जीवन में हर व्यक्ति प्रभावशाली बनना चाहता है। लेकिन वह सफल हो कैसे ऐसे कौन से अस्त्र हैं जिनसे मन चाही सफलता मिलती है, कौन से ऐसे कारण हैं, जिनसे सफलतायें बाधित होती हैं। पुरुषार्थ का वैसा सुपरिणाम नहीं मिलता, जिसकी अपेक्षा थी। भारतीय ऋषियों तथा आधुनिक वैज्ञानिकों ने व्यक्ति के आभा मण्डल को इसका बड़ा कारक बताया है। आभा मण्डल मलिन होता है तो सफलतायें बाधित होती हैं। व्यक्ति चाहता है कि दिन भर उसका औरा अच्छा रहे। क्योंकि आभा मण्डल से ही बड़े-बड़े लक्ष्य जीते जाते हैं। बीमार आभा मण्डल तो व्यक्तियों को बोझ बना देता है। योगियों का मत है कि जब व्यक्ति बीमार होते हैं, तो बीमार होने के तीन महीने पहले ही उसका औरा डैमेज होना शुरू हो जाता है। सच कहें तो प्रकृति ने हर व्यक्ति के चारों ओर प्रकाश घेरा खींच रखा है। प्रकाश के घेरे में मैन्टल औरा, फिजिकल औरा, इमोशनल औरा आदि अनन्त आभायें समाहित हैं। इसीलिए योगी, संत भाग्य व स्वास्थ्य को जगाने के लिए आभा मण्डल जगाने की साधना कराते हैं।
आइये खोजते हैं वे कारक जिनसे आभा मण्डल को प्रभावशाली बनाया जा सकता है। इसमें हैं।
आध्यात्मिक, प्रगति की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है प्राणायाम। एकदम से प्राणायाम करना आध्यात्मिक व शारीरिक दोनों दृष्टियों से ठीक नहीं माना जाता। इसीलिए योगी पहले थोेड़ा श्वास भरकर धीरे-धीरे छोड़ते हैं। श्वांस धीरे धीरे भरना भी एक क्रिया है और धीरे-धीरे छोड़ना दूसरी क्रिया है। श्वास को बाहर फेंकने की क्रिया रेचन क्रिया कहलाती है। इसके बाद बाहर ही श्वास को थोड़ी देर तक रोकना तथा घुटन होने पर पुनः धीरे-धीरे श्वास अंदर लेना भी एक क्रिया है। इसके बाद सांस जैसी चल रही है, उसे वैसी का वैसी रोक लेना जैसे ही घुटन होने लगे, फिर उसे सामान्य करने से शरीर में ऊर्जा धारण की शक्ति पैदा होगी।
वास्तव में प्राणायाम एक प्रकार का विज्ञान है, इसलिए सर्वप्रथम इसी विधि से करें, फिर जैसे-जैसे रुचि बढ़ेगी, वैसे-वैसे आगे का रास्ता खुलता जाता है।
श्वांस पर ध्यान देते हुए सांस को रोके, घुटन लगे तो सांस को धीरे-धीरे सामान्य कर लें। इससे सैल्स, कोशिकाओं में आक्सीजन ठीक मात्र में पहुंचती हैं और वे सक्रिय होते हैं। उनके अंदर की क्षीणता, कमजोरी मिटती है। हां श्वास को इतना अवश्य भरिये कि फेंफड़े पूरी तरह से भर जायें। खास बात कि फेंफड़ों के बीच एक गड्डा होता है, इसे आत्म स्थान कहते हैं। विद्वानों का मत है कि प्राणायाम के समय इसे बाहर की तरफ उभार कर रखने से साधक में आत्म-सम्मान, आत्म शक्ति बढ़ती है। अर्थात् फेफड़े श्वास से पूरे भर जायें, आत्म स्थान उभरता हुआ महसूस हो, फिर छोड़ते समय दुगनी देर लगायें।
इस क्रम में चेहरे पर शांति, माथा बिल्कुल शांत, ठण्डा रखें। मधुरता के साथ श्वांस धारण करें। घुटन लगे तो धीरे-धीरे श्वास को बाहर छोडें। उसी तरह फिर से श्वास भरें, चेहरे पर तनाव नहीं, फिर श्वास को धीरे-धीरे छोड़ें। साथ ही कुण्डलिनी स्थान व शक्ति के स्थान पर शिव और शक्ति को एक साथ बैठे अनुभव करें। अपनी अंतः ऊर्जा को भगवान की तरफ लगाने का अंतःकरण में भाव आने दें। इस प्रकार श्वास भरना अंदर रोकना, धीरे-धीरे छोड़ना। इसके बाद बाहर रोकना, फिर धीरे-धीरे गहरी श्वांस लेना। साथ ही चेहरे पर प्रसन्नता व आनन्द भाव सदैव बनाये रखने से हृदय में दिव्य अनुभूति और सम्पूर्ण शरीर में एक विशेष पुलकन अनुभव होती है। यह दिव्य पवित्रता भरी पुलकन है। जो साधक के आभा मण्डल को जगाने में मदद करती है।
2. आंखों से मुस्कुराने का अभ्यास:
इस प्राणायाम के साथ एक सामान्य सी योग क्रिया भी जोड़ें। इसके तहत साधक सामान्य रूप से दो सौ मीटर दूर देखते हुए अपनी आंखों से मुस्कुराने का अभ्यास करें। आंखों से मुस्कुराने का कार्य तभी सम्भव है, जब आंखों में चमक होगी। सम्भव है आप प्रसन्न हैं, लेकिन चेहरे से, यदि आंखों से प्रसन्न हैं तो बड़ी बात है। ध्यान रखें सीधे देखते हुए आंखों को जो खुशी मिलती है, उससे भी अधिक खुशी मुस्कुराहट भरी आंखों से मिलती है। इसलिए आंखों से मुस्कुराहट जीवन की बड़ी कला है। जीवन में परमात्मा की कृपा वर्षा का यह प्रमाण भी है। यह सज्जनता भरी दैवीय मुस्कान का अभ्यास है।
इस अभ्यास से चेहरे पर आकर्षण बढ़ता है। आंखों की ज्योति बढ़ेगी, हॉर्मोंस में सन्तुलन लाने में भी यह सहयोगी होता है। यह भावचक्र यानी भावनात्मक औरा ठीक करने के साथ-साथ ब्रह्माण्ड में फैली दिव्य एनर्जी ग्रहण करने का साधन है।
प्रश्न आता है कि ये औरा कमजोर कैसे पड़ता है? तो इसके कई कारण होते हैं। व्यक्ति के औरे में कमजोरी किसी अन्य नकारात्मक औरे से टकराने पर भी आती है। तब आवाज दब जाती है। इसी तरह जब सामने वाले से धूर्तता प्रकट करने की इच्छा जाग जाती है, तो भी औरा डैमेज हो जाता है। इसलिए यदि अपना आभा मण्डल औरा ठीक रखना है, दूसरे के दुष्प्रभाव से बचना है तो सदैव सकारात्मक रहें। और आभा मण्डल को प्रखर करते रहें।
3. अतीत-भविष्य को भुलायें :
शांत रहें, अतीत और फ्रयूचर को याद न करें। मन को दिव्यता से जोड़ें। क्योंकि मन घड़ी के पैण्डुलम की तरह यात्र करता है, कभी पीछे भूत की बात, भविष्य की बात, फिर मन वर्तमान। वैसे वर्तमान में तो टिकता ही नहीं। इसलिये दुखी होता रहता है। ऐसे में हमें मन की आंखों से प्रयास पूर्वक शांत, प्रसन्न, आनन्दित भाव के साथ दूर ऊंचे विचारों पर देखने का अभ्यास करना चाहिए। ध्यान पर जितनी भी देर बैठते हैं, यही अभ्यास करें।
4. प्रातः बेला में भ्रमण करें :
औरा मजबूत करने के लिए सुबह घास में नंगें पांव चलें। सुबह की धूप में थोड़ी देर टहलें। इससे विटामिन डी तो मिलेगी ही, साथ ही मन व जीवन पर सुबह की ओजोन व आक्सीजन का सुखद प्रभाव पड़ेगा। हो सके तो पक्षी की बात सुनें, उससे बातें करें। हर ओर मधुरता की अनुभूति करें। जैसे बच्चे की बातों में मधुरता, हवाओं में मधुरता, सागर की लहरें उठती हैं, नदी बहती है तो मधुरता। चहुं ओर मधुरता की अनुभूति का अभ्यास करने से भी आभा मण्डल जागृत होता है।
5. मन को जुगाली से रोकें :
सच कहें तो मन ऐसा जानवर है, जो चर चुकने के बाद उसी की जुगाली करता रहता है। अतः सारा दिन जुगाली करने से आभा मण्डल धुंधला हो जाता है। जुगाली करके हम अपने को कमजोर करते हैं। जबकि जरूरत है, चेहरे पर प्रसन्नता लायें और सूरज को प्रसन्न भाव से प्रणाम करें। खुश रहें, आनन्दित रहें, विश्वास करें, तो कृपायें स्वतः चारों ओर से घेर लेंगी।
6. ओंकार उच्चारण करें
आभा मण्डल जगाने के लिए फेफड़ों में श्वास भरकर ओंकार का उच्चारण करें। उच्चारण ऐसा हो कि जीभ मुख के बीच खड़ी होकर उस ध्वनि को प्रणाम करे। ओंकार उच्चारण के भी तीन भेद हैं। प्रथम स्वर मंद ध्वनि ऐसी की मणिपुर चक्र प्रभावित करे। इस अवसर पर साधक भय से निर्भयता की ओर जाता है। कायरता से वीरता की ओर, विषमता को समता में बदलने की यात्र का भाव मन में लायें। व्यक्ति को जब भय लगता है, तो उसके पेट व नाभि पर असर होता है। इसीलिए भय को हटाने, साहसी बनाने के लिए फौजी लोगों की कमर कसवायी जाती है जिससे नकारात्मक से प्रभावित न हो।
इसके अगले चरण में ओम् ध्वनि नाभि केन्द्र को प्रभावित करती हुई प्रकट हो, यहां पर नीचा स्वर बहुत ही नीचा स्वर रहे। जिससे नाभि केन्द्र सीधे प्रभवित हो सके।
ओýम् उच्चारण इतना महत्वपूर्ण है कि यदि इसके स्वर उच्चारण भेद को समझ लें, तो इसी से आत्मकल्याण हो जाता है। ध्वनि और ओंकार उच्चारण का एक प्रकार का वैज्ञानिक गठबंधन जो है।
फिर क्रमशः स्वर उच्चारण इस तरह हो कि विष्णु, रुद्र, ब्रह्म क्रमशः इन ग्रन्थियों पर प्रभाव पड़े। पर इस क्रम में स्वर मध्यम रखें। ओम् का उच्चारण हृदय चक्र को प्रभावित करे। तीसरा उच्चारण चरण जो कण्ठ चक्र को प्रभावित करे। इसके लिए नासिका से टकराती हुई ध्वनि आज्ञा चक्र से सहड्डार तक ले जायें।
गुरुओं के चरणों में बैठने से बारीकियां अपने आप मिलती हैं।
भावना करें फेंफड़ों के बीच मानों उसकी पंखुड़ियां फैल रहीं है। हृदय कमल खिल रहा है और उच्चारण मानो प्रसारण है। ब्रह्माण्ड से परमात्मा का प्रसारण पास आ रहा है। परमात्मा से आने वाली किरणों से प्रसन्नता, सुख, समृद्धि, शांति जागृत हो रही है। आनन्द में डूबे मन से आेंकार का उच्चारण हो रहा है। इसे रोक कर थोड़ी देर ऐसा महसूस करें मानो उच्चारण ध्वनि सुनाई दे रही है और मैं चार्ज हो रहा हूं, ऊर्जा ग्रहण करता जा रहा हूं। शक्तियां भर रही है। पूरे शरीर में इनका प्रभाव बढ़ रहा है।
7. आज्ञा चक्र से जगायें औरा
आज्ञाचक्र को जागृत करते हुए स्वर ऊंचा रखें और भाव करें वहां सूर्य और चन्द्र दो पंखुड़ियों का कमल है, इनके मध्य में एक स्वर्णिम शिव लिंग स्थित है। यह स्थान त्रिकुटि कहलाता है। उसी जगह ओम् का ऊंचा स्वर उच्चारित करें। आनन्द अनुभव करें कि चन्द्रमा के प्रभाव से प्रेम की किरणें छाई हुई हैं, शांति और शीतलता, स्वर्णिम प्रकाश से भाग्य जग रहा है। आनन्द बढ़ रहा है, प्रभु की कृपा मेरे माथे को छू रही है। मेरा सौभाग्य जाग रहा है।
महसूस करें कि मेरे रोम-रोम में यह ध्वनि बस रही है, ध्वनि पर ध्यान टिकायें। डूबते जाइये इसी ध्वनि में। अनुभव करें तनाव निकल रहा है और प्रेेम हृदय में जागृत हो रहा है और हम आभा से ओत-प्रोत हो चुके हैं।








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