Dr. Archika Didi

Meditation & Spiritual Guru, Vice Chairperson at Vishwa Jagriti Mission, Founder & Director at Dr. Archika Foundation Read more: http://drarchikadidi.com/

Tuesday, 30 March 2021

‘मन’ की शुद्धि से आरोग्यता

 


‘मन’ की शुद्धि से आरोग्यता

साधारणः लोग उस मनुष्य को निरोगी समझते हैं, जो मजे में खाता-पीता है, चलता-फिरता है और घर पर चिकित्सक को भी नहीं बुलाता है। यद्यपि ऐसे लोग भी रोगी होते हैं परन्तु बीमारी की परवाह किये बिना अपने को निरोगी मानते हैं। एकदम निरोगी व्यक्ति बहुत कम मिलेंगे। एक अंग्रेज लेखक का कथन है कि-

‘निरोगी उन्हीं मनुष्यों को कहना चाहिए जिनके शुद्ध शरीर में शुद्ध मन बसता हो। मनुष्य केवल शरीर ही तो नहीं है। शरीर तो आत्मा के रहने की जगह है। शरीर, मन और इन्द्रियों का आपस में गहरा सम्बन्ध है। इसलिए एक के बिगड़ने पर दूसरे के बिगड़ते देर नहीं लगती है।

                शरीर की उपमा गुलाब के फूल से की गयी है। गुलाब के फूल का ऊपरी भाग तो उसका शरीर है और सुगन्धि उसकी आत्मा है। कागज के फूल को कोई भी पसंद नहीं करता। सूंघने से उसमें से गुलाब जैसी महक नहीं आती, असली गुलाब की परख तो उसकी महक ही है। जैसे गुलाब के फूल के सामने दिखाई देने वाले गंधहीन फूलों को लोग पसंद नहीं करते हैं, वैसे ही वह व्यक्ति जो ऊपर से देखने में अच्छा तो लगता है, पर उसकी आत्मा का व्यवहार ठीक नहीं है। ऐसे व्यक्ति को लोग न तो पसंद करते हैं और न तो प्रेम ही करते हैं। पर इस तरह के बुरे स्वभाव के लोग भी निरोगी नहीं कहे जा सकते हैं। वास्तव में शरीर और अत्मा का गहरा सम्बन्ध है। जिसका शरीर निरोगी होगा उसका मन भी शुद्ध होगा। मन की शुद्धि से आरोग्यता मिलती है।

                शरीर को अपने वश में रखने के लिए एक ओर तो अंतर्रात्मा का प्रयत्न जारी रहता है और दूसरी ओर पाप पुरुष शैतान हमें अपनी मुट्ठी में रखना चाहता है। जब शरीर अंतर्रात्मा के अधीन रहता है, तो वह रत्न के समान है और शैतान का अधिकार होने के बाद जिन्दगी नारकीय हो जाती है।

                ईश्वरीय नियम पालने से ही शरीर निरोग रह सकता है। शैतानी नियम पालने से नहीं। जहां सच्चा आरोग्य है, वहीं सच्चा सुख है। सच्चा आरोग्य प्राप्त करने के लिए हमें अपनी जीभ को जीतनी जरूरी है। इससे दूसरी विषयेन्द्रियां अपने आप वश में हो जाती हैं। जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर लेता है, वह संसार के सभी कार्यों पर विजय प्राप्त कर सकता है। क्योंकि वह मनुष्य आत्मा-परमात्मा का प्रिय बन जाता है। क्योंकि आत्मा परमात्मा का ही तो अंश है।

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आध्यात्मिक अंधापन क्या है ? | Gita Updesh-194 | Dr. Archika Didi

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Thursday, 25 March 2021

The Spiritual Dimension of Holi


The Spiritual Dimension of Holi

Remove the temporary stains of worldly colors from your soul and color it in the beautiful shades of God. This is the real Holi and we can celebrate such a Holi when a Guru showers the vibrant colors of blessings upon us.

India is a land of beautiful festivals. Here, each festival has a deep spiritual meaning. If you celebrate these festivals with an understanding of its deeper meaning, it becomes even more beautiful.

Holi is one such festival with a profound meaning. It fills us with zeal and pleasure. The festival is an opportunity to strengthen our relationships and show respect to elders. Amidst the thrill, and happiness, the meaning of the colorful festival must be understood.

The Deeper Meaning of Holi

Holi is a two-day festival- Holika Dahan (Chhoti Holi) and Holi. Chhoti Holi is celebrated by burning cow dung and specific food items in a pyre. 

According to the legend, King Hirnayakashyapa wanted to kill his pious son Prahalad to stop him from worshipping Lord Vishnu. He took the help of Holika (his sister) who had a boon that fire could not destroy her. She sat on the pyre with Prahalad but Prahalad did not burn as he called on Lord Vishnu who saved him whereas the evil-minded Holika was burnt. 

So, we burn Holika on the eve of Holi. Thus, Holi signifies the burning of evils and vices that are deep-rooted in the mind and lead to enmity and unrest. The ritual also shows that if you are a true devotee, nothing can destroy you, no worldly fire of evil can annihilate you. However, if your motive is cruel and unholy, you will be burnt in the worldly fire irrespective.

The Colors of Holi & Meditation

Meditation is a process of inner transformation wherein you awaken your chakras (subtle energy centers). These seven chakras each have a corresponding color just like the colors of Holi. The spectrum of light has the seven colors we see all around in nature.

For example, Muladhara chakra, is literally the ‘Root of Existence’; it is symbolized by a lotus with four petals and the color pink or red; the Heart Chakra, having an element of the air, is associated with the green color whereas blue is the color of throat Chakra or Vishuddhi Chakra. 

On Holi these colors are all around as you play Holi with friends, family and even your enemies. Holi is one festival that sets aside all differences and brings everyone together with colors. Here, you are spreading the essence of your chakras, the different colors of your chakras, and you turn into one with them. You feel the same bliss when you awaken your different chakras through meditation. 

The Ultimate Aim of Both Meditation and Holi is Joy 

On Holi, each color shines brightly, bringing joy which is the aim of Holi. The same happiness is also the aim of meditation. When all the subtle energy centers are awakened, all are active and all can be sensed by you through meditation, you feel bliss.

Moreover, the moon that shines on Holi, symbolizes the end of hatred, jealousy, conceit, ego, and all other evils. True seekers harness the energy of this full moon and visit their inner world through meditation. 

Therefore, Holi is a festival of ‘letting go’ when you start your inner journey, despite all difficulties and problems, to find peace, happiness, and harmony.

Let’s Play Holi 

So, just let it go and play Holi with your near and dear ones while taking all the necessary covid-19 precautions. Do not use chemical colors and go green. You may prepare eco-friendly colors at home as well using turmeric, sandalwood, flowers and henna.

A very happy Holi to all of you!


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Tuesday, 23 March 2021

ऊर्जामय शुरुआत का पर्व होली

 


ऊर्जामय शुरुआत का पर्व होली
जीवन में हर्षोल्लास एवं उमंग का प्रतीक उत्सव है होली। इस पर्व पर सभी लोग ईर्ष्या, द्वेष को त्यागकर प्रेम के रंग-बिरंगे रंगों में रंगते हैं। होली के दिनों प्रकृति भी अपने रंगों में होती है। वह भी भावपूर्ण हो पर्व मनाती है। प्रकृति के कण-कण में इन दिनों सुंदर फूल खिलते हैं। ऐसा लगता है मानो परमात्मा ने अपने प्रेम को पृथ्वी पर फूलों की मुस्कान रूप में बिखेरकर मनुष्य को प्रेरणा दी है कि तुम अपने गमों को भूलकर, एक नई उमंग और एक नया उल्लास लेकर जीवन को संवारो। साथ ही संकल्प लो कि जो हो गया सो हो गया, जो बीत गया वो बीत गया, अब बहुत हो गया, जो हो ली सो होली। अब नई जिंदगी शुरु करनी है।
होली पर्व में महत्वपूर्ण मनोविज्ञान है। वह यह कि जीवन की सारी समृद्धि खुशियों, उमंगों से अंकुरित होती है। यदि आप यह सोचना शुरू कर दें कि जो बीत गया सो बीत गया। अब नई जिंदगी शुरू करनी है, तो आपकी संकल्पशक्ति बढ़ेगी। होली में लोग रंग डालकर गले मिलकर यही तो कहते हैं। कहते हैं कि जो हो गई, सो होली’। अब नया वर्ष, नया प्रभात आया है, अतः हम नया सूत्रपात करेंगे। नए ढंग से जियेंगे।
होली के दौर में गाने वाले विविध प्रकार के गीत, मस्ती की लहर, तबले की थाप, ढोल बजाकर गाना, नाचना नवउल्लास के लिए ही तो है। होली में अपने गिरे हुए मनोबल को फिर से  उठाने की कोशिश ही तो लोग करते हैं। अर्थात् ‘हुतं लाति इति होली’ जैसे किसानों 
द्वारा बोया बीज उसे कई गुणा अधिक मात्र में वापिस मिलता है। ऐसे ही भाव व विचार के बीज अंतःकरण में बोते हैं, तो वह भी कई गुना मिलना सुनिश्चित है। तो फिर क्यों न बोने से पहले उगने वाली अथवा वापस मिलने वाली फसल की गुणवत्ता के बारे में सोचें। होली यही संदेश देती है कि अब सकारात्मक हो लें। अर्थात् जो हो लिया है, उसी की चिंता में मन कुंठित करके नहीं रहना, अपितु अतीत के गिले-शिकवे, खट्टी-मीठी एवं कड़वी यादों को भुलाकर नए उत्साह, उमंग एवं उल्लास के साथ, नए जीवन के स्वागत के लिए उठ खड़े होना ही होली पर्व का संदेश है।
होली पर्व प्रतीक है समरसतापूर्ण  नए सृजन का। कोई अपना है न पराया, न कोई ऊंच है न नीच। तो सभी से नूतनता, माधुर्य, प्रेमपूर्ण होकर क्यों न मिलें। इसीलिए होली के विविध रंगों में रंगे सभी चेहरे समान दिखाई देते हैं। कोई श्रेष्ठ या अश्रेष्ठ नहीं होता। सभी होली उत्सव वैरभाव को छोड़ एक होकर प्रेम रंग में स्वयं को एकाकार कर मनाते हैं। हम भी अपने अंतःकरण को विविध स्नेहिल रंगों से सराबोर करते होली मनायें।
होली उत्सव है, हमारे यहां उत्सवों की संस्कृति है। हर थोड़े अंतराल बाद पर्व-त्यौहार आते हैं, ताकि हम अपने उदासी मन में किसी न किसी रूप में उल्लासमय ऊर्जा पैदा करें। अनेक स्थितियां ऐसी आती हैं जब हम उदास और निराश हो जाते हैं, परेशान हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में पर्व सुखदाई लगता है। होली का पर्व तो और भी अधिक सुखद पूर्णता लाता है और दुःख को कम करता है। होली को उल्लासपूर्वक मनाकर लोग जीवन में उल्लास, उमंग सुख, शांति, प्रसन्नता लाते हैं।
जीवन में अक्सर जब हम दुःख को सुख रूप में तथा सुख को दुःख की दृष्टि से देखने लगते हैं। तो ऐसे में होली का उल्लास हमें सही दृष्टिकोण अपनाने की चेतना देता है। साथ ही संदेश देता है कि यदि आप अपने अभाव को देखेंगे तो निराशा, उदासी और दुःख की मात्र बढ़ेगी। अतः अपने पास जो कुछ भगवान ने दिया है उसे कृपा समझकर स्वीकार करेंगे तो आपका दुःख कम हो जाएगा। होली उदासीनता, निराशा और डिप्रेशन से मुक्ति का भी पर्व है। वास्तव में यह विश्वव्यापी त्यौहार भावनात्मक थेरेपी का कार्य भी करता है। विभिन्न देशों में इसके अलग-अलग नाम और रूप हैं। रंग-अबीर-गुलाल से भरे इस अनोखे पर्व में उल्लास की प्रधानता होती है। यह रंगपर्व भी कहलाता है। जो पारस्परिक प्रेम, एकता एवं समानता को बल प्रदान करता है। वेदों और पुराणों में भी इस पर्व का उल्लेख है। अतः ‘‘होलिकोत्सव’’ मानवजाति का वैदिक कालीन पर्व माना जा सकता है। इस अवसर पर होली की पवित्र अग्नि में हवन करने का भी विधान है। अतः होली में लोग हितैषी मूल्यों को आत्मसात कर हम सब अपने जीवन को पवित्रता के रंग से भर लें, जीवन को खुशहाल बनायें। 

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Friday, 19 March 2021

जीवन की दो दृष्टियाँ : भौतिकवादी और अध्यात्मवादी


 


जीवन की दो दृष्टियाँ : भौतिकवादी और  अध्यात्मवादी

जीवन के विषय में दो  दृष्टियाँ प्रचलित हैं एक भौतिकवादी और दूसरी अध्यात्मवादी।

शुद्ध भौतिकवादी लोग कहते हैं कि जीवन ही आदि है और यही अंत है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर जीवन को व्यतीत करना चाहिए। अध्यात्मवादी लोग कहते हैं कि यह जीवन मिथ्या है, यथार्थ जीवन तो इस लोक का जीवन नहीं है, परलोक का जीवन ही यथार्थ है। उसी की तैयारी में इस जीवन को अर्पित करना चाहिए।

पाश्चात्य भौतिक विचारधारा के समर्थक बेकन का मानना है कि-‘यह संसार ही सत्य है, यही सब कुछ है। यह मानकर ही हमें जीवन-पथ का निर्माण करना चाहिए। परन्तु क्या इस जीवन को ही आदि तथा अंत माना जा सकता है?’

जीवन के संबंध में वैदिक दृष्टिकोण है कि हमारा जीवन तभी सार्थक कहा जा सकता है, जब हम इस भौतिक जीवन के आगे जो कुछ है उसकी तैयारी समझ जाय।

संसार में हर वस्तु सापेक्ष (Relative) है व निरपेक्ष Absolute)। इसमें से एक ही हो सकता है जिसके सहारे सब कुछ टिका है। हमारा पार्थिव जीवन भी सापेक्ष है, अंग है, हिस्सा है परन्तु किसका? यह उस जीवन का अंग है जिसे हम आध्यात्मिक कहते हैं। इस दृष्टि से तो न शुद्ध भौतिकवादी दृष्टिकोण सही है और न आध्यात्मिक। भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों मिलकर जीवन की श्रृंखला को पूर्ण करते हैं कि भौतिक जीवन भी सत्य है, आध्यात्मिक जीवन भी सत्य है, दोनों को सत्य मानकर ही जीवन पथ पर यात्रा हमें लक्ष्य तक पहुँचा सकती है।

उपनिषद् में कहा है-‘तेन त्यक्तेन भुजीथा’ अर्थात् संसार का भोग करो परन्तु भोग ही न करते रहो। संसार भोग के लिए ही रचा गया है, परन्तु संसार के भोग में ऐसे लिप्त न हो जाओ कि अपनी सुधबुध ही भूल जाओ। आत्मा शरीर के बिना परमात्मा प्रकृति के बिना अपने चैतन्य-स्वरूप को प्रगट नहीं कर सकता, इसलिए आत्मा के लिए शरीर का और परमात्मा के लिए प्रकृति का विकास उतना आवश्यक है, जितना कारीगर के लिए उसके साधन का, उपकरण का उत्तम होना आवश्यक है।

इन दोनों को अलग-अलग समझ लेना आवश्यक है। इस खोज का दूसरा रूप यह है कि शरीर अनित्य है? आत्मा नित्य है। शरीर भंगुर है? नाशवान है, आत्मा अभंगुर है? नाश रहित है। एक तरह से शरीर को ही सब कुछ समझ लेना और शरीर से आगे न देखना मृत्यु है, भौतिक जगत के भीतर बस रहे परमात्मा को पा लेना ‘ईशावास्यमिदं सर्वं’ जीवन है। उपनिषदों का कहना है कि हमारे शरीर के भीतर पांच कोश हैं-अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश। जो प्राणी सिर्फ खाने-पीने में लगा रहता है। वह अन्नमय में जीता है। भौतिक जीवन ही उसका जीवन है। आध्यात्मिक जीवन के लिए मृत समान है। यह अवस्था पशु-योनि में तथा अनेक मनुष्यों में भी पायी जाती है। जो व्यक्ति खाने-पीने से ऊपर उठ जाता है वह प्राणमय कोश में जीने लगते हैं। इसप्रकार आत्मा के पांच कोश मानव जीवन की स्थितियां हैं।

कोषों से पता चलता है कि जीवन क्या है? मृत्यु क्या है? सोना क्या है? हम जो जीवन बिता रहे हैं, उसे गीता में स्वप्न कहा गया है। यह सोया हुआ जीवन बिता रहे हैं। हम जाग नहीं रहे हैं पर हम समझते हैं कि हम जाग रहे हैं। शरीर में जीना, जीना नहीं है। तैत्तिरीयोपनिषद् के शब्दों में यह मरना है। क्योंकि वास्तविक जीने के लिए शरीर से आगे बढ़कर, मन में जीना होगा। हमारा शरीर में जीना जागना नहीं है, एक प्रकार का सोना ही है। गीता का कथन है-लोग अपने को जागा हुआ समझते हैं, वे जगे नहीं सोये हुए लोग हैं। जो उसे पा लेता है वह मनुष्य न बुढ़ापे (जरा) को कुछ समझता है, न मृत्यु को कोई अहमियत देता है। न भौतिक कष्ट को गिनता है और न मानसिक कष्ट को कुछ समझता है। ऐसे ही लोग वास्तव में जगे हुए लोग हैं, बाकी सभी लोग जागकर भी सोये हुए लोग हैं।

अगर पार्थिव जीवन को आध्यात्मिक जीवन का अंग न माना जाये, तो जीवन की सार्थकता नहीं रहती है। यह निरर्थक हो जाता है कि किसके लिए जियें? क्या सिर्फ खाने-पीने के लिए? खाना-पीना तो पशु भी करते हैं फिर मानव जीवन की सार्थकता क्या है? आध्यात्मिक जीवन के साथ भौतिक जीवन की डोर बंधी हो तभी जीवन की दिशा निश्चित तथा असंदिग्ध हो सकती है, अन्यथा मानव जीवन जी लेने और मर जाने के सिवा कुछ नहीं रहता।

शरीर आत्मा का आधार है, साधन है-यह जानकर जीना ही जीवन की सम्पूर्णता है। इसी विचार को व्यक्त करते हुए कठोपनिषद् में कहा गया है-‘शरीर एक रथ है, इन्द्रियां उसमें जुते घोड़े हैं, ये घोड़े संसार के विषयों की तरफ दौड़ रहे हैं, मन लगाम है, बुद्धि सारथी है और इस रथ पर सवारी करने वाला आत्मा है। यह सिलसिला उल्टा हो जाता है। लगाम इन्द्रियों के हाथ में आ जाती है, तब आत्मा भोक्ता होने के स्थान पर इन्द्रियां भोक्ता हो जाती हैं। सही जीवन भौतिक तथा आध्यात्मिक जीवन का समन्वय है।

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Wednesday, 17 March 2021

For Happiness, Learn to Live Peacefully Amid Chaos (International Day of Happiness)

 


For Happiness, Learn to Live Peacefully Amid Chaos

Our happiness is put to a tough test when we are dealing with uncertainties, insecurities, and chaos. Whether you are stuck in a noisy surrounding and cannot sleep or you are unable to deal with a situation and your mind is disturbed- chaos in life is inevitable and sometimes, getting happiness seems impossible.

But happiness is very important for a peaceful life and that’s why the world celebrates International Day of Happiness.

The International Day of Happiness

Every year, 20 March is dedicated to happiness. Since 2013, the United Nations has celebrated the International Day of Happiness on this day as a way to recognise the importance of happiness in the lives of people around the world.

But can we stay happy amid chaos?

Of course, we can. For living peacefully and happily amid chaos (both inner and outer) you need to adapt to change and that requires the mental preparedness. For that, you need a tranquil mind. But, how? Here’s what you can do to live peacefully despite chaos around you.

Believe in the Power of Affirmation

In real life, things may not happen as you want them to happen all the time. A wishful thought is often not enough to override a challenging situation. You must face the situation. Even though you cannot outdo it, but you can use the power of affirmation to gain the wisdom and ideas to deal with the situation. 

Try to stop thinking persistently about a problem and adopt a different thought-process by introspecting deeper in your mind throughout the day. In a few days you will find that your fresh viewpoint has become an inner truth and turned into a strong belief system.

So, you may repeat to yourself, ‘I will face this problem bravely,’ or, ‘I am mightier than this chaos,’ or the empowering thought, ‘This too shall pass.’

Repeat these mantras, or any of your own choice, throughout the day like an affirmation. It will instantly pull you back into a controlled state of mind where you will find calm.

Stick to Your Purpose in Life

What is your Dharma, or purpose in life, your unique mission in life?  Your purpose is scripted beautifully on your soul. Search for it and in moments of chaos, adhere to this purpose.

Stick to the ultimate truth of your life, your purpose. No matter what is going on in your surroundings or in your life, your focus should be on your life’s purpose until it becomes an inseparable part of your personality.

So, in disturbing moments of confusion and panic, do not impel your brain for instant relief, rather learn to focus on your purpose.

Understand that the outer world reflects your inner world. Control the inner world, the chaos in your outer world will wane automatically.

Have Faith in God

To rise above any chaotic situation and bring peace in life, you must develop faith in God or The Supreme Universal Power. With that you will have conviction that everything will be alright, even if you are unable to see exactly how and when.

As you connect with the universal energy, you empower your inner core, gain courage and wisdom to overcome any challenges. Nothing can disturb such a focused and empowered mind.

Find Your Secret Den of Tranquility

No matter what disturbing circumstances you are dealing with, always have a secret den of serenity that can give you instant restoration. It will help you find a peaceful state of mind whenever the need arises. It could be a hobby, music, meditation, a nature walk, a spiritual text or just talking to a close friend. You can deal with chaos with such a light-hearted approach as well and attain a tranquil mind.

So, try these steps to find inner peace amid chaos. Never let your troubles take control of your naturally tranquil mind. Just take charge of the circumstances, act and believe that everything will be alright by the Grace of God.

Posted by Dr. Archika Didi at 05:08 No comments:
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Thursday, 4 March 2021

कहीं हम बेटियों के गुनहगार तो नहीं

 


 

कहते हैं बेटियों का जन्म परमात्मा की असीम कृपा से किसी पवित्र कोख से होता है। दूसरे शब्दो में कहें तो जहां एक ओर बेटियों के आगमन से घर-परिवार की जड़ता टूटती है, पवित्रता बढ़ती है, सदियों से वे पूज्य हैं। वहीं देखें तो बेटियां ही सदियों से प्रताड़ना का केन्द्र भी बनी हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो बेटियों के प्रति अत्याचार संबंधी इस कुरीति की जड़ें काफी पुरानी और विश्वव्यापी हैं। यूनान के डेल्फी शहर के दो सौ ईसा पूर्व के आँकड़ों से स्पष्ट है कि उस शहर की छह हजार की आबादी में एक सौ अठारह बेटों के मुकाबले केवल अट्ठाईस बेटियाँ थीं। अरब देशों में तो बेटियों के पैदा होते ही उन्हें दफना दिया जाता था। इस दुखद स्थिति से अत्यधिक पीड़ित होकर हजरत मुहम्मद साहब ने उस माहौल में बेटियों की हत्या को इश्लाम धर्म और तत्कालीक समाज के खिलाफ बताया था और कहा कि ये बच्चियाँ कभी अल्लाह के दरबार में तुमसे अपनी हत्या पर सवाल करेंगी तो तुम क्या जवाब दोगे? इस्लाम के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद का यह प्रश्न आज भी हम सबके लिए प्रासंगिक है और चीख-चीख कर कह रहा है कि बेटियों को दोयम दर्जे की मान्यता क्यों?

इतिहास में कन्या भ्रूण हत्याः

                आज सबसे प्रगतिशील माने जाने वाले अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों के इतिहास खंगालें तो उनमें भी मौत के आँकड़ों में सबसे अधिक बेटियों की मृत्यु के आँकड़े ही हैं। चीन में तो विगत एक सदीपूर्व तक बेटी का जन्म अवांछित माना जाता था। प्राचीन रोम में तो पति द्वारा अपनी गर्भवती पत्नी को पत्र द्वारा ही निर्देशित करने उदाहरण मिलते रहे हैं कि ”अगर बेटा पैदा हो तो उसका जी-जान से ख्याल रखना, लेकिन बेटी हो तो उसे महत्वहीन कर देनाय”। ब्राजील के इतिहास में कन्या भ्रूण-हत्या के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। बेटियों के प्रति इस क्रूरता के विश्वव्यापी इतिहास को देखकर और वर्तमान सोच से लगता है कि भले ही हमने इक्कीसवीं सदी में कदम अवश्य रख दिए हों, लेकिन मानसिक दृष्टि से हम अभी भी आदिमकाल में जी रहे हैं। वास्तव में कन्या भ्रूण-हत्या हम सबके सभ्य होने पर सवालिया निशान  है। दुखद है कि जिस समाज में बेटी के पैदा होते ही मार दिया जाता हो, जिसमें बेटी को दोयम दर्जे का माना जाता हो, वह समाज सभ्य कैसे माना जाए?

विश्व में एक करोड़ महिलाएँ पैदा नहीं होने दी गईं

                प्रसिद्ध पत्रिका में छपी नोबेल पुरस्कार  विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की एक रिर्पोट के अनुसार कि विश्व में एक करोड़ महिलाएँ पैदा नहीं होने दी गईं, जिन्हें कोख मे ही मार दिया गया। इस अध्ययन के मुताबिक चीन से करीब 33-5 लाख महिलाएँ, भारत से 22-8 लाख, पाकिस्तान से 3-1 लाख, बांगलादेश से 1-6 लाख और मिड्ड से 6 लाख महिलाएँ पैदा होने से पहले ही मार दी गई।

                इस परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए देखें तो हमारे आस-पास ही लाखों हत्यारे घूम रहें हैं। जिनसे हम सुबह-शाम मिलते हैं, साथ खाते-पीते, हंसते-मुस्कुराते, उन्हें अदब-सम्मान देते हैं। उनसे त्योहारों की खुशियाँ बाँटते हैं, जो माँ की कोख में आने वाली कन्या रूप भ्रूण को बुझा देते हैं। वास्तव में जिस समाज में मासूम बेटियों के हत्यारे भरें हों, उससे अपेक्षा किसी सृजन की कैसे की जा सकती है।

‘दश पुत्र समाः कन्या’

                विगत कुछ वर्ष पूर्व जारी संयुक्त राष्ट्र संघ के आँकड़ों के अनुसार विगत शताब्दी में भारत में भी स्त्री-पुरुष जन्म अनुपात अत्यधिक प्रभावित हुआ है। वह भारत जिसके इतिहास के पन्ने-‘दश पुत्र समाः कन्या’ अर्थात एक कन्या दस पुत्रें के बराबर है की चर्चा करता है। जिसने गार्गी, अपाला, घोषा, लोपामुद्रा जैसी अनन्त ब्रह्मवादिनियों व वीरांगनाओं को जन्म दिया।

नारी का ही नारी भक्षक होना

                वास्तव में कन्याओं के गिरते आंकड़े हमारे समाज के गिरते मानसिक स्तर की ही तो गवाही देते हैं। जिस देश की बेटी अपने सबसे सुरक्षित स्थान अपनी ही माँ की कोख में मार दी जाती हो, वहाँ उसकी बाह्य स्थलों पर सुरक्षा से जुड़ी नीतियाँ कितनी सफल हो सकती हैं? यह आखिर समाज अपनी ही जननी के प्रति इसलिए हमें इस संदर्भ में मानसिकता बदलना होगा। माँ की कोख, जो किसी बच्चे के लिए दुनिया का सबसे सुरक्षित स्थान  है, अगर वहाँ भी वह सुरक्षित न रह पाए तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन हत्यारों की समाज में व्यापकता कितनी अधिक है। इसमें दोष सिर्फ पुरुषों का ही नहीं है, महिलाएँ भी बराबर की भागीदार हैं। नारी का ही नारी भक्षक होना प्रश्न खड़ा करता है।

                भारत के चिकित्सकीय अधिनियम 1971 के अनुसार वही गर्भवती गर्भपात करवा सकती है, जिस संदर्भ में चिकित्सक को लगे कि गर्भ की वजह से महिला या गर्भस्थ शिशु के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को खतरा हैं और जिस बच्चे के गंभीर रूप से विकलांग या अपाहिज पैदा होने की संभावना हो। ऐसे कानून के बावजूद सामाजिक चेतना में अँधियारा है।

                ऐसे में आवश्यकता है हमारा समाज नारी व बेटी को बाहरी समाज में सुरक्षा तो दे, पर घर की चाहरदीवारी व माँ की कोख में फैलते अँधेरे को भी रोकना आवश्यक है। इसी के साथ हमें अजन्मी बेटियों की मौत को रोकने के लिए समाज की अपनी मानसिक संरचना को भी बदलना होगा। समाज को ‘बेटी पराया धन है’, वाली सोच भी बदलनी होगी। इसके लिए इस समाज के अंतःकरण में नव मूल्यों को स्थापित करना होगा, बेटियों के प्रति हमारे प्राचीन ऋषियों द्वारा जगाया स्वाभिमान पुनः वापस लाना होगा। जिससे हमारी बेटी समाज व देश का स्वाभिमान रूपी धन बने, यह समाज व देश तभी सुख-सौभाग्यशाली व नारी सम्मान रूपी सम्पत्ति से धनी कहा जा सकेगा। आइये हम सब मिलकर संकल्प लें और हमारे आसपास घूम रहें बेटियों के हत्यारों को बेनकाब करें। तभी नारी का संरक्षण होगा और नारी बचेगी और पढ़ेगी भी।

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Wednesday, 3 March 2021

अपने भीतर के सारथी को खोजने की रखें कामना | Gita Updesh 193 | Dr. Archi...

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Tuesday, 2 March 2021

क्या करें, क्या न करें? | Gita Updesh-192 | Dr. Archika Didi

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