Tuesday, 30 November 2021

Make Your Mornings ‘Better’ with Vedic Routine


 

Make Your Mornings ‘Better’ with Vedic Routine

Our Vedas are packed with deep-rooted knowledge, helping people to understand their body and mind. Ancient Indian sages deeply understood energies that people need, foods that are healthy for their body & mind and weather patterns that impact them.

According to these Vedic scholars, there is a unique connection between ‘nature and the structure of the human body. They stressed on creating firm morning regimens for a healthy and peaceful life. They called it ‘Dincharya’, the daily routine.

Anyone who adheres to this routine would stay fit despite changes in weather patterns. 

The Ideal Morning Routine

•             Wake up before sunrise. Stay in bed for a while for stretching; unwind slowly to tune into the rhythms of your mind and body.

•             After waking up, take a few deep breaths. Sit still and slowly straighten the spine.

•             Drink water, if possible, from a copper vessel. It helps in hydrating the tissues and to flush down the toxins that may have accumulated overnight.

•             Perform your day-to-day morning activities including oral care. Clean your tongue well as it is the only way to remove unnecessary toxins from your mouth and also improve the sensitivity of the taste buds.

•             Splash your face and eyes with cold water. It will freshen up your facial muscles instantly and wake you up completely.

•             Take out some time to Practice Yoga & Pranayama every morning. Practicing yoga brings inner balance and harmony.

•             Find a quiet, ventilated area at home and practice the super-healthy sun salutation to the best of your ability.

•             Offer your prayers, worship God with an engaged heart and mind. Express your gratitude to God for the new day and seek blessings for a pious day ahead.

•             Start your day by reading a shloka from your favorite scripture or with some positive affirmations.

Stick to the Vedic Dincharya

Try to follow this routine every day. In the beginning, this ‘Vedic Dincharya’ may seem difficult and time-consuming, but with daily practice it will seem a lot easier and enjoyable. The morning routine will empower you to take control of your physical and emotional states. It will also channel your subtle energies and keep you away from negativity.

Thus, when it comes to mornings, return to the Vedic era and stick to the Vedic daily routine. These rituals have the potential to build a life of best possible wellness that will purify, detoxify, and nurture your body, mind and soul.

The Way to Acquire the Real Spiritual Knowledge | भीतर से उदय होता है आध...

Monday, 22 November 2021

जीवन जीने और समझने का सही तरीका खोजें


 जीवन जीने और समझने का सही तरीका खोजें

प्रत्येक व्यक्ति बड़ा बनना चाहता है, कुछ कर गुजरना चाहता है, पर सदियों से चली आई अमीरी-गरीबी से भरी दल-दल वाली सोच के चलते वह फंसकर रह जाता है। कुछ लोग बड़े बनने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए बड़ा मकान, ऊंची प्रतिष्ठा-पद, बड़ी लग्जरी गाड़ी आदि जीवन से जुड़े साम्राज्य को इकट्ठा कर भी लेते हैं। तो दूसरे बहुत से वे लोग हैं जो अमीरी व साधनों को बड़प्पन का मानक मानकर तुलना वाली जिंदगी जीते हुए हताश, निराशा, हीनता, अभाव भरे जीवन के साथ दम तोड़ लेते है।

अपने जीने की कल्पना स्वयं करे

ऐसा हो भी क्यों न जब राजनेता, वैज्ञानिक से लेकर तथाकथित संत-विचारक सभी अपनी सोच व चिंतन को इसी परिधि में रखकर दौड़ रहे हों, ऐसे में आम जनमानस क्यों न उसी डाल में लटक कर जीवन खपा दे। आश्चर्य कि एक पिता दूसरों की नौकरी व मजदूरी करते हुए दुर्भाग्य के साथ अपनी जिन्दगी खपा देता है, पर वह अपनी संतानों को भी ऐसा ही जीवन जीना सिखा जाता है। क्योंकि उसकी सोच इसी चाकरी के इर्द-गिर्द ही जीवन भर घूमती रही। वास्तव में हमारी जिंदगी जो भी है वह हमारी सोच-परिवेश, आदतों एवं मन की एकाग्रता का ही परिणाम तो है।

                वेदों में वाक्य है कि बलशाली जीव अपने जीने की कल्पना स्वयं करे। अर्थात् व्यक्ति को उसकी अपनी सोच ही बलशाली बनाती है। हर व्यक्ति खुशी-सुख-सुविधा, परिवारिक सुख, लम्बी आयु, धन-समृद्धि आदि साधन चाहता है। अनेक विकसित देश इसमें समर्थ भी हैं। पर संसाधनों की चाहत वाले बड़प्पन ने उनका जीवन सर्वाधिक तनाव ग्रस्त कर रखा है। ऐसी मनोभूमि वाले लोग आत्महत्यायें भी अधिक करते हैं। यही हतोत्साहित होकर आपा खोने वाले लोग भी हैं। जबकि अनेक देश हैं जो साधन हीन होकर भी खुश है। पूज्य सद्गुरुदेव कहते हैं ‘‘इन खुशहाल जिन्दगी वालों की जीवन शैली नित्य व्यायाम, अच्छा भोजन, भ्रमण, कर्मशीलता, रिश्तों को सम्हालकर चलने, दूसरों की पीड़ा से जुड़ने, तनाव मुक्त रहने, सुख-दुःख में सहायक, प्रेरक बनने से शुरू होती है। ये किसी अन्य से तुलना नहीं करते। अहमहीन होते हैं, निराशा से बचते हैं और सबमें अपना आपा देखते हैं। यही जीने का अन्दाज उन्हें खुश रखता है।

‘‘जीवेम शरदः शतम्, पश्येम शरदः शतम्’’, शृणुयाम शरदः शतम्’’ इनकी पहचान होती है।

                शरीर संयम, विचार संयम, समय संयम, अनुशासनबद्ध जीवन इनकी दिनचर्या में है। आज विश्व में 20 प्रतिशत लोगों के पास 80 प्रतिशत शक्ति साधनों की समृद्धि है व 80 प्रतिशत लोगों के पास 20 प्रतिशत शक्ति साधन हैं, वे इनका उपयोग करते हुए किसी तरह जीवन जीते हैं। यह इसलिए क्योंकि ऐसे व्यक्तियों की आंतरिक ऊर्जा का विखराव अधिक रहता है। एकाग्रता की कमी रहती है, बार-बार मन केन्द्रित न होने से ऐसे लोग मन से बौने होते जाते हैं। अतः अंदर-बाहर से समृद्धि के लिए आवश्यक है बार-बार ध्यान बटाने से बचें। जीवन के बड़े गोल बनाये तथा उद्देश्य के निमित्त प्रार्थना, प्रयास करें। नित्य उठते ही दिनभर का लक्ष्य बनायें। सच कहें तो एक विश्लेषण के अनुसार नित्य के गोल को पूरा करने वाले इस धरा पर मात्र तीन प्रतिशत लोग ही हैं। इसीलिए लगभग तीन प्रतिशत ही दुनिया के टाप मोस्ट लोग होते हैं।

पंचवर्षीय योजना बनायें

                इसी प्रकार जीवन की गहराई से जुड़ी नकारात्मक आदतों को बदलने के लिए कुछ रचनात्मक प्रयोग अपनायें। पूज्यवर कहते हैं ‘‘जन्मदिन पर अपनी समीक्षा के साथ पंचवर्षीय योजना बनायें। ध्यान रखें जीवन में ध्यान भटकते ही जीवन हाथ से चला जाता है, अतः लक्ष्य केन्द्रित रहे। तनावग्रस्त रहने व लापरवाही दोनों में काम करने से बचें। नित्य अफरमेशन करें, खुद को नकारात्मकता से दूर रखें, जो तुम्हारे समय को चुरा रहे हैं, उनसे सतत सावधान रहें। चूंकि हमारी जिंदगी हमारी आदतों का ही तो

बुरी आदत कितने दिनों में छूटती है व अच्छी आदत कितने दिनों में बन जाती है

परिणाम है। आदतें रिपीटीशन मांगती हैं। अतः आदत बदलने हेतु नित्य एकांत में समीक्षा करें, अपनी आदतों को अच्छी आदत बनाने का संकल्प लें, बार-बार अच्छी आदत को दोहरायें। नित्य महसूस करें कि हम श्रेष्ठ हो रहे हैं। ध्यान रहे बुरी आदत 40 दिन में छूटती है व अच्छी आदत 20 दिन में बनती है। अतः अच्छे प्रयोग के अभ्यास में कभी लापरवाही न करे। साथ ही हम जो चाहते हैं, उस पर सतत चिंतन करें। हंसते-मुस्कुराते, आत्मविश्वासी, सम्मानित, धनी, स्वस्थ शरीर, प्रेमपूर्ण रिश्ते, जिम्मेदार सहयोगी से अपने को घिरा हुआ महसूस करें। मुस्कुराते हुए जागरण व मुस्कुराते हुए सोयें तथा अपनी जीवनचर्या को मुस्कान के साथ पूरा करें। इस प्रकार से श्रेष्ठ गुण व्यवहार वाली श्रेष्ठ आदतों के सहारे लाइफ डिजाइन करें। उज्ज्वल अतीत था, भविष्य भी महान है, ऐसी मंगलकारी आवाजों को अंतःकरण से आते हुए सुने, मंगलकारी शब्दों का उच्चारण करके जीवन की गाड़ी चलायें। जीवन को निहाल करने का यह विशिष्ट रास्ता है। किसी ने कहा हैµप्रकृति के संग रहने वाले लोग सदैव मुस्कुराते रहते हैं। अपने लिए समय निकालें। ऐसा कार्य करें कि दूसरों के बीच स्थाई जगह बन सके। ध्यान रहे व्यक्ति के डीएनए का 10 प्रतिभत भाग ही जिन्दगी को प्रभावित करता है। शेष 90 प्रतिशत स्वयं के सद्पुरुषार्थ, सद्चिंतन, चरित्र एवं मनोयोगपूर्वक बनाना पड़ता है। इसीलिए कहा गया कि ‘‘जो जैसा सोचता व करता है, वह वैसा ही बन जाता है।’’ जीवन जीने व समझने का यही सही तरीका है। हम भी सही तरीका अपनायें। अच्छी आदतों के सहारे जीवन को निहाल बनायें, यही जीवन का संदेश है।

                ‘‘जीवन क्या है निर्झर है,

                 मस्ती ही इसका पानी है,

                 सुख-दुःख दो पाटों के बीच,

                 चल रहा देख मनमानी है।।’’ 

Thursday, 18 November 2021

कृष्णं वंदे जगदगुरुम्

  



कृष्णं वंदे जगदगुरुम्

हमारे यहां जितने भी ग्रंथ लिखे गए चाहे आयुर्वेद, विमान शास्त्र, धनुर्विद्या, गणित, अर्थशास्त्र आदि के ग्रंथ सभी की छंदों में, कविता में, श्लोकों में रचना हुई। इसके पीछे हमारे यहां ऋषियों की धारणा रही कि हर ग्रंथ गीत में, छंद में, कविता में ढाला जाय, जिससे उसे आसानी से याद किया जा सके, आसानी से वह लोगों के हृदय में उतर सके, भूल न सके। इसी दृष्टि को ध्यान में रखते हुए भारत के द्वापर युग का इतिहास ग्रंथ महाभारत भी लिखा गया। वास्तव में रामायण-महाभारत ग्रंथ कोई सामान्य कविता ग्रंथ नाटक वाले ग्रंथ व नावेल नहीं हैं। वास्तव में यह किसी कवि की कल्पना नहीं है।

युगों का इतिहास

रामायण हमारे देश का त्रेता युग का इतिहास है, वहीं महाभारत हमारे देश के द्वापर युग का इतिहास है। इसी इतिहास का एक रूप श्रीमदभगवदगीता है। गीता भगवान श्रीकृष्ण के मुखारबिन्दु से निःसृत एक चेतनात्मक सत्य है। वर्णन है कि महाभारत को व्यास ऋषि ने रचते समय 18 पर्व व अध्यायों का एक प्रयोग किया था, महाभारत ग्रंथ के 18 पर्वों के मध्य स्थित यह 18 अध्याय की गीता सामने लाई। वर्णन है कि 18 दिन तक महाभारत का युद्ध चला, 18 अक्षौहिणी सेनायें लड़ी, दोनों पक्षों में 18 ही महारथी थे और महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद 18 लोग ही बचे थे। महाभारत के मध्य भाग में स्थित 18 अध्यायों वाली गीता का यह एक बड़ा आश्चर्य भी है।

महाभारत सतत घटता है

वास्तव में व्यास ऋषि ने अपनी कल्पना अनुसार नया प्रयोग देकर मनुष्य को संदेश दिया कि मानव जीवन में भी एक महाभारत सतत घटता रहता है। मनुष्य के जीवन में भी कर्तव्य-अकर्तव्य वाली दो सेनाएं सदा आपस में संघर्ष करती रहती हैं। हर आदमी के जीवन में अच्छी-बुरी भावनाएं पांडव और कौरव जैसी ही तो हैं, इन्हीं के बीच देवासुर संग्राम अंदर ही अंदर चलता रहता है। जो व्यक्ति अंतःकरण के निजस्वभाव पर टिका रह पाता है, वहीं सत्य व देवत्व का वरण करता और आनन्द अवस्था में स्थित होने का सौभाग्य पाता है। ऐसी दिव्यता वाले ग्रंथ को समझने-आत्मसात करने वाले व्यास ऋषि को नमन है। नमोस्तुते व्यास विशाल बुद्धे फुल्लारविंदः यत्पप्र नेत्रःके साथ कमल की तरह खुले हुए विशाल नेत्रें वाले, अद्भुत दृष्टि, विशाल बुद्धि वाले भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करने वाले व्यास ऋषि ने स्वयं तो सौभाग्य पाया ही, युगों-युगों तक के लिए मानवता को धन्य बना गये।

क्या है कृष्ण है द्वैपायन

कब किस स्थिति में गीता का यह ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया? इसकी पृष्ठभूमि पर विचार करें तो पाते हैं कि उस समय दो कृष्ण थे। एक कृष्ण द्वैपायन और दूसरे कृष्ण वार्ष्णेय, जिन्हें हम श्री कृष्ण के रूप में जानते हैं। जबकि कृष्ण द्वैपायन ही आज वेदव्यास के नाम से जाने जाते हैं। कृष्णी कुल में उत्पन्न कृष्ण वार्ष्णेय भगवान ही श्री कृष्ण हैं, जिनके द्वारा गीता प्रस्तुत की गई। जन जन में इनके प्रति असीम श्रद्धा के चलते ये कृष्णं वंदे जगदगरुम्कहलाये। श्रीकृष्ण भगवान के कहे हुए शब्दों व छंदों के रूप में संकलन करके, बांधकर इतिहास रूप में सुपाच्य बनाया वेदव्यास जी ने, जिन्हें कृष्ण द्वैपायन भी कहा जाता है। चूंकि ये द्वीप में पैदा हुए थे, इसलिए द्वैपायन और सांवले रंग के होने के कारण नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ा। जबकि इनका प्रचलित नाम वेदव्यास है।

 

कौरव है आसुरी शक्ति

कौरव का आशय समस्याओं को जन्म देने वालों से है, आसुरी शक्ति से है। आसुरी शक्तियां बहुत प्रबल हुआ करती हैं, या कह लीजिए समस्याएं कभी भी छोटी नहीं, अपितु बहुत बड़ी अनुभव होती ही हैं, चुनौतियां कभी भी छोटी नहीं होती। कौरवों के सौ पुत्र, उनकी बहुत बड़ी 18 अक्षौहिणी सेना इसी का प्रतीक है। वैसे भी इंसान समस्याओं के सामने अपने आपको बहुत छोटा मानता है, लेकिन इंसान उनको जीतता तब है, जब अपने को बड़ा मानने और समस्याओं को छोटा मानने लगता है, यही गीता का संदेश है। दूसरे शब्दों में ‘‘इंसान को अपनी शत्तिफ़, अपने सामर्थ्य को कभी छोटा नहीं मानना चाहिए। वेदव्यास जी ने गीता में इस व्यावहारिक मनोविज्ञान को दर्शाया है। साथ ही महाभारत को जीवन से जोड़ते हुए संदेश दिया कि जैसे 18 महारथियों के बीच में महाभारत लड़ा गया, ठीक ऐसे ही व्यक्ति के शरीर के अंदर भी वही अट्ठारह महारथी हैं। इसमें पांडव भी हैं और कौरव भी। पांडवों की सैना 7 अक्षौहिणी है और उनके महारथी 11 लोग हैं।

11 महारथी कौन से है

                पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां और एक हमारा मन इस प्रकार 11 महारथी हुए, जो हमारे जीवन को सदप्रयोग की दिशा में ले चलने में सक्षम हैं। बशर्ते इन्हें शुभ संकल्प, देवत्व से जोड़े रखा जा सके। इस प्रकार शरीर में स्थित शुभ शत्तिफ़यों को हम पाण्डव कह सकते हैं और अशुभ की दिशा में ले जाने वाली शक्तियों को कौरव। परमात्मा की इच्छा है कि हर मानव धर्म के साथ जुड़े, लेकिन जीवन में धर्म-अधर्म के बीच सतत लड़ाई चलती ही रहती है। यह शुभ और अशुभ की लड़ाई, अच्छे और बुरों की लड़ाई ही महाभारत है। महर्षि वेदव्यास ने संदेश दिया कि ‘‘जो अपनी इन्द्रियों का प्रयोग सद के लिए करता है, उसके साथ श्रीकृष्ण आकर खडे़ होते हैं, जो अपनी इन शक्तियों का प्रयोग असद की दिशा में करता है, उसे जीवन से भी हाथ धोना पड़ता है। यह भी इस भगवदगीता का संदेश है। आइये हम सब सद की ओर चलें और कृष्णं वंदे जगदगुरूम्का आशीर्वाद प्राप्त करें। 

Tuesday, 16 November 2021

Tolerance; the Root of Humanity


Tolerance; the Root of Humanity

Empathy, love, care, support, and other virtues like these make the world beautiful. Yet, it is also true that no one would become able to express these virtues freely if there is a lack of tolerance all around.

In the present world, everyone is in haste. Unfortunately, this hastiness and lack of sympathy towards fellow people are breeding intolerance in society. However, for a healthy and peaceful society, no one should ignore the significance of tolerance; it doesn’t matter how busy the world gets.

Tolerance shows how ‘valuable’ humans actually are. It plays a crucial role in every stage of a person’s life be it during childhood, adolescence, or adulthood. Being tolerant makes life fruitful. And when you understand the deeper meaning of tolerance, you’ll realize its real importance.

The Deeper Meaning of Tolerance

Man is nothing but an amalgamation of complex feelings. Tolerance means the ability to understand and respect others’ feelings in spite of disagreements. A tolerant person therefore is a kind person. He listens to others’ opinions patiently and tries to comprehend their point of view. Such people also express their ideas without any stress or conflict while showing empathy towards the fellow person.

Tolerance or open-mindedness thus means humbly accepting others’ views. There is no question of any conflict thereby maintaining the tranquility of the place. This profound peace, moreover, solves many problems and infuses relationship values in people. Needless to say, such open-minded people build a healthy and effective relationship with everyone.

This makes tolerance an indispensable life value helping people to live together peacefully. And nothing in life is more important than peace!

Tolerance as a Moral Duty

Further, ours is a land of diverse cultures. A rich variety of people and myriad forms of expression coexist here. Tolerance is all about respecting them all. It is a moral duty of everybody that paves the way to uphold human rights and fundamental freedoms of fellow human beings.

In India, and anywhere in the world, people are naturally diverse. Only open-mindedness can ensure the survival all peacefully. Therefore, ways should be devised for proper education for inculcating the value of acceptance. It must aim at countering negative influences that lead to fear and exclusion of ‘others’.

Young people should come forward in large numbers to develop capacities for fair judgment, critical thinking and ethical reasoning. The diversity of our land must not be a reason for conflict. It must be preserved as a treasure that enriches the beauty of the earth.

Becoming Tolerant Through Meditation

Also understand that as you continue to practise meditation regularly, your tolerance to stress, and challenging situations grow. Apart from this, meditation also enables you to clear your mind of the negative thoughts. It makes you more resilient and patient with diverse cultures and people as well.

The meditating people choose to be happy and balanced who prefers to live with compassion and tolerance. They notice any disagreement with others and work to tackle it instantly. Even in any conflicting situation, they sail along with appreciation, inner-peace, and patience.

Thus, try to always be grateful to everyone around you, appreciate diverse cultures in your country and give respect to wide-ranging lifestyles with a meditative heart. You’ll feel a profound inner calm and live peacefully and happily with others making the world even more beautiful.

Friday, 12 November 2021

Like God, Knowledge is Immortal and Eternal

 



God Buddha had said – I had come earlier too, I am still and will continue coming forward. This statement of Lord Buddha means that kind of great men will keep coming from time to time. They will come on earth by taking different forms.

But their appearance from inside would have been awakened in accordance with God.

The eminent international thinker Augustine has also said that this knowledge is what is not new. It was also before, even today and will be even further. Every true spiritual great man has said that I have not come to reveal that which is already there. But I am giving it to the traditions of the present meaning that this knowledge is a divine tradition continuously flowing. This knowledge should continue to reach people continuously.

Jesus Christ had said the same – that I was before even I was, I am still in the present and will also come in the future. That is, this knowledge has been given before and it will be continued.

It would be wrong if someone said that such fundamental knowledge has been created by me and I am giving it to the people.

Lord Krishna said, “I had given this knowledge before, I am still giving it and made you the medium of it, because you are my dear devotee and, a true disciple”. This flow of knowledge will be continued, it will never stop. The eternal knowledge available to the Lord, like ‘Yada yada hi dharmasya glanirbhavati bharata, Abhythanamadharmasya tadatmanam srijamyaham’, will always be as per requirement. When the Lord comes, the knowledge comes, and also the  Sant comes, knowledge comes. It should be understood because knowledge and God are synonyms.

This sequence of knowledge and distribution of knowledge will continue in this creation. People understand and accept this fact and take benefit from it.

It should be our wish to make personal life and social life both beautiful, peaceful and success by gaining knowledge.

Thursday, 11 November 2021

सुयोग है कार्तिक मास, गंगा की गोद, ऋषिकेश की पावन भूमि में गुरु निर्देशित ध्यान

 


सुयोग है कार्तिक मास, गंगा की गोद, ऋषिकेश की पावन भूमि में गुरु निर्देशित ध्यान

भारत भूमि स्वयं में तीर्थ भूमि मानी गयी है। तीर्थ जीवन साधना, शिक्षण, संवेदनशीलता, धार्मिक रीति-नीति के सहारे ऐसा दिव्य वातावरण देते हैं, जिससे मनुष्य को जीवन जीने की सही प्रेरणा मिले तथा जन्मों के प्रारब्ध के कारण जिन्दगी में छाये दुख-कष्ट, अभाव मिटे और सुख-सौभाग्य का सुयोग जग सके। प्रारब्ध को पुण्य में बदलने, दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने की चैतन्यता जगाते हैं तीर्थ। जीवन में आमूलचूल रूपान्तरण लाने और धर्म परम्परा के पुनर्जीवन के लक्ष्य को लेकर प्राचीनकाल से ही हमारे ऋषिगण तीर्थाेर्ं का निर्माण करते रहे हैं। नदियों के मिलन एवं हिमालय स्थलों से भरे देश के अधिकांश भागों में तीर्थ स्वतः ही प्रकट हुए हैं, प्रयागराज, पुष्करतीर्थ, काशी, अयोध्या, सप्तपुरियाेंं सहित सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र तीर्थ प्रकट हुए तीर्थों का दर्जा प्राप्त है। ऐसे ही दिव्य तीर्थों में हिमालय की छाया और गंगा की गोद में स्थित ऋषिकेश का महत्व हैं। यह हिमालय का प्रवेश द्वार और ध्यान-योग की वैश्विक राजधानी है।

                दिव्य शान्त वातावरण से ओतप्रोत ऋषिकेश भारत के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में एक है। हिमालय की पहाड़ियों से घिरे इस देवमय स्थान को मां गंगा अतुल्य बनाती हैं। ऋषिकेश को केदारनाथ,

बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेेशद्वार भी माना जाता है। इड़ा, पिंगला, षुसुम्ना का संगम का दिव्य सुअवसर है यह, गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम स्थल ऋषिकेश के दिव्य वनक्षेत्र में भी अपने वनवास काल में भगवान श्रीराम ने अपना साधना काल बिताया था। यहीं पर ऋषि रैभ्य ने तपस्या के बल पर ईश्वर का साक्षात्कार किया था। इस तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान ऋषिकेश के रूप में प्रकट हुए थे। कहते हैं कि मां गंगा अपने साधकों के लिए इस स्थल पर अपने स्वरूप को नम्रता में बदल कर प्रवाहित होती हैं, यही कारण है कि यहां गंगा के किनारे की रेेत सर्वाधिक मुलायम मिलेगी। इस पर

बैठकर साधना करने वालों पर मां गंगा अपनी स्नेहमयी गोद का आभास दिलाती हैं। यहां बैठकर ध्यान-योग करने से साधक को असीम शान्ति मिलती है और अंतःकरण में देवत्व का उदय सहज होने लगता है। असंख्य साधकों की अनुभूतियां यही संदेश देती हैं।

                  ऋषिकेश अर्थात इंद्रियों को नियंत्रित करने में सहायक वातावरण वाला क्षेत्र हैै। महादेव का वरदान है कि जो व्यक्ति यहां जप, ध्यान, योग, तप आदि साधनायें करेगा, उसका आत्म संयम, इंदिय संयम एवं मन संयम सरलता से सम्भव बनेगा। इसे मोक्षमार्ग भी कहते हैं, ट्टषिकेश तीर्थ में ध्यान लगाने से जीवन के रहस्य खुलने लगते हैैं। आत्म उत्थान एवं भौतिक सुख-समृद्धि बढ़ती है, प्रारब्ध कटते हैं तथा अनन्तकाल तक यहां सम्पन्न किये जप, ध्यान, योग, तप आदि का लाभ साधक को मिलता रहता है। शिष्यों-साधकों का आत्मविकास हो, जीवन के रहस्य से परदा हटे, प्रारब्ध पुण्य में परिवर्तित हों, सुख-सौभाग्य के द्वार खुलें और आत्म उत्थान-आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त हो, अतीन्द्रिय क्षमतायें जगें पूज्य सद्गुरुदेव महाराज इसी संकल्प से इस स्थान पर ध्यान साधना का आयोजन करते हैं।

                ध्यान अर्थात नीरव शांति, असीम विश्राम, शून्य में छलांग लगाना। ध्यान में साधक निर्विचार हो अपने हृदय गुफा में प्रवेश पा जाता है। मानसिक शांति, एकाग्रता, मन को निर्विचार करना, मन पर काबू पाना व उसे सही दिशा देने की क्षमता पाना ध्यान का एक पक्ष है। ध्यान से संयम सधते हैं और यह ईश्वर शरणागति दिलाता है। शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक लाभ मिलता है। ध्यानएक योग क्रिया है। आत्मानुशासन की एक युक्ति है, जिसका उद्देश्य है एकाग्रता, मानसिक स्थिरता, संतुलन, धैर्य और सहनशक्ति प्राप्त करना। ध्यानसम्पूर्ण रूपांतरण की एक विशिष्ट विधा है, इसीलिए सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में ध्यानका महत्व है। महात्मा बुद्ध ध्यानावस्थित होकर ही ज्ञान प्राप्त किये थे। जैन

धर्म में ध्यान महत्वपूर्ण माना गया है। भारत में षडदर्शनों में योगका सम्पूर्ण आधार ही ध्यान पर आधारित है।

                मनुष्यों में दूर श्रवण, दूरानुभूति, दूरदर्शन, पूर्वाभास, भविष्य कथन जैसी अगणित क्षमताएं प्रसुप्त स्थिति में दबी पड़ी हैं, जिन्हें जगाकर वे अपने को बहुआयामी व्यक्तित्व वाला बनाते तथा दूसरों के सुख-सेवा में सहायक बनते हैं। आज भी ये अतीन्द्रिय क्षमताएं जगाकर कोई भी अपने अंदर विशेष परिवर्तन ला सकता है। समय से पहले ही मृत्यु का आभास पा लेना, किसी की पीड़ा को दूर कर देना, स्वयं व दूसरों के जीवन से जुड़ी

भावी घटनाक्रम की जानकारी पा लेना, जो समय पर सही भी उतरें, नये आविष्कारों संबंधी गुत्थियां हल कर लेना, समस्या के समाधान हेतु स्वप्न संकेतों द्वारा सहायता पाने की शक्ति अर्जित करना, अपने पूर्व जन्म की जानकारी पा लेना जैसी अनेक अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास ध्यान साधना के द्वारा सम्भव बनता है।

                कहते हैं मानवी अंतराल में एक से बढ़कर एक अद्भुत क्षमताएं विद्यमान हैं, जिन्हें समर्थ गुरु के निर्देशन में की गयी ध्यान साधना अभ्यास द्वारा कोई भी

विकसित कर सकता है। संतों का कहना है कि ये क्षमतायें कभी-कभी व्यक्तियों में किसी तीर्थ, पवित्र नदी, संतों की संगति, हिमालय क्षेत्र जैसे दिव्य स्थान पर जाने मात्र से जग पड़ती हैं। न्यूजर्सी की परामनोविज्ञानी श्रीमती डोरोथीएलीसन एक ऐसी ही महिला थीं, जिन्होंने भविष्य के गर्भ में झांकने की सामर्थ्य विकसित कर ली है। इसके माध्यम से उनने कितनी ही जटिल गुत्थियों को सुलझाया। खोये हुए व्यक्तियों, अपराध व अपराधियों के रहस्य खोले हैं। न्यूयार्क के प्रसिद्ध परामनोवेत्ता रिचर्डरिचनर जिन्होंने डोरोथी की अतीन्द्रिय क्षमता की जांच करने का दायित्व था, एक दिन वे आश्चर्यचकित रह गये जब डोरोथी ने बताया कि उनके कमरे में बैठा व्यक्ति आत्महत्या करने की सोच रहा है। रहस्योद्घाटन पर पूछताछ करने पर सही निकला।

                अध्यात्म वेत्ता एवं परामनोवैज्ञानिक मानते हैं कि मनुष्य की चेतना में असीम अप्रत्याशित क्षमता विद्यमान है। यदि उसे परिष्कृत एवं विकसित किया जा सके, तो व्यक्ति अतीन्द्रिय सामर्थ्यों से भरी भौतिक सिद्धियों एवं आत्मिक ट्टद्धियों का स्वामी बना सकता है। उच्चस्तरीय चेतनात्मक विभूतियां भी हस्तगत हो सकती हैं। तीर्थ क्षेत्र में समर्थ गुरुनिर्देशित विधियों पर आधारित ध्यानद्वारा यह अधिक सम्भव हो जाता है। ध्यान जीवन के कायाकल्प का माध्यम है, जिसमें मन को शांति मिलती है। अंतःकरण में समाई दिव्य ऊर्जा का भंडार जागृत होता है। पूज्यवर कहते हैं ‘‘मनुष्य का शरीर किसी मकान की तरह है, जैसे कमरे में खिड़कियां और दरवाजे हैं, पर कमरे की खिड़की खुली होने पर ही वायु प्रवाह अनुभव होता है। ध्यान भी ठीक इसी तरह है। ध्यान  साधक को विश्व ब्रह्माण्ड से जोड़कर अंदर के विकारों को बाहर निकालता और साधक को विश्व ब्रह्माण्ड के रहस्यों की अनुभूति कराता, अन्दर शांति-करुणा जगाता है। जिससे परमात्मा की कृपाएं अंतःकरण में प्रवेश कर सकें। तीर्थ क्षेत्र में बैठकर ध्यान के सहारे गहरे उतरने से शांति महसूस होती ही हैं, जीवन में सकारात्मक प्रारब्ध जगते और आत्म उत्थान के लिए मन सधता है। जिससे भौतिक जीवन में सुख, समृद्धि बरसती है।’’

                ऋषिकेश से ऊपर हिमालय को शिव संरक्षित क्षेत्र कहते हैं। इस क्षेत्र में ध्यान जीवन के कायाकल्प के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। भगवान शिव महामृत्युंजय हैं, शक्ति के स्वरूप हैं, जहां शिव हैं, वहीं शक्ति है, ऐसी कोई सिद्धि नहीं, ऐसा

कोई ज्ञान नहीं, ऐसा कोई निर्वाण नहीं, जो शिव

साधना से प्राप्त न हो। शिव सहज रूप से अति कृपालु भी हैं। उनके अति कृपालु स्वभाव के कारण

साधारण जन में शिव के विभिन्न रूपों के पूजा-साधना का विधान है। वास्तव में शिवत्व का शिव क्षेत्र में ध्यान से जीवन में पुरुषार्थ, प्रेम, शक्ति, सौभाग्य, बल, साहस, सिद्धि सभी साधनाएं स्वतः जागृत होती हैं। शिव की कृपा से कोई अधूरा नहीं रह सकता। आइये ऋषिकेश पहुंच कर 18 से 21 नवम्बर, 2021 की तिथियों में माँ गंगा, देवात्माहिमालय, भगवान शिव व गुरुसत्ता सबकी कृपा के साथ ध्यान लगाकर जीवन का कायाकल्प

करें।