Friday, 26 February 2021

दम्भ व् दर्प का करो त्याग | Gita Updesh-191 | Dr. Archika Didi

Shiva & Shakti-The Balancing Power of the Cosmos



 

The infinite Shiva has many forms and of these diverse forms, the Ardhanarishvar form is just enthralling. In this unique contour, Shiva is consciousness- the masculine energy while Shakti is the motivating power- the feminine energy. And this Ardhanarishvar embodiment is the ultimate balance that brings stability and positivity in life.

The masculine power and the feminine Shakti - These primal energies are known as Purusha (Consciousness) and Prakriti (Nature).

Prakriti & Purusha

Prakriti (Shakti) means power, drive, energy, change and transformation- which is nature. This nature is the reason behind the existence of the maternal energy. The mother gives nourishment, security, and warmth to her children. When a child is born, the mother nurtures it with the sap of life and raises it while sacrificing a lot. 

Purusha (Shiva/the Consciousness), however, is the fixed, infinite, and silent observer. This male energy lacks desires of his own, into which Prakriti infuses her own nature to bring balance in the cosmos. 

The Celestial Consciousness

Thus, Shiva and Shakti are manifestations of the universal celestial consciousness – where there are two primal energies, the feminine energy, and the masculine energy. The left side is Parvati, and the right side is Shiva. 

But their splitting gives rise to the duality within the lives of human beings that results in a sense of lacking. So, the one part constantly strives to re-unite with the other part. This is the duality of nature.

All the movements, all the actions and all the creations display this nature of duality where one can see a perfect unison of both Shiva and Shakti. And this is the union of the human and the divine consciousness which is the root philosophy of the very existence of the whole cosmos.

And the human body is the embodiment of both the energies.

The Balance

Shiva and Shakti exist within every human being as the masculine and feminine energies. Within Purush there lies a strong proclivity towards the feminine energies, and within Prakriti a strong tendency towards the masculine energy. 

So, when Prakriti and Purush unite, knowledge, the knower, and the thing of knowledge, all turn in a single energy giving the required balance to the cosmos. 

So, realize that, everything you have ever yearned for is present within you. In this state of absolute consciousness there are no dualities and therefore, no grief. Recognize the bliss, unconditional love, compassion and understanding that is present within you. Through such realization of Prakriti and Purush within you, try to harmonize and balance your mind.


Thursday, 25 February 2021

कभी बुझे नहीं श्रध्दा -विश्वास की अग्नि (माघ पूर्णिमा 2021 विशेष)

 


कभी बुझे नहीं श्रध्दा -विश्वास की अग्नि  (माघ पूर्णिमा 2021 विशेष)

भगवान कहते हैं-‘‘मेरा कोई अपमान कर ले तो उसे क्षमा मिल सकती है, मेरे प्रतिनिधि का अपमान क्षमायोग्य नहीं है।’’ गुरु भगवान का प्रतिनिधि ही है। गुरु के प्रति जितनी गहरी श्रद्धा होगी, उतना ही ज्ञान फलीभूत होता जाएगा। उतना ही जीवन सुख-शांति, समृद्धि, उन्नति से भरता जायेगा। इसी श्रद्धा के सहारे शिष्य अपने जीवन का रूपांतरण करता जाता है। सद्गुरु के आशीषों के साथ देवी-देवता भी अपना आशीष देते हैं। तब शिष्य अध्यात्म मार्ग पर बढ़कर परमात्मा से अपने को सहज जोड़ पाता है, अंततः अनेक दिव्य शक्तियां गुरु के माध्यम से शिष्य के जीवन को धन्य करने लगती हैं।

            गुरु व सद्गुरुकी महिमा इसीलिए तो अनन्त एवं अतुलनीय मानी गयी है। कबीर भी तो यही कहते हैं। उनका लोचन उघाड़नेका आशय शिष्य की पात्रता का सतत विकास ही तो है। सद्गुरुको भगवान का प्रतिनिधि कहा गया है। क्योंकि वे लोगों को सद्मार्ग पर चलना सिखाते, सान्निध्य  में आये शिष्यों को दिव्य ज्ञान देते हैं। जैसे-जैसे शिष्य की पात्रता विकसित होती है, श्रद्धा-भावना  बहने लगती है, वैसे-वैसे गुरु आगे का मार्ग दिखाते हैं। इस प्रकार एक दिन उस स्थिति में शिष्य को लाकर खड़ा कर देते हैं, जहां पर अंदर ज्ञान व आनंद का सागर हिलोर मारता है। पर हर शिष्य का अपने गुरु की करुणा से जुड़ने के लिए श्रद्धा का संचार जरूरी है। शिष्य में श्रद्धा जितनी गहन होगी, सद्गुरु की उतनी ही कृपा प्रभावी होगी। अपनी श्रद्धा की रक्षा करना शिष्य का काम है और अनुदान-वरदान देना गुरु का। सच कहें तो श्रद्धा और विश्वास का महत्व पूजा-उपासना से भी बढ़कर है। अतः शिष्य को चाहिए श्रद्धा की अग्नि को बुझने न दें। कहते भी हैं शिष्य गुरु के पास गहन श्रद्धा से जाये, गुरु की कभी अवज्ञा न करे, फिर गुरु कृपा बरसती ही है। जैसे कानून का अपमान करने वाले को सजा मिलती है, ऐसे ही गुरु का अपमान करने वाले को आत्म प्रताड़ना रूपी सजा भी भोगनी पड़ती है।

            इसीलिए कहा गया कि जब सद्गुरु रूठ जाएं तो समझना चाहिए कि यह जिंदगी व किस्मत का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। कहते भी हैं रब को बाद में मना लेना, पहले अपने सद्गुरु को मना लें। सद्गुरु के द्वारा शिष्य को निखारने में अंदर की श्रद्धा ही काम करती है। कहा जाता है आध्यात्मिक भावदशा में गुरु-शिष्य के मिलन अवसर पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश की शक्तियां गुरु में प्रकट होती हैं। इस अवसर पर गुरु आशीर्वाद से शिष्य में भक्ति, शक्ति, भाग्य का सहज उदय होता है। रोग और दुर्भाग्य दूर होते हैं, समस्याएं सुलझती हैं, शिष्य का प्रायश्चित पूरा होता है। नये जीवन का उदय होता है। अपने पूज्य सद्गुरुदेव इसी स्तर के हैं।

            इसीलिए जब भी अवसर मिले तो गुरु शिष्य के इस महान मिलन को खोये नहीं। इसके लिए बस श्रद्धा-विश्वास बढ़ाते रहें, जिससे आंतरिक स्तर पर गुरु स्थापित होने का अवसर खोये नहीं। आइये! हम सब अपने गुरु से झोली फैलाकर सबसे पहले श्रद्धा-विश्वास ही मांगे, जिससे नाम जपने में बरकत हो और भक्ति में रस आए। जीवन का सौभाग्य उदय हो।

Tuesday, 23 February 2021

‘ध्यान’ में संगीत का संयोजन


 


ध्यानमें संगीत का  संयोजन

आनंदमयी ध्यान की अवस्था है समाधि। अर्थात् समाधिका तात्पर्य एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें हम सहज और आसानी से ध्यान कर सकते हैं।

                सहज समाधि ध्यान से वास्तविक विश्राम की अनुभूति होती है। हम सभी की जिन्दगी में कई क्षण ऐसे होते हैं, जब हमारा मन शांत और दुनियादारी के सारे बोझों से दूर होता है, लेकिन कई बार हमारी चाहत होती है कि हम उन क्षणों को दोबारा अनुभव कर पाते।

                यह ध्यान इन्हीं क्षणों की अनुभूति करना सिखाता है। यह एक ध्यानकरने की प्रक्रिया है। इसे करने के तुरन्त बाद ही हमारा शरीर तनाव और परेशानियों से बहुत दूर हो जाता है। मन को असीम शांति की अनुभूति होती है।

                सहज ध्यान एक मंत्र ध्यान है। इसमें एक सरल ध्वनि मंत्र सिखाया जाता है। इस मंत्र का मन में उच्चारण करने से मन को शांति और स्थिरता मिलती है। जब हमारा मन और तंत्रिका तंत्र गहरा ध्यानकरके विश्राम की स्थिति में होता है। तब हमारा मन प्रफुल्लित होने लगता है। इससे हमारे मन के द्वार खुलने लगते हैं।

                सहज समाधि ध्यानके अभ्यास से किसी भी विषय पर विचार स्पष्ट होने लगते हैं। शरीर की ऊर्जा बढ़ने लगती है। इस तरह के ध्यान से मन को बहुत शांति की अनुभूति होती है।

                ध्यानके परिप्रेक्ष्य में ध्यान और संगीत कैसे एक दूसरे के पूरक हैं, इसका उल्लेख करना आवश्यक है। स्ट्रेस   मैनेजमेंट और सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए ध्यानके साथ संगीत के मेल से अद्भुत लाभ प्राप्त होता है। संगीत के साथ ध्यान करने से दिमाग से तनाव कम होता है। संगीत से मनोदशाएं जागृत होती हैं। ध्यान के साथ संगीत के संयोजन से साधक के मन और मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह वैज्ञानिक स्तर पर सिद्ध है कि संगीत से मानसिक शांति मिलती है। अतः ध्यान करने के लिये बहुत ही धीमा संगीत चलाएं। अगर ओम नमः शिवाय, गायत्री मंत्र या अन्य कोई संगीत चलाएं तो संगीत पर ही ध्यान केन्द्रित करें। संगीत मय ध्यानकरने से मानसिक रोग तथा अन्य कई रोग स्वतः दूर होने लगते हैं।

                एक स्वस्थ व्यक्ति वह है, जो शारीरिक तौर पर रिलैक्स, मानसिक तौर पर एलर्ट, भावनात्मक तौर पर शांत और आध्यात्मिक तौर पर सजग है। पूरी तरह से स्वस्थ रहने के लिए मानसिक और भावनात्मक पहलू भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने शारीरिक पहलू। ध्यान से किसी भी रोग को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। ध्यान और आध्यात्मिक संगीत के सहज संयोजन से ध्यान के शीर्ष तक पहुंचा जा सकता है। स

Monday, 15 February 2021

ओंकार नाद धारण करने वाला पर्व वसंत

 





ओंकार नाद धारण करने वाला पर्व वसंत

भारत सहित अनेक देशों में मनाये जाने वाला उल्लास एवं आह्लाद का त्योहार है वसंत पर्व। यह ज्ञान, कला की देवी सरस्वती माँ को समर्पित पर्व भी है। यह ब्रह्म नाद के प्रकट्य का भी पर्व है। कहते हैं इसीदिन ब्रह्माण्ड में गूंजते ओंकार नाद को गुरुओं-संतों ने आत्मसात किया था तथा लोक परम्परा में सृजन की धारा बही थी। इसी को ध्यान में रखकर आज भी अभिभावक व गुरु बच्चों का विद्यारम्भ संस्कार वसंत पर्व पर कराना शुभ मानते हैं। सगुण साधकों की धारणा है कि इस दिन विद्या, कला, ज्ञान और संगीत की देवी माता सरस्वती का जन्म हुआ था। अतः इस दिन सरस्वती की पूजा भी की जाती है।

पौराणिक मान्यता है कि जब कामदेव को भगवान शिव ने भस्म कर दिया, तो उनकी पत्नी रति को अपने पति को वापस पाने के लिए 40 दिनों की कठोर तपस्या से गुजरना पड़ा। अंततः इसी दिन पुनः मिलन हुआ।

                देवी सरस्वती रचनात्मक ऊर्जा की प्रतीक हैं। माना जाता है कि इस दिन जो उनकी पूजा करते हैं, उन्हें देवी से ज्ञान और रचनात्मकता का आशीर्वाद मिलता है। ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित दिन होने के कारण इसी दिन बच्चों को अपना पहला शब्द लिखने और सीखने को अभिभावक प्रोत्साहित करते हैं। साथ ही उनमें त्यागभाव, शालीनता बढ़े इस भाव से प्रार्थना करते हैं।

 ‘‘मानव के मूल स्वभाव से जुड़ने, नैतिकता, व्यवहार, मेलजोल में सहानुभूति और भाईचारा, सहकारिता, सहयोग का मार्ग प्रशस्त करने से व्यक्ति महान बनता है। यह पर्व हमें संवेदनशील, ज्ञानवान दीपक बनने की प्रेरणा देता है। छोटा-बड़ा होने से फर्क नहीं पड़ता, सोच बड़ी व प्रेमपूर्ण होनी चाहिए। यह तभी सम्भव है जब व्यक्ति निजस्वरूप के लिए जीवन जिये, वसंत उसी का पर्व है।’’ ऐसे में जरूरत है कि हम सब भी प्रकृतिमय जीवन क्रम अपनाने की ठाने और जप, ध्यान, गुरुकृपा अनुशासन से जुड़ें। ओंकार माँ सरस्वती का ही प्रवाहित नाद है। जो व्यक्ति को अंदर से निर्मल करके प्रकृतिस्थ बनाता है। अतः ओंकार के ध्यान-नाद से जो जितना अधिक जुड़े, जीवन प्रकृतिमय उसी स्तर से बनता जाता है और माँ की कृपा मिलती है। सूत्र है-

प्रणवो धनुः शरोशि आत्मा ब्रह्म तद् लक्ष्यं उच्यते।

                अर्थात इसमें प्रणव कार ही धनुष है,

धनुष पर चढ़ाया जानेवाला तीर आत्मा है और लक्ष्य है परब्रह्म परमेश्वर।ऋषिगण उच्च साधनाओं में प्रवेश करके ओंकार के उच्च रहस्य खोलने के संदर्भ में कहते हैं कि कार रूपी धनुष पर अपनी आत्मा को चढ़ाओ और लगातार ध्यान के द्वारा अपनी समस्त ऊर्जा, अपने समस्त प्राण को परब्रह्म परमेश्वर की ओर फेंकना शुरु करें। अंततः गहराई से उभरे इन भाव तरंगों से पूर्ण दिव्य आध्यात्मिक मार्ग का विकास होता है। कहते हैं कि लगातार ब्रह्मांड में गूंजने वाला एक अनहद नाद है, जिसे कार कहते हैं, यदि वह अंतः में गूंज उठे तो समस्त ब्रह्माण्ड को हम हिला सकते हैं। क्योंकि तब सम्पूर्ण अंदर बाहर से सब कुछ प्रकृतिमय ही तो होगा। जीवन में माँ सरस्वती सेवा-त्याग, संवेदना रूप में साकार हो उठेंगी। जरूरत है हम साधना मार्ग की ओर लौटें और जीवन को सेवा-सहायता व गुरु अनुशासन द्वारा आत्मविकास में लगायें। तब पर्व मनाना भी साकार होगा।


Friday, 12 February 2021

How to Stay Fit During Exam Time?



The completion of a semester leaves a single point on students’ minds — exams. And when you are close to your exam period, your focus should be on your studies. But that doesn’t mean you start taking stress and neglect your health. When you are stressed, which is mostly the case amid exams, your body will find it tough to fight off infections to keep you in good health for facing the competition efficiently.

So, it is necessary to take all the efforts to maintain a healthy lifestyle during the exam time.

Here’s what you can do for that.

1. Diet

Take nutritious food and healthy snacks only because then you’ll find it easier to concentrate on studies. Try to avoid deep fried snacks and junk food during exam time. Stay away from overloading on sugar or salt as well, since they will make you feel tired. Also, eat a light balanced meal on the exam day.

2. Time-Management 

Manage your time well. Prioritize your time according to the tasks. Use your productive hours for the most challenging subjects and leave the easy tasks for other times in the week. This will reduce your pressure and allow you to have more time to practice and study. Avoid grappling with your exam content till the last-minute with good time-management, you may avoid late night studies and stay fit.

3. Say NO to Energy Drinks

Do not fall into the trap of energy drinks or coffee. Drink water and milk only. Most energy drinks are overloaded with chemicals and caffeine to give you a temporary energy boost. Regular use of these energy drinks can damage your liver and cause other unpleasant side effects. So be wary of using anything that promises you a boost of energy. There are other healthier ways to stay energized.

4. Get Energy from a Good Night’s Sleep

Never ever sacrifice a good night’s sleep. It is not a good habit to stay awake late into the night. It does not help you prepare for your exam but instead makes you even more tired and anxious. You must get a full night’s sleep before any exam. There is no better energy drink than a good night’s sleep. 

5. Take Breaks

Continuous studies can be tiring. And so, stop and refresh yourself every so often — even if you’re short of time and need to complete a chapter now. Take five minutes and go for a short walk or get some healthy snacks. It can help you clear your mind and regain your attention.

6. Tackle Tension & Stress

Determine what works for you and manage your stress. You may do some exercise, meditate, have a short nap, or even take a few deep breaths. These are nice ways to relieve stress and tension. They refresh you in a short time.

So, take good care of yourself during the exam time by getting a balanced diet, exercising, sleeping well, and managing tension and stress. It will greatly reduce the exam pressure and make your academic life a lot easier and brighter.


Thursday, 11 February 2021

सत्यता के बोध से जुड़ें



एक बार गुरु नानकदेव ने अपने शिष्यों की परीक्षा के उद्देश्य से उन्हें दो पैसे देते हुए कहा कि एक पैसे का सत्य और एक पैसे का झूठ खरीदकर आओ। शिष्य सारा दिन भ्रमण करते रहे, पर कुछ समझ नहीं आया। तभी निराश-हताश शिष्यों पर किसी दिव्य सन्त की दृष्टि पड़ी। महात्मा ने शिष्यों से पूरा हाल जाना और पैसे लेकर उनके हाथों में दो कागज के टुकड़े पकड़ाते हुए कहा-जाओ! अपने गुरु के सामने ही अपनी इस मुट्ठी को खोलना। गुरु नानकदेव के समक्ष पहुंचकर शिष्यों ने कागज खोला, तो एक कागज पर लिखा था-‘जीवन झूठ है’ और दूसरे में था कि ‘मृत्यु सत्य है’।

                शिष्य को इसमें कुछ समझ न पाता देख स्वयं गुरुनानक देव ने उन्हें बताया कि मानव जीवन अनमोल है, वह इन्हीं धारणाओं के बीच डोलता रहता है। खेलता रहता है। पर जब चोट लगती है, तब उसे जीवन की सत्यता का अहसास होता है और अपनी आत्मा व परमपिता परमात्मा की याद आती है। वास्तव में जब व्यक्ति के झूठे अहंकार पर ठेस लगती है, कहीं से आशाओं और आकांक्षाओं पर कुठाराघात होता है, लाभ की बजाए हानि के विपरीत हवाओं के झोंकों का सामना उसे करना पड़ता है, पद-प्रतिष्ठा जाती दिखती है, वजूद डगमगाता है, तब उसे जन्म और जीवन देने, पालन-पोषण करने वाले परमात्मा की याद आती है। यहीं से जीवन में सत्यता का बोध होता है। उसे जीवन की निष्सारता अनुभव होती है कि हम तो झूठ की बुनियाद पर खड़े थे।

संत कबीर के शब्दों में कहें तो-

                नौ द्वारे का पिंजरा, तामे पंक्षी पौन।

                रहिबे का अचरज है, गए अचंभा कौन।।

                अर्थात् नौ द्वार वाले इस शरीर रूपी पिंजरे में आत्मारूपी पक्षी कैद है। इस खुले हुए पिंजरे से पक्षी को उड़ने का पूरा अवसर है, लेकिन आश्चर्य है खुले दरवाजों से इसका न उड़ना। इसी में कैद रहने को सत्य मानना। इसका कारण है मुक्ति का मार्ग न पहचानना। अर्थात् गुरु का अभाव, जो उसे बोध कराता है। गुरु बोध पाते ही मानव शरीर में बैठे आत्मारूपी पक्षी की चमक जाग उठती है। तभी मनुष्य की आंखों में, हृदय में सकारात्मक गतिशीलता आती है। उल्लास जगता है, हाथ-पैर, कान से सही सुनने की शक्ति जागती है, नासिका में पवित्र सुगन्ध ग्रहण करने की क्षमता भर उठती है। उसे अनुभव होती है सत्यता। एक छोटी-सी चिंगारी में सत्य आते ही उसकी शक्ति तेज से समूचा शरीर आलोकित हो उठता है।

                यही ‘सत्’ और ‘चित्त’ है। परम ज्योति है, जो अनवरत ज्योति रहती है। इस चेतन तत्व की सत्ता कदापि मिटती नहीं। गुरु की कृपा पाते ही गुरुतत्व का बोध जैसे मिलता है, आत्मा पर पड़े मल-विक्षेप से लेकर सम्पूर्ण आवरण भी समाप्त होता जाता है। तब जीवन में नई कोपलें फूटती हैं। पुराने ढर्रे वाला झूठ से भरा जीवन तब भरभरा पड़ता है और यही झूठ की मृत्यु, व्यक्ति को जीवन का सत्यता से जोड़ती है। तब अंदरवाला स्वतः बोल उठता है कि जीवन झूठ है और मृत्यु ही सत्य है।

Tuesday, 9 February 2021

This Mauni Amavasya, Be Silent for Sometimes


 


When you ask anybody, ‘how was your day?’, chances are high that you will get the answer- it was a hectic day, it was a busy day; I listened a lot and talked a lot; this is a part of my daily life. For them, a day of complete silence could be boredom or some sort of miracle. But human beings must understand the importance of serenity in their day-to-day life.

Silence helps you in self-reflection and self-talk that activates your creative brain. When you are quiet, you have enough time to turn down the annoying inner and outer noise. You become aware of other important aspects of life. Spending time unblocked, detached, and in silence expands your focus, productivity, and creativity. 

When you are silent, you also tend to appreciate The Creator and His majestic creation. Remember that being lost in your own inner chaos is detrimental to your mental well-being. Try to sit in silence for some time each day and reap many benefits. 

This practice of silence is the basis of Mauni Amavasya that will be celebrated in India on 11th February, 2021.

Mauni Amavasya & Silence 

Mauni Amavasya is the last Amavasya in the year before Maha Shivratri. The day of Mauni Amavasya is the most suitable time to balance various elements that regulate mental, physical and spiritual processes in human beings. It is a very important day on which you may awaken your wisdom by taking the vow of silence. So, speak less on this day as the tongue may harm sentiments of others. On this day, do meditation and Pranayam combined with silence.

Benefits of Silence

1. Helps in Creative Process


Creativity is an important part of many peoples’ lives, and silence is a crucial part of the creative process. Silence empowers you and inspires creativity within. Perhaps that’s why great scientists, writers and painters work alone in a serene environment. The best creative work is often completed in solitude or after a brief period of solitude. Of course, discussion with others has its own set of benefits, but unique works happen when the outside world and your inner world are in a silent state.

2. Improves Attentiveness

When various sounds enter your brain all at once, they hamper your ability to concentrate. So, one of the major reasons why you should sit in silence sometimes is that, it enhances your ability to focus. A silent environment makes you more attentive.

3. A Relaxed & Productive Life

Struggling with stress and having difficulties with staying calm? Spare and enjoy some moments of silence each day. You will have a chance to relax and reduce the stress level. Sometimes do nothing and remain silent. It enhances your mental ability and thinking capacity that improves your productivity.

4. Develops Endurance

Learn to enjoy silence to cultivate calmness in life that eventually leads to a remarkable enhancement in your tolerance level. You don’t lose your cool during adverse situations at home or work. And such a cool head invites great miracles in life.

Therefore, for a cool, tranquil, and productive life steal some moments each day to sit in silence. Spend some time daily reflecting on your actions and give a whole new meaning to your daily life. Every individual who aspires to accomplish something great in life must realize the power of silence and use it in a positive manner.

Saturday, 6 February 2021

What to Do When You Hit the Rock Bottom in Life



People grow the most when they face challenges in life. They try harder to overcome the challenges which results in success and happiness. But very few things challenge you as much as hitting the ‘rock bottom’ in life. And this is the phase that fills your life with great prospects.

Well, at some point, life will throw at you some tough circumstances that will leave you in a gloomy situation for some time. You will wonder how you will pull yourself out and when things will get normal. Such a ‘rock bottom’ state usually comes with an intense bout of anxiety and depression. Even small tasks will take so much effort and every moment of life will seem like a nightmare.

But there is a positive aspect of such a situation as well. You can learn great life lessons while dealing with such a situation and no one can teach you such lessons.

What to do

What you do when you face the rock bottom is crucial to your life. You don’t have to remain in the situation forever. You may react to it as you want. You can concentrate on what you can change or what you can’t change. What is still on your side and how you can still get on with a normal life.  The most awful thing you can do, however, is willing to be in such a situation forever. So always work for coming back to normalcy.  A few things may help you each time you hit the rock bottom.

1. Use the Agony

Your agony will motivate you to act because the situation makes you uncomfortable. So, take action to root that pain out. The agony and pain may be the motivation that you have always needed to bring the necessary changes in your life. Your agony would fuel your courage and grit. Don’t feel sorry for yourself, control the negativity that’s keeping you low and turn it into motivation. This motivation will thrust you upwards helping you to see the beautiful ray of hope.

2. Communicate

Always keep your channels of communication open- that is under your control because you don’t have to face the grim situation alone. Reach out to people who care for you. If you can find even one person who really cares for you and give some advice to you, it will bring favorable results. The ones who love you will lend you a helping hand for sure because they would love to see you bounce back once again. 

However, if you find no one at your side, believe in your prayers and God and become your own best friend. And when you are your own best friend, no one can fail you. 

3. Unlearn and Relearn

Have some courage and dare to leave behind the past, everything about it- including your past knowledge. Believe that you still have a lot to learn in life despite hitting the rock bottom. So, be a good student and take lessons from your situation. 

Pick up lessons from what did not go well and understand who you really are as an individual. Learn about what you want to achieve in life and learn from the behavior of the people around you. Learn from the time, situation and everything that is happening at that time. The more you observe, the more you will unlearn and relearn. And this profound learning will take you to a destination of your own choice.

Therefore, let the hardship offer you a new vision towards your life. Just realize that you have nothing to lose because you have started taking action to change your situation. Remember, the best thing about hitting the rock bottom state is that the only way to go now is- upward. You cannot alter past mistakes, you cannot predict what’s going to happen tomorrow and so make the most out of this moment and bounce back.


Friday, 5 February 2021

सद्पुरुषों व् सद्गुरुओं के सहारे वैश्विक नेतृत्व की ओर भारत ( India towards Global Leader )


 

सद्पुरुषों व् सद्गुरुओं के सहारे वैश्विक नेतृत्व की ओर भारत


बीसवीं सदी के आरम्भ में अमेरिका के उदय के साथ ही विश्व के मानचित्र में अद्भुत बदलाव आया और बीसवीं सदी अमेरिकी सदी बनी। सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान से लेकर साधन-संसाधन-आयुध नीतियों के निर्धारक के रूप में वैश्विक नेतृत्व का केन्द्रक अमेरिका बन गया। कुछ उसी प्रकार इक्कीसवीं सदी के आगे का नेतृत्व भारत के हाथ आ जाय तो आश्चर्य नहीं है। इस आशय का संकेत सन् 2000 के लगभग ‘वैश्विक भविष्य का मानचित्र’ शीर्षक से एक अमेरिकी रिपोर्ट में था। रिपोर्ट में यहां तक था कि ‘‘भारत और चीन दोनों के नई वैश्विक महाशक्तियों के रूप में उभरने से संसार के भू-राजनीतिक मानचित्र में भी बदलाव हो सकता है।’’ ऐसे में प्रश्न उठता है कि भारत जैसे देश के लिए यहां की  विशाल जनसंख्या देश उत्थान में बाधक की जगह सहायक कैसे साबित हो सकेगी?

सुदूर भविष्य को झांक सकने वाली भारत के विकास के संदर्भ में ऐसी अनेक रिपोर्ट आर्थिक विकास को लेकर भी रहीं, पर प्रश्न यह है कि क्या इक्कीसवीं सदी की महाशक्ति रूप में भारत के उभरने, भारत के हाथों विश्व की बागडोर आने के पहले विकसित व विकासशील देशों के रूप में बटे वर्तमान विश्व की रीतियां-नीतियां समाप्त हो जाएंगी? भौगोलिक आधार पर भेद-भाव रखने वाले प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय समूह विश्व सम्बन्धों के निर्धारण में अपनी भूमिका क्या कम होने देंगे? तथा भारत अपने को इतना समृद्ध और दूरदर्शी विचारधारा वाला बनाने में सफल हो पायेगा कि विश्व के नेतृत्व की पूर्ति करने में समर्थ हो?

वास्तव में देखें तो आज सम्पूर्ण विश्व की आर्थिकी चरमरा चुकी है। स्वास्थ्य सम्बन्धी अभियान में सभी देश फेल साबित हुए, बेरोजगारी का दुष्प्रभाव भी कम नहीं है। कोरोना संकट के निवारण के लिए आज वैक्सीन भले आ चुकी है, पर स्वास्थ्य संकट के पूर्णतः समाप्त होने को लेकर कोई देश आश्वस्त नहीं दिखता। यही नहीं विश्व का विकास इन दिनों समुचित दिशा के अभाव में लड़खड़ाहट अनुभव कर रहा है। इसी क्रम में जब भारतीय चिंतकों और विश्लेषकों के वैदिक व सनातन चिंतन पर सूक्ष्म मान्यता व सही दिशाबोध रखने वाले आध्यात्मिक संतों के संदेशों, प्रयोगों पर दृष्टि डालते हैं, तो निश्चित ही भारत की सत्य-न्याय-प्रेम पर आधारित मूल चेतना भारतीय गौरव को उभारने में लग चुकी अनुभव होती है। महर्षि अरविंद, महर्षि रमण, श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द  आदि की सूक्ष्म चिंतनधारायें जैसे हर मन को यह आभास दिला भी रही हैं कि विश्व मानवता की वर्तमान पीड़ादायक स्थिति कोई विश्व चेतनात्मक शक्ति दूर कर रही है। सच कहें तो भारत ऐसा देश है, जिसमें विश्वबोध की गहराई और व्यापक संवेदनात्मक अनुभव समाहित है। यह देश अतीत में अनेक बार अपनी शाश्वत चेतन धारा के सहारे ऐसी समस्याओं का समाधान दे भी चुका है। 

भारतीय सनातन ऋषि  चेतना का संदेश है कि ‘‘किसी तंत्र को व्यक्तित्व के मानवीय गुण ही श्रेष्ठता तक पहुंचाते हैं। मानव के अंतराल में पड़े सद्गुणों का सघन रूप ‘प्रतिभा’ बनकर उभरती व सद्प्रवृत्तियों का समुच्चय बनकर समाज के बीच प्रकट होती है, तो उस समाज में सहज दिशा देने की शक्ति आ जाती है।’’ परब्रह्म परमात्मा का प्रतिनिधि गुरु भी जब मदद करता है। तब मनुष्य की संकीर्ण स्वार्थपरतायें कटती हैं और उसमें परमार्थ जगता है। ऐसी प्रतिभायें तब स्वार्थ में नहीं जीती। अपितु सृजन के संकल्प के साथ परमात्मा के नवनिर्माण में जुट जाती हैं। इस अवसर पर समाज में सद्गुणों से भरे हर व्यक्ति की अच्छाई के एक-एक अंश के समन्वय से जो समूह खड़ा होता है। उसके सुदृढ़ प्रयासों से ही युग समस्या से निजात पाया जाता है और युग नेतृत्व जन्म लेता है।

व्यापक भाव से देखें तो इसी उद्देश्य पूर्ति के लिए देशभर में कार्य कर रही गुरु सत्तायें, संतगण एवं ऋषि  सत्तायें देवात्मा हिमालय से  शक्ति लेकर देश-विदेश के हर भावनाशील को जगाने में लगी हैं। 

पूज्य महाराजश्री कहते हैं कि ‘‘श्रेष्ठ सद्गुरु जब शिष्यों से अपनी क्षमता-प्रतिभा, धन, साधन, भगवान के काम में, सेवा में लगाने की बात कहते हैं, तो वे हमें उसी जागरण के लिए अंदर की पवित्रता से भर रहे होते हैं। ताकि वे युग की आवश्यकता को अनुभव कर सकें। विराट विश्व समाज को परमात्मा का स्वरूप मानकर उसकी सहायता के लिए खड़े हो सकें। हर अंतराल की गहराई में आदर्शों पर चलने के लिए बेचैनी जगाकर समय की जरूरत को समझा सकें।’’

पौराणिक काल के अनेक कथानक इस तथ्य से भरे पड़े हैं। जैसे समुद्रमंथन, हिरण्याक्ष के बंधन से पृथ्वी की मुक्ति आदि महान घटनाएं सत्प्रवृत्तियों को संगठित-एकत्रित करके ही हुईं।

सम्पूर्ण देवताओं के तेज से महिषमर्दिनी दुर्गा का अवतरण ‘दुर्गासप्तशती’ रूप में प्रमाण देखें तो भगवान शंकर के तेज से देवी का मुख, यमराज के तेज से देवी के सिर के बाल बने, विष्णु भगवान के तेज से भुजाएं, चंद्रमा से दोनों स्तनों, इंद्र के तेज से कटिप्रदेश, वरुण से जंघा और पिंडली, पृथ्वी के तेज से नितंबभाग, ब्रह्मा से दोनों चरण, सूर्य से उंगलियां, वसुओं से हाथ की उंगलियां, कुबेर से नासिका, दांत प्रजापति और तीनों नेत्र अग्नि के तेज, भौंहें संध्या, कान वायु के तेज से उत्पन्न हुए। इसीप्रकार देवताओं के एक-एक अंश से मानवता में देवत्व के अभ्युदय हेतु उस कल्याणमयी देवी के रूप में ऐसी चैतन्य शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ, जिनसे युगीन समस्या का समाधान निकला। पर यह सब तत्कालीन ऋषि यों व सद्गुरुओं के संकल्प से संभव हुआ।

भारत गुरुओं का देश है। अतः इन्हीं से भारतीय जनमानस के व्यक्तित्व में अंतर्निहित श्रेष्ठ सद्शक्तियों को सार्थक अभिव्यक्ति मिलेगी। गुरुसत्ता की भावचेतना में उत्पत्ति, स्थिति, ध्वंस, निग्रह एवं अनुग्रह का सिलसिला सदा चलता रहता है। विगत लगभग एक सदी से यहां के संतों-गुरुओं द्वारा वे आध्यात्मिक संसाधन जुटाये गये, मनोभाव गढ़े गये। अब यही सब चैतन्यता पायेगा। बस जरूरत है राष्ट्र  साधक मानवता व धर्म-संस्कृति के आराधक सद्गुरुओं के प्रति जन-जन में श्रद्धा-समर्पण भरी भावना जगाने की। जिससे देश का सम्पूर्ण जनमानस उनसे जुड़कर अपने सहड्डदल कमल में आत्म जागरण व विश्व जागरण का बीजारोपण कर सके। गुरुगीता भी कहती हैµगुरु का स्मरण, ध्यान करने से व्यक्तित्व में युग परिवर्तन के बीज सहज अंकुरित होते हैं। साधक को दृष्टि व दिशा भी मिलती है। इसीलिए अब तक हुई भारत सहित विश्व धरा की क्रांतियों में गुरुओं का ही योगदान रहा है। भारत के इस पुनरोत्थान में पुनः वही होने जा रहा है और वह अमेरिका सहित विश्व की अनेक रिपोर्टें सत्य साबित हों तो आश्चर्य नहीं। बस हम सबको इस महान कार्य हेतु अंदर के सद्गुण को पहचानना होगा, उसे परिष्कृत, विकसित करते रहना होगा। सूक्ष्म रूप से परमात्मा भी हर मन में सृजन-नेतृत्व की दिशा में चलने का वैसा साहस पैदा कर रहा है। 


Tuesday, 2 February 2021

आंतरिक शांतिपूर्ण बदलाव से सही रूपांतरण लाती है गीता

 


आंतरिक शांतिपूर्ण बदलाव से सही रूपांतरण लाती है गीता

जब हम परपीड़न, अंदर से बदला लेने, चोट पहुंचाने, खिलाफ़त, षडयंत्र रचने में लगे होते हैं, तब बाहर से भले ही हम शांत दिखाई दें, लेकिन आंतरिक रूप से बेचैन-अशांत होते हैं। थोड़े समय के बाद अन्दर का वही षडयंत्र बाहर दिखाई  देने लगता है। सूत्र भी है अशांति बांटने वाले व्यक्ति के जीवन में चारों ओर से अशांति आती ही है। जबकि फूल बांटने वाला व्यक्ति एक दिन सारे फूल बांट भी दे, फिर भी उसके हाथों में उन फूलों की खुशबु  जरुर रह जाएगी। सुनिश्चित है जो कुछ आप दे रहे हैं, वह अवश्य आप तक लौटता ही है। विद्वान कहते हैं प्रभु कार्य से प्रसाद मिलता है। सद्गुणों के कारण व्यक्ति के जीवन के कष्ट व दुःख मिटते हैं। जीवन में शांति आती है। भगवान श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि शांति पहले मन में आनी चाहिए। पहले आंतरिक उद्विग्नता बेचैनी दूर होनी चाहिए, फिर बाहर से व्यक्ति दिव्य होगा ही।

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के प्रश्न पर उसे समझाते हैं कि एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जिसने अपनी चेतना को परम ब्रह्म में जोड़ लिया हो, उसकी भाषा सांसारिक नहीं, अपितु वह मौन आंतरिक भाषा में उस ब्रह्म को स्थापित करता है। उस अवस्था में उसकी वाणी बाहर से भले प्रकट नहीं होती, लेकिन अंदर ही अंदर उसके सारे संवाद उस ओर चलने लगते हैं, जिसके प्रति वह समर्पित होता है। इस प्रकार वह परमात्मा के आसन पर, परमात्मा में स्थित, प्रभु में बैठा हुआ, चारों ओर परमात्मा की ही अनुभूति करता अनुभव करता है। साथ ही गौरवान्वित होता है कि मैं प्रभु के गोद में हूँ ।

श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि स्थित प्रज्ञ व्यक्ति अपने मन और बुद्धि को उस तत्व से सतत जोड़ता है, जहां उसकी चेतना स्थित हो गई। वह चलता तब भी इंद्रियों और मन से है, लेकिन उसका चलना संसार में नहीं, अपितु परमात्मा की रचना व रचयिता में वह विचरण करता है। पूज्यवर कबीर के शब्दों में कहते हैं कि ‘‘अंदर ही अंदर वह बिना पांव की यात्रा  करता है, बिना पंखों के उड़ता जाता है, बिन बस्ती के देश में। जबकि बाहर से वह चलते हुए नहीं दिखाई  देता। वास्तव में उसकी यह यात्रा  आंतरिक यात्रा  होती है। अंततः स्थितप्रज्ञ अंदर-बाहर एक सा दिखाई  देता है। यही समाधि है।’’

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब अपने भीतर को व्यक्ति संभाल लेता है, फिर वह बाहर समाधान प्राप्त करता ही है, यह समाधि ही समाधान है, जहां दुखों का समाधान हो जाता है। वह दुःख जो जन्म-जन्मांतरों से चला आ रहा है। जिसकी यात्रा  जन्मों से चली और जन्मों आगे तक जा रही है। गीता में वैसे सामान्य व जटिल प्रारब्ध से उपजे सम्पूर्ण दुःखों का समाधान है।

ध्यान रहे  श्रीकृष्ण संदेश देते हैं कि बुद्धि और मन जब संसार में उलझा हुआ होता है, तो समस्याएं व्यक्ति की बुद्धि, मन से बड़ी हो जाती है, व्यक्ति के सामर्थ्य से बड़ी हो जाती है। वह कुल-परिवार और पितृ जनों से भी बड़ी हो जाएंगी, लेकिन जैसे ही व्यक्ति अपने चित्त-बुद्धि को ध्यान से जोड़कर अपने आपे को पहचानता है, तो तत्काल समझ आता है कि हम से बड़ी समस्याएं नहीं है। कोई दुःख  हम से बड़ा नहीं है। इसलिए कहते हैं स्वयं को कृष्ण में स्थित कर स्वयं को पहचानना बहुत जरूरी है।

श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि अनुशासित मन वाला वह मनुष्य जो अपनी इंद्रियों को वश में रहे  है, जो राग-द्वेष से मुक्त है। राग-द्वेष अर्थात् लगाव और विरक्ति । राग जो आसक्ति  देता है और द्वेष जो जीवन में विरक्ति लाता है। यही अटैचमेंट और डिटैचमेंट, लगाव और विरक्ति  कराता है। पर आत्म अनुशासित मन वाला मनुष्य जब अपनी इंद्रियों को वश में करते हुए विषयगत लगाव और विरक्ति  से अलग होकर आवश्यक विषयों में विचरण करता है, संसार को भोगता है, तो वह परमात्मा के प्रसाद रूप में उसे ग्रहण कर प्रसन्नता प्राप्त करता है। विशेष विचारणीय यह है कि जब हम विषयों में रहेंगे, तो ऑंखें देखेंगीं , कान सुनेंगे। आँखों  में पट्टी  बांध हम दुनिया में विचरण कर भी नहीं सकते। अतः श्री कृष्ण कहते हैं संसार को देखो , भोगो, चखो, खा, पियो। संसार में जितने भी कार्य हैं सभी करना है, उनसे भागना नहीं है, लेकिन राग-द्वेष से विरक्त रहें। विषयानिन्द्रियैश्चरन् अर्थात् दुनिया के कार्य करें, परिवार को चलायें, संतानें भी होंगी, कमाई भी करें, व्यवहार सबसे रहेगा, पर आसक्ति  नहीं। यह आसक्ति व विरक्ति ही अंदर पक्षपात पैदा करता है।

आसक्ति  वह जो व्यक्ति को संसार के वैर-विरोध में लाकर खड़ा  कर दे, जो संसार के जालों में बांधकर उस जगह खड़ा कर दें कि व्यक्ति अपने जीवन के आनंद और अपने परमात्मा को भूल जाय। अर्थात् जो कार्य जीवन में मूल रूप से करना था, वह भूल जाये और बैर-विरोध, लड़ाई-झगड़े, कलह-क्लेश में पड़ जायें। ऐसा क्लेश ही बेचैनी का कारण बनता है। अतः आवश्यकता है अंदर के शांतिपूर्ण बदलाव की, जिससे जीवन का सही रूपांतरण करें।