ही प्रगति संभव है और आपने जीवन में उत्थान के लिए विषम परिस्थितियों का मुकाबला निर्भीकता के साथ करने की प्रेरणा देने के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद। दयानन्द राय, विश्व जाग्रति मिशन सदस्य
ReplyDeleteदीदी ठीक कहा।
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